<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-2333254526940587404</id><updated>2011-11-06T22:03:51.976-08:00</updated><title type='text'>मुद्दा</title><subtitle type='html'></subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://mudda.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mudda.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>विकास शिशोदिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08157576148519764276</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='18' src='http://1.bp.blogspot.com/_yCbiUlApr1c/TMVfAgIbU7I/AAAAAAAAAVY/7kaK_w148Jg/S220/sing.png'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>52</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2333254526940587404.post-5460387455497373304</id><published>2011-02-05T22:21:00.000-08:00</published><updated>2011-02-05T22:23:33.114-08:00</updated><title type='text'>जो सवाल पत्रकारीय कौशल में दफन हो गये</title><content type='html'>&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;br /&gt; पुण्‍य प्रसून वाजपेयी &lt;/span&gt;   &lt;br /&gt;रेलगाड़ी पर हजारों की तादाद में चीटिंयो और चूहों की तरह अंदर बाहर समाये बेरोजगार नवयुवकों को देखकर आंखों के सामने पहले ढाका में मजदूरों से लदी ट्रेन रेंगने लगी जो हर बरस ईद के मौके पर नजर आती है। वहीं जब बेरोजगार युवकों से पटी ट्रेन पटरी पर रेंगने लगी और कुछ देर बाद ही 19 की मौत की खबर आयी तो 1947 में विभाजन की त्रासदी के दौर में खून से पटी रेलगाडियों की कहानी और द्दश्य ही जेहन में चलने लगा। कई राष्ट्रीय न्यूज चैनलों के स्‍क्रीन पर भी यही दृश्य चलते हुये भी दिखायी दिये... और यूपी में देशभर के लाखों बेरोजगारों की बेबाकी सी चलती भी स्क्रीन पर रेंगती तस्वीरो के साथ ही दफन हो गयी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यानी कोई सवाल पत्रकारीय माध्यमों में कहीं नहीं उठा कि सवा चार सौ धोबी-नाई-कर्मचारी की नियुक्ति के लिये बरेली पहुंचे सवाल चार लाख बेरोजगारों की जिन्दगी ऐसे मुहाने पर क्यों आकर खड़ी हुई है जहां ढाई से साढ़े तीन हजार की आईटीबीपी को नौकरी भी मंजूर है। ना अखबार ना ही न्यूज चैनलों ने बहस की कि जो बेरोजगार मारे गये वह सभी किसान परिवार से ही क्यों थे। किसी ने गांव को शहर बनाने की मनमोहनइक्नामिक्स की जिद पर सवाल खड़े कर यह नहीं पूछा कि सवा चार लाख बेरोजगारों में साढे़ तीन लाख से ज्यादा बेरोजगार किसान परिवार के ही क्यों थे। यह सवाल भी नहीं उठा कि कैसे विकास के नाम पर किसानी खत्म कर हर बरस किसान परिवार से इस तरह आठवीं पास बेरोजगारों में सत्तर लाख नवयुवक अगली रेलगाड़ी पर सवार होने के लिये तैयार हो रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बरेली में बेरोजगारों के इतने बडे़ समूह को देखकर पत्रकारीय समझ ने बिंबों के आसरे मिस्र के तहरीर चौक का अक्स तो दिखाया, मगर यह सवाल कहीं खड़ा नहीं हो पाया कि बाजार अर्थव्यवस्था से बड़ा तानाशाह हुस्नी मुबारक भी नहीं है। और बीते एक दशक में देश की 9 फीसदी खेती की जमीन विकास ने हड़पी है, जिसकी एवज में देश के साढ़े तीन करोड़ किसान परिवार के किसी बच्चे का पेट अब पीढि़यों से पेट भरती जमीन नहीं भरेगी, बल्कि इसी तरह रेलगाडि़यों की छतों पर सवार होकर नौकरी की तालाश में उसे शहर की ओर निकलना होगा। जहां उसकी मौत हो जाये तो जिम्मेदारी किसी की नहीं होगी। अगर यह सारे सवाल पत्रकारीय माध्यमों में नहीं उठे तो यह कहने में क्या हर्ज है कि अब पत्रकारीय समझ बदल चुकी है। उसकी जरूरत और उसका समाज भी बदल चुका है। लेकिन पत्रकारीय पाठ तो यही कहता है कि पत्रकारिता तात्कालिकता और समसामयिकता को साधने की कला है। तो क्या अब तात्कालिकता का मतलब महज वह दृश्य है जो परिणाम के तौर पर इतना असरकारक हो कि वह उसके अंदर जिन्दगी के तमाम पहलुओं को भी अनदेखा कर दे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर खबरों के मिजाज को इस दौर में देखे तो किसी भी खबर में आत्मा नहीं होती। यानी पढ़ने वाला अपने को खबर से जोड़ ले इसका कोई सरोकार नहीं होता। और हर खबर एक निर्णायक परिणाम खोजती है। चाहे वह बेरोजगारों की जिन्दगी के अनछुये पहलुओं का सच तस्वीर के साये में खोना हो या फिर ए राजा से लेकर सुरेश कलमाड़ी, अशोक चव्हाण, पीजे थॉमस सरीखे दर्जनों नेताओं-अधिकारियों के भ्रष्टाचार पर सजा के निर्णय के ओर सत्ता को ढकेलना, ब्रेकिंग न्यूज और सजा का इंतजार, राजनीति संघर्ष यानी निर्णय जैसे ही हुआ कहानी खत्म हुई। कॉमनवेल्थ को सफल बनाने से जुड़े डेढ़ हजार से ज्यादा कर्मचारियों का कलमाड़ी की वजह से वेतन रुक गया यह खबर नहीं है। आदर्श सोसायटी बनाने में लगे तीन सौ 85 मजदूरों को पगार उनके ठेकेदार ने रोक दी, यह खबर नहीं है। असल में इस तरह हर चेहरे के पीछे समाज के ताने-बाने की जरुरत वाली जानकारी अगर खबर नहीं है तो फिर समझना यह भी होगा कि पत्रकारीय समझ चाहे अपने अपने माध्यमों में चेहरे गढ़ कर टीआरपी तो बटोर लेगी लेकिन पढ़ने वालों को साथ लेकर ना चल सकेगी। ना ही किसी भी मुद्दे पर सरकार का विरोध जनता कर पायेगी। और आज जैसे तमाम राजनेता एक सरीखे लगते हैं जिससे बदलाव या विकल्प की बयार संसद के हंगामे में गुम हो जाती है। ठीक इसी तरह अखबार या न्यूज चैनल या फिर संपादक या रिपोर्टर को लेकर भी सिर्फ यही सवाल खड़ा होगा। यानी अब वह वक्त इतिहास हो चुका है जब सवाल खड़ा हो कि साहित्य को पत्रकारिता में कितनी जगह दी जाये या दोनो एक दूसरे के बगैर अधूरे हैं। या फिर पत्रकारिता या साहित्य की भाषा आवाम की हो या सत्ता की। जिससे मुद्दों की समझ सत्ता में विकसित हो या जनता सत्ता को समझ सके।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरअसल यह मिशन से शुरू हुई पत्रकारिता के कौशल में तब्दील होने का सच है। यानी जिस जमाने में देश आजादी की लड़ाई लड़ रहा था और पत्रकारिता उसकी तलवार थी, तब वह मिशन हो सकती थी। उसमें धन और रोजी नहीं थी। लेकिन अब पत्रकारिता धन और रोजी पर टिकी है क्योंकि वैकल्पिक समाज को बहुत तेजी से उस सत्ता ने खत्म किया, जिसे अपने विस्तार में ऐसे माध्यम रुकावट लगते हैं जो एकजुटता का बोध लिये जिन्दगी जीने पर भरोसा करते हैं। यह सत्ता सियासत भी है और कारपोरेट भी। यह शहरी मानसिकता भी है और एकाकी परिवार में एक अदद नौकरी की धुरी पर जीने का नजरिया भी। यह संसद में बैठे जनता की नुमाइन्दगी के नाम पर सत्ता में दोबारा पहुंचने के लिये नीतियों को जामा पहनाने वाले सांसद भी हैं और किसी अखबार या न्यूज चैनलों के कैबिन में दरवाजा बंद कर अपनी कोठरी से अपने संपादक होने के आतंक पर ठप्पा लगाने में माहिर पत्रकार भी। यह सवाल कोई दूर की गोटी नहीं है कि आखिर क्यों देश में कोई लीडर नहीं है, जिसके पीछे आवाम खड़ी हो या कोई ऐसा संपादक नहीं जिसके पीछे पत्रकारों की एक पूरी टीम खड़ी हो। दरअसल इस दौर में जिस तरह सवा चार लाख बेरोजगार एक बडी तादाद होकर भी अपने आप में अकेले हैं। ठीक इसी तरह देश में किसी ट्रेन दुर्घटना में मरते सौ लोग भी अकेले हैं और देश में रोजगार दफ्तर में रजिस्‍टर्ड पौने तीन करोड़ बेरोजगार भी अकेले ही हैं। कहा यह भी जा सकता है कि पत्रकारीय समाज के बडे़ विस्तार के बावजूद संपादक भी निरा अकेला ही है। और साहित्यकर्म में लगा सहित्यकार भी अकेला है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसलिये पत्रकारिता से अगर सरोकार खत्म हुआ हो तो साहित्य से सामूहिकता का बोध लिये रचनाकर्म। इसलिये पहली बार मुद्दों की टीले पर बैठे देश का हर मुद्दा भी अपने आप में अकेला है। और उसके खिलाफ हर आक्रोश भी अकेला है। जो मिस्र, जार्डन, यूनान, ट्यूनेशिया को देखकर कुछ महसूस तो कर रहा है लेकिन खौफजदा है कि वह अकेला है। और पत्रकारीय समझ बिंबों के आसरे खुद को आईना दिखाने से आगे बढ़ नहीं पा रही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेखक पुण्‍य प्रसून वाजपेयी वरिष्‍ठ पत्रकार तथा जी न्‍यूज के संपादक हैं. उनका यह लेख दैनिक भास्‍कर में प्रकाशित हो चुका है. वहीं से साभार लेकर इसे प्रकाशित किया गया है&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2333254526940587404-5460387455497373304?l=mudda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mudda.blogspot.com/feeds/5460387455497373304/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2333254526940587404&amp;postID=5460387455497373304' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/5460387455497373304'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/5460387455497373304'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mudda.blogspot.com/2011/02/blog-post.html' title='जो सवाल पत्रकारीय कौशल में दफन हो गये'/><author><name>विकास शिशोदिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08157576148519764276</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='18' src='http://1.bp.blogspot.com/_yCbiUlApr1c/TMVfAgIbU7I/AAAAAAAAAVY/7kaK_w148Jg/S220/sing.png'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2333254526940587404.post-1174299308636938202</id><published>2010-12-08T04:37:00.000-08:00</published><updated>2010-12-08T04:42:56.412-08:00</updated><title type='text'>हम पत्रकारों को पता है कि हमारे बीच कौन पत्रकार दल्ला है</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_yCbiUlApr1c/TP99I1IH-eI/AAAAAAAAAV4/oxUxIl_mzNE/s1600/Ashutosh.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 267px; height: 320px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_yCbiUlApr1c/TP99I1IH-eI/AAAAAAAAAV4/oxUxIl_mzNE/s320/Ashutosh.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5548290856597322210" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;राडिया के टेप से निकलते शुभ संकेत : नया-नया पत्रकार बना था। दोस्त की शादी में गया था। दोस्त ने अपने एक ब्यूरोक्रेट रिश्तेदार से मिलवाया। अच्छा आप पत्रकार हैं? पत्रकार तो पचास रुपये में बिक जाते हैं। काटो तो खून नहीं। क्या कहता? पिछले दिनों जब राडिया का टेप सामने आया तो उन बुजुर्ग की याद हो आई। बुजुर्गवार एक छोटे शहर के बड़े अफसर थे। उनका रोजाना पत्रकारों से सामना होता था। अपने अनुभव से उन्होंने बोला था। जिला स्तर पर छोटे-छोटे अखबार निकालने वाले ढेरों ऐसे पत्रकार हैं जो वाकई में उगाही में लगे रहते हैं। ये कहने का मेरा मतलब बिलकुल नहीं है कि जिलों में ईमानदार पत्रकार नहीं होते। ढेरों हैं जो बहुत मुश्किल परिस्थितियों में जान जोखिम में डालकर पत्रकारिता कर रहे हैं। इनकी संख्या शायद उतनी नहीं है जितनी होनी चाहिये। ऐसे में राडिया टेप आने पर कम से कम मैं बिलकुल नहीं चौंका।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हालांकि इन टेपों में पैसे के लेन-देन का जिक्र नहीं है। इसमें किसी को मंत्री बनाने के लिये लॉबिंग की जा रही है। पूरी बातचीत इशारा करती है- एक, किस तरह से बड़े-बड़े कॉर्पोरेट घराने सरकार की नीतियों को प्रभावित करते हैं? दो, किस तरह से नेता इन कॉर्पोरेट घरानों का इस्तेमाल मंत्री बनने के लिये करते हैं? तीन, किस तरह से पत्रकार कॉर्पोरेट घराने और नेता के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाते हैं? चार, किस तरह से इन तीनों का कॉकटेल सत्ता में फैले भ्रष्टाचार को आगे बढा़ता है? पत्रकार ये कह सकते हैं कि उसे खबरें पाने के लिये नेताओं और बिजनेस घरानों से बात करनी होती है। उन्हें अपना सोर्स बनाने के लिये नेताओं और विजनेस घरानों से उनके मन लायक बात भी करनी होती है। ये बात सही है लेकिन ये कहां तक जायज है कि पत्रकार बिजनेस हाउस से डिक्टेशन ले और जैसा बिजनेस हाउस कहे वैसा लिखे? या नेता को मंत्री बनाने के लिये उसकी तरफदारी करे?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हाई प्रोफाइल पंच-संस्कृति अंग्रेजी की पत्रकारिता में इसे भले ही लॉबिंग कहा जाता हो या फिर खबर के लिये नेटवर्किंग लेकिन खाटी हिंदी मे इसे 'दल्लागिरी' कहते हैं और ऐसा करने वालों को 'दल्ला'। और मुझे ये कहने में जरा भी संकोच नहीं है कि हम पत्रकारों को ये पता है कि हमारे बीच कौन पत्रकार 'दल्ला' है और कौन 'दल्लागिरी' कर रहा है। इसी दिल्ली में क्या हम नहीं जानते कि जो लोग पैदल टहला करते थे कैसे रातोंरात उनकी कोठियां हो गईं और बड़ी बड़ी गाडियों में घूमने लगे? टीवी की बदौलत पत्रकारिता में पैसा तो पिछले दस सालों से आया है। उसके पहले पत्रकार बेचारे की हैसियत ही क्या थी? झोलाछाप, टूटी चप्पल में घूमने वाला एक जंतु जो ऑफिस से घर जाने के लिये डीटीसी बस का इंतजार करता था। उस जमाने में भी कुछ लोग ऐसे थे जो चमचमाती गाड़ियों में सैर करते थे और हफ्ते में कई दिन हवाई जहाज का मजा लूटते थे। इनमें से कुछ तो खालिस रिपोर्टर थे और कुछ एडीटर। इनकी भी उतनी ही तनख्वाह हुआ करती थी जितनी की ड़ीटीसी की सवारी करने वाले की।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इनमे से कई ऐसे भी थे जिनकी सैलरी बस नौकरी का बहाना था। जब पत्रकारिता में आया तब दिल्ली में एक खास बिजनेस घराने के नुमाइंदे से मिलना राजधानी के सोशल सर्किट में स्टेटस सिम्बल हुआ करता था। और जिनकी पहुंच इन 'महाशय' तक नहीं होती थी वो अपने को हीन महसूस किया करते थे। ऐसा नहीं था कि पाप सिर्फ बिजनेस घराने तक ही सिमटा हुआ था। राजनीति में भी पत्रकारों की एक जमात दो खांचों मे बंटी हुई थी। कुछ वो थे जो कांग्रेस से जुड़े थे और कुछ वो जो बीजेपी के करीबी थे। और दोनों ही जमकर सत्ता की मलाई काटा करते थे। जो लोग सीधे मंत्रियों तक नहीं पंहुच पाते थे उनके लिये ये पत्रकार पुल का काम किया करते थे। ट्रासफर पोस्टिंग के बहाने इनका भी काम चल जाया करता था। और जेब भी गरम हो जाती थी। सत्ता के इस जाल में ज्यादा पेच नहीं थे। बस पत्रकार को ये तय करना होता था कि वो सत्ता के इस खेल में किस हद तक मोहरा बनना चाहता था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्षेत्रीय पत्रकारिता में सत्ता का ये खेल और भी गहरा था। मुझे याद है भोपाल के कुछ पत्रकार जिन्हें इस बात का अफसोस था कि वो अर्जुन सिंह के जमाने में क्यों नहीं रिपोर्टर बने। लखनऊ में भी ढेरों ऐसे पत्रकार थे जो कई जमीन के टुकड़ों के मालिक थे। किसी को मुलायम ने उपकृत किया तो किसी को वीर बहादुर सिंह ने। और जब लखनऊ विकास प्राधिकरण के मामले में मुलायम पर छींटे पड़े तो पत्रकारों की पूरी लिस्ट बाहर आ गई। इसमें कुछ नाम तो बेहद चौंकाने वाले थे। हालात आज भी नहीं बदले हैं। आज भी उत्तर प्रदेश की राजधानी में किसी रिपोर्टर या एडीटर के लिये राज्य सरकार के खिलाफ लिखने के लिये बड़ा जिगरा चाहिये। अब इस श्रेणी में नीतीश के बिहार का पटना भी शामिल हो गया है। फर्क सिर्फ इतना आया है अब मलाई सिर्फ रिपोर्टर और एडीटर ही नहीं काट रहे हैं। अखबार के मालिक भी इस फेहरिश्त में शामिल हो गये हैं। अखबार मालिकों को लगने लगा है कि वो क्यों रिपोर्टर या एडीटर पर निर्भर रहें। अखबार उनका है तो सत्ता के खेल में उनकी भी हिस्सेदारी होनी चाहिये। तब नया रास्ता खुला। और फिर धीरे धीरे पेड न्यूज भी आ गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ लोग ये कह सकते हैं कि आर्थिक उदारीकरण ने इस परंपरा को और पुख्ता किया है या यो कहें कि बाजार के दबाव और प्रॉफिट के लालच ने मीडिया मालिकों को सत्ता के और करीब ला दिया है। दोनों के बीच एक अघोषित समझौता है। और अब कोई भी गोयनका किसी भी बिजनेस हाउस और सत्ता संस्थान से दो-दो हाथ कर घर फूंक तमाशा देखने को तैयार नहीं है। क्योंकि ये घाटे का सौदा है। और इससे खबरों के बिजनेस को नुकसान होता है। क्योंकि खबरें अब समाज से सरोकार से नहीं तय होतीं बल्कि अखबार का सर्कुलेशन और न्यूज चैनल की टीआरपी ये तय करती है कि खबर क्या है? ये बात पूरी तरह से गलत भी नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे में सवाल ये है कि वो क्या करे जो ईमानदार है और जो सत्ता के किसी भी खेल में अपनी भूमिका नहीं देखते, जो खालिस खबर करना चाहते हैं? तो क्या ये मान लें कि ईमानदारी से पत्रकारिता नहीं की जा सकती? मैं निराश नही हूं। एक, पिछले दिनों जिस तरह से मीडिया ने एक के बाद एक घोटालों को खुलासा किया है वो हिम्मत देता है। और हमें ये नहीं भूलना चाहिये कि पत्रकारों की पोल खोलने वाले राडिया के टेप का खुलासा भी तो पत्रकारों ने ही किया है? दो, इसमे संदेह नहीं है कि बाजार ने पत्रकारिता को बदला है लेकिन बाजार का एक सच ये भी है कि प्रतिस्पर्धा और प्रोडक्ट की गुणवत्ता बाजार के नियम को तय करते हैं। और लोकतंत्र बाजारवादी आबादी को इतना समझदार तो बना ही देता है कि वो क्वॉलिटी को आसानी से पहचान सके। बाजार का यही चरित्र आखिरकार मीडिया की गंदी मछलियों को पानी से बाहर करने मे मदद करेगा। और जीतेगी अंत में ईमानदार पत्रकारिता ही, सत्ता की दलाली नहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;लेखक आशुतोष आईबीएन7 के मैनेजिंग एडिटर हैं. आईबीएन7 से जुड़ने से पहले आशुतोष खबरिया चैनल आजतक की टीम का हिस्सा थे. वह प्राइमटाइम के कुछ खास ऐंकर्स में से एक थे. ऐंकरिंग के अलावा फील्ड और डेस्क पर खबरों का प्रबंधन उनकी प्रमुख क्षमता रही है. वह भारत के एक छोर से दूसरे छोर तक खबरों की कवरेज से जुड़े रहे हैं. उनका यह लिखा उनके ब्लाग &lt;a href="http://khabar.ibnlive.in.com/blogs/16/554.html"&gt;ब्रेक के बाद&lt;/a&gt; से साभार लिया गया है.&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2333254526940587404-1174299308636938202?l=mudda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mudda.blogspot.com/feeds/1174299308636938202/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2333254526940587404&amp;postID=1174299308636938202' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/1174299308636938202'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/1174299308636938202'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mudda.blogspot.com/2010/12/blog-post.html' title='हम पत्रकारों को पता है कि हमारे बीच कौन पत्रकार दल्ला है'/><author><name>विकास शिशोदिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08157576148519764276</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='18' src='http://1.bp.blogspot.com/_yCbiUlApr1c/TMVfAgIbU7I/AAAAAAAAAVY/7kaK_w148Jg/S220/sing.png'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_yCbiUlApr1c/TP99I1IH-eI/AAAAAAAAAV4/oxUxIl_mzNE/s72-c/Ashutosh.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2333254526940587404.post-8704391814144585947</id><published>2010-11-18T23:12:00.000-08:00</published><updated>2010-11-18T23:14:23.397-08:00</updated><title type='text'>हसरत</title><content type='html'>पंकज रामेन्दू&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिंदगी को बस इसलिए दोबारा रखना चाहूंगा&lt;br /&gt;मैं फिर तुझे उतनी ही शिद्दत से तकना चाहूंगा ।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;प्यार तेरा पा सकूं मेरी यही कोशिश नहीं,&lt;br /&gt;बन के खुशब तेरी सांसो में बसना चाहूंगा।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;तेरी सूरत मेरी आंखो में हो बस यही हसरत नहीं&lt;br /&gt;मैं ख्वाब ओ ख्यालों में तुझको भी दिखना चाहूंगा ।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;जिसकी संगत से हुस्न निखरे औऱ बढ़े रंगत&lt;br /&gt;बन के वो श्रंगार तेरे अंग अंग पे सजना चाहूंगा&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;हो सकता है लगे  तुझे ये बाते बहुत बड़ी बड़ी&lt;br /&gt;इंच भर मुस्कान की खातिर, में बिकना चाहूंगा ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2333254526940587404-8704391814144585947?l=mudda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mudda.blogspot.com/feeds/8704391814144585947/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2333254526940587404&amp;postID=8704391814144585947' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/8704391814144585947'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/8704391814144585947'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mudda.blogspot.com/2010/11/blog-post.html' title='हसरत'/><author><name>विकास शिशोदिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08157576148519764276</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='18' src='http://1.bp.blogspot.com/_yCbiUlApr1c/TMVfAgIbU7I/AAAAAAAAAVY/7kaK_w148Jg/S220/sing.png'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2333254526940587404.post-7608743567335443161</id><published>2010-10-09T20:12:00.000-07:00</published><updated>2010-10-09T20:16:36.428-07:00</updated><title type='text'>बिहार चुनाव की खामोशी</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_yCbiUlApr1c/TLEwBr-f9tI/AAAAAAAAAVQ/j_LwTVagAkk/s1600/bihar-election-2010-janokti_com_.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 256px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_yCbiUlApr1c/TLEwBr-f9tI/AAAAAAAAAVQ/j_LwTVagAkk/s320/bihar-election-2010-janokti_com_.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5526251023303177938" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;पुण्य प्रसून बाजपेयी       &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जहां राजनीति का ककहरा अक्षर ज्ञान से पहले बच्चे सीख लेते हों, वहां चुनाव का मतलब सिर्फ लोकतंत्र को ढोना भर नहीं होता। उसका अर्थ सामाजिक जीवन में अपनी हैसियत का एहसास करना भी होता है। लेकिन इस बार ऐसा कुछ भी नहीं है तो मतलब साफ है राजनीति की हैसियत अब चुनाव से खिसक कर कहीं और जा रही है। चुनाव के ऐलान के बाद से बिहार में जिस तरह की खामोशी चुनाव को लेकर है, उसने पहली बार वाकई यह संकेत दिये हैं कि राजनीतिक तौर पर सत्ता की महत्ता का पुराना मिजाज बदल रहा है। लालू यादव के दौर तक चुनाव का मतलब सत्ता की दबंगई का नशा था। यानी जो चुनाव की प्रक्रिया से जुड़ा उसकी हैसियत कहीं न कहीं सत्ताधारी सरीखी हो गयी। और सत्ता का मतलब चुनाव जीतना भर नहीं था, बल्कि कहीं भी किसी भी पक्ष में खड़े होकर अपनी दबंगई का एहसास कराना भी होता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लालू 15 बरस तक बिहार में इसीलिये राज करते रहे क्योंकि उन्होंने सत्ता के इस एहसास को दिमागी दबंगई से जोड़ा। लालू जब सत्ता में आये तो 1989-90 में सबसे पहले यही किस्से निकले की कैसे उंची जाति के चीफ सेक्रेट्ररी से अपनी चप्पल उठवा दी। या फिर उंची जाति के डीजीपी को पिछड़ी जाति के थानेदार के सामने ही माफी मंगवा दी। यानी राजनीतिक तौर पर लालू यादव ने नेताओ को नहीं बल्कि जातियों की मानसिकता में ही दबंगई के जरीये समूचे समाज के भीतर सत्ता की राजनीति के उस मिजाज को जगाया, जिसमें चुनाव में जीत का मतलब सिर्फ सत्ता नहीं बल्कि अपने अपने समाज में अपनो को सत्ता की चाबी सौंपना भी था। सत्ता की कई चाबी का मतलब है लोकतंत्रिक व्यवस्था को छिन्न-भिन्न करने की ताकत। यानी पुलिस प्रशासन से लेकर व्यवस्था बनाये रखने वाले किसी भी संस्थान की हैसियत चाहे मायने रखे लेकिन चुनौती देने और अपने पक्ष में हर निर्णय को कराने की क्षमता दबंगई वाले सत्ताधारी की ही है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चूंकि जातीय समीकरण के आसरे चुनाव जीतने की मंशा चाहे लालू प्रसाद यादव या नीतीश कुमार में हो, लेकिन लालू के दौर में जातीय समीकरण का मतलब हारी हुई जातियों के भीतर भी दबंगई करता एक नेता हमेशा रहता था। फिर यह सत्ता आर्थिक तौर पर अपने घेरे में यानी अपने समाज में रोजगार पैदा करने का मंत्र भी होता है। इसलिये चुनाव का मतलब बिहार में सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों को प्रभावित करने वाला भी है। लेकिन नीतीश कुमार के दौर में यह परिस्थितियां न सिर्फ बदली बल्कि नीतीश की राजनीति और इस दौर की आर्थिक परिस्थितियो ने दबंगई सत्ता के तौर तरीको को ही बदल दिया। 1990 से 1995 तक सत्ता की जो दबंगई कानून व्यवस्था को खारिज कर रही थी, बीते पांच बरस में नीतीश ने समाज के भीतर जातियों के उस दबंग मिजाज को ही झटका दिया और राजनीतिक बाहुबली इसी दौर में कानून के शिकंजे में आये। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सवाल यह नहीं है कि नीतीश कुमार के शासन में करीब 45 हजार अपराधियों को पकड़ा गया या कहें कानून के तहत कार्रवाई की गई। असल में अपराधियो पर कार्रवाई के दौरान वह राजनीति भी खारिज हुई जिसमें सत्ता की खुमारी सत्ताधारी जातीय दबंगई को हमेशा बचा लेती थी। यानी पहली बार मानसिक तौर पर जातीय सत्ता के पीछे आपराधिक समझ कत्म हुई। यह कहना ठीक नहीं होगा कि बिहार में जातीय समिकरण की राजनीति ही खत्म हो गई। हकीकत तो यह है कि राजद या जेडीयू में जिस तरह टिकटों की मांग को लेकर हंगामा हो रहा है, वह जातीय समीकरण के दुबारा खड़े होने को ही जतला रहा है। यानी अपराध पर नकेल कसने या बाहुबलियों को सलाखों के पीछे अगर बीते पांच साल में नीतीश सरकार ने भेजा है तो भी जातीय समीकरण को वह भी नहीं तोड़ पाये हैं। वहीं नीतीश के दौर में एक बडा परिवर्तन बाजार अर्थव्यवस्था के फैलने का भी है। सिर्फ सड़कें बनना ही नहीं बल्कि उनपर दौडती गाड़ियों की खरीद फरोख्त में बीत पांच साल में करीब तीन सौ फिसदी की वृद्धि लालू यादव के 15 साल के शासन की तुलना में बढ़ी। और रियल इस्टेट में भी बिहार के शहरी लोगों ने जितनी पूंजी चार साल में लगायी, उतनी पूंजी 1990 से 2005 के दौरान भी नहीं लगी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह परिवर्तन सिर्फ बिहारियो के अंटी में छुपे पैसे के बाहर आने भर का नहीं है बल्कि पुरानी मानसिकता तोड़ कर उपभोक्ता मानसिकता में ढलने का भी है। इस मानसिकता में बदलाव की वजह ग्रामीण क्षेत्रों या कहें खेती पर टिकी अर्थव्यवस्था को लेकर नीतीश सरकार की उदासी भी है। नीतीश कुमार ने चाहे मनमोहन इक्नामिक्स को बिहार में अभी तक नहीं अपनाया है, लेकिन मनमोहन सिंह की अर्थव्यवस्था में जिस तरह बाजार और पूंजी को महत्ता दी जा रही है, नीतीश कुमार उससे बचे भी नहीं है। इसका असर भी यही हुआ है कि खेती अर्थव्यस्था को लेकर अभी भी बिहार में कोई सुधार कार्यक्रम शुरु नहीं हो पाया है। जमीन उपजाऊ है और बाजार तक पहुंचने वाले रास्ते ठीक हो चले हैं, इसके अलावे कोई इन्फ्रास्ट्रक्चर नही बनाया गया। बल्कि नीतीश कुमार की विश्वास यात्रा पर गौर करें तो 31 जिलों में 12416 योजनाओं का उद्घाटन नीतिश कुमार ने किया। सभी योजनाओ की राशि को अगर मिला दिया जाये तो वह 35 अरब 51 करोड 95 लाख के करीब बैठती है। इसमें सीधे कृषि अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने वाली योजनायें 18 फीसदी ही हैं। जबकि नीतीश कुमार ने 25 दिसंबर 2009 से 25 जून 2010 के दौरान जो भी प्रवास यात्रा की उसमें ज्यादातर जगहों पर उनके टेंट गांवों में ही लगे। यानी जो ग्रामीण समाज सत्ता की दबंगई लालू यादव के दौर में देखकर खुद उस मिजाज में शरिक होने के लिये चुनाव को अपना हथियार मानता और बनाता था...वही मिजाज नीतीश के दौर में दोधारी तलवार हो गया। यानी चुनाव के जरीये सत्ता की महत्ता विकास की ऐसी महीन लकीर को खींचना है, जिसमें खेती या ग्रामीण जीवन कितना मायने रखेगा यह दूर की गोटी हो गई। यानी देश में मनमोहन इक्नामिक्स में बजट तैयार करते वक्त अब वित्त मंत्री को कृषि से जुड़े समाज की जरुरत नहीं पड़ती और बिहार में नीतिश की इक्नामिक्स लालू के दौर की जर्जरता की नब्ज पकड कर विकास को शहरी-ग्रामीण जीवन का हिस्सा बनाकर राजनीति भी साधती है और मनमोहन के विकास की त्रासदी में बिहार का सम्मान भी चाहती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यानी चुनाव को लेकर बिहार में बदले बदले से माहौल का एक सच यह भी है कि राजनीति अब रोजगार नहीं रही। रोजगार का मतलब सिर्फ रोजी-रोटी की व्यवस्था भर नहीं है बल्कि राजनीतिक कैडर बनाने की थ्योरी भी है और सत्ता को समानांतर तरीके से चुनौती देना भी है। दरअसल, नीतीश के सुशासन का एक सच यह भी है कि समूची सत्ता ही नीतीश कुमार ने अपने में सिमटा ली है और खुद नीतीश कुमार सत्ताधारी होकर भी दबगंई की लालू सोच से हटकर खुद को पेश कर रहे हैं, जिनके वक्त सत्ता का मतलब जाति या समाज पर धाक होती थी। बिहार में राजनीतिक विकास का चेहरा इस मायने में भी पारपंरिक राजनीति से हटकर है, क्योकि नीतीश कुमार की करोड़ों-अरबो की योजनाएं बिहारियों को सरकार की नीतियों के भरोसे ही जीवन दे रही हैं। जो कि पहले जातीय आधार पर जीवन देती थी। मसलन राज्यभर के शिक्षको के वेतन की व्यवस्था कराने का ऐलान हो या फिर दो लाख से ज्यादा प्रारंभिक शिक्षकों की नियुक्ति या फिर 20 हजार से ज्यादा रिटायर सौनिकों को काम में लगाना। और इसी तरह कमोवेश हर क्षेत्र के लिये बजट की व्यवस्था कर सभी तबके को राहत देने की बात। लेकिन यह पूरी पहल मनरेगा सरीखी ही है। जिसमें लोगो को एकमुश्त वेतन तो मिल रहा है लेकिन इसका असर राज्य के विकास पर क्या पड़ रहा है, यह समझ पाना वाकई मुश्किल है। क्योंकि सारे बजट लक्ष्यविहिन है। एक लिहाज से कहें तो वेतन या रोजगार के साधन खड़ा न कर पाने की एवज में यह धन का बंटवारा है। लेकिन इसका असर भी राजनीति की पारंपरिक धार को कम करता है और राजनीति को किसी कारपोरेट की तर्ज पर देखने से भी नहीं कतराता। कहा यह भी जा सकता है कि बिहार में भी पहली बार चुनाव के वक्त यह धारणा ही प्रबल हो रही है कि जिसके पास पूंजी है, वह सबसे बडी सत्ता का प्रतीक है। और सत्ता के जरीये पूंजी बनाना अब मुश्किल है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहा यह भी जा सकता है कि विकास के जिस ढांचे की बिहार में जरुरत है, उसमें मनमोहन सिंह का विकास फिट बैठता नहीं और नीतीश कुमार के पास उसका विकल्प नहीं है। और लालू यादव की पारंपरिक छवि नितीश के अक्स से भी छोटी पड़ रही है। इसका चुनावी असर परिवर्तन के तौर पर यही उभरा है कि जातियों के समीकरण में पांच बरस पहले जो अगड़ी जातियां नीतिश के साथ थीं, अब उनके लिये कोई खास दल मायने नहीं रख रहा। जो कांग्रेस पांच बरस पहले अछूत थी, अब उसे मान्यता मिलने लगी है। और विकास पहली बार एक मुद्दा रहा है। लेकिन यह तीनों परिवर्तन भी बिहार की राजनीतिक नब्ज से दूर हैं, जहां जमीन और खेती का सवाल अब भी सबसे बड़ा है। यानी भूमि सुधार से लेकर खेती को विकास के बाजार मॉडल के विकल्प के तौर पर जो नेता खड़ा करेगा, भविष्य का नेता वहीं होगा। नीतीश कुमार ने तीन साल पहले भू-अर्जन पुनस्थार्पन एंव पुनर्वास नीति के जरीये पहल करने की कोशिश जरुर की लेकिन महज कोशिश ही रही क्योकि बिहार की पारंपरिक राजनीति की आखिरी सांसें अभी भी चल रही हैं। शायद इसीलिये इसबार चुनाव में जेपी की राह से निकले नीतीश-लालू आमने-सामने खड़े हैं। जबकि बिहार की राह जेपी से आगे की है और संयोग से यह रास्ता कांग्रेस के युवराज भी समझ पा रहे हैं, इसलिये वह युवा राजनीति को उस बिहार में खोज रहे हैं, जहां राजनीति का ककहरा बचपन में ही पढ़ा जाता है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2333254526940587404-7608743567335443161?l=mudda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mudda.blogspot.com/feeds/7608743567335443161/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2333254526940587404&amp;postID=7608743567335443161' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/7608743567335443161'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/7608743567335443161'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mudda.blogspot.com/2010/10/blog-post_09.html' title='बिहार चुनाव की खामोशी'/><author><name>विकास शिशोदिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08157576148519764276</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='18' src='http://1.bp.blogspot.com/_yCbiUlApr1c/TMVfAgIbU7I/AAAAAAAAAVY/7kaK_w148Jg/S220/sing.png'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_yCbiUlApr1c/TLEwBr-f9tI/AAAAAAAAAVQ/j_LwTVagAkk/s72-c/bihar-election-2010-janokti_com_.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2333254526940587404.post-7647247850747517230</id><published>2010-10-01T08:19:00.001-07:00</published><updated>2010-10-01T08:20:30.341-07:00</updated><title type='text'>संघर्षों का दौर</title><content type='html'>. मेरे संघर्षों का दौर अभी बाकी है, ज़रा ठहरो&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; इस रात की भोर अभी बाकी है, ज़रा ठहरो&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तू ले ले और इम्तेहान जिन्दगी, में भी तैयार हूं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरी किस्मत में ज़ोर अभी बाकी है, ज़रा ठहरो&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जानता हूं इस तपिश भरी ज़मीन पर बूंदे गिरी हैं चंद&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बरसना बादलों का घनघोर अभी बाकी है ज़रा ठहरो&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह दुनिया कभी कि गर्त में चली गई होती&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; यहाँ ईमान कुछ और अभी बाकी है ज़रा ठहरो&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्वाती तुम न घबराना वक्त के बदलावों से&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तेरी आस वाला चकोर अभी बाकी है ज़रा ठहरो&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt; इतनी जल्दी हार ना मानना "मानव"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ पल ओर अभी बाकी है, ज़रा ठहरो&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;br /&gt;पंकज रामेंदु मानव&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2333254526940587404-7647247850747517230?l=mudda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mudda.blogspot.com/feeds/7647247850747517230/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2333254526940587404&amp;postID=7647247850747517230' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/7647247850747517230'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/7647247850747517230'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mudda.blogspot.com/2010/10/blog-post_01.html' title='संघर्षों का दौर'/><author><name>विकास शिशोदिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08157576148519764276</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='18' 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साल पहले एक बड़ी जंगी शिकस्त भी खाई है.ये बात हमें याद हो तो ये भी याद होगा उस शिकस्त की वजह क्या थी ? हार के तमाम कारणों में एक बड़ी वजह विभिन्न राज्यों और सेनाओं के बीच सुचारू रूप से संवाद ना हो पाना भी था.इसकी एक वजह जहान संवाद के लिए जरुरी माध्यम का ना होना था वहीं एक वजह भाषागत दूरियां भी थी.इसके सौ साल बाद जब हमें बाजी पलटने का मौका हाथ लगा तो हमने आज़ादी के आलावें भी बहुत कुछ हासिल किया.जिसमें भारत की एकता के साथ -साथ सुन्दर भारत का एक खुबसूरत ख़्वाब भी  पाया और साथ ही पाई एक प्यारी सी भाषा हिंदी.जिसे विभिन्न बोलियों को मिलकर खड़ा किया गया था.जिसके जरिये हम पूरे देश के लोगों से आसानी से बातें कर सकते थे.एक ऐसी भाषा जिसमें भारत की विविधता पूर्ण संस्कृति,धर्म और संस्कृति की भी झलक दिखती है.लेकिन जैसा की होता है हर खुबसूरत ख्वाब कभी ना कभी टूटते ही  हैं. वैसे ही भारत के सुन्दर भविष्य का ख़्वाब भी टुटा और साथ में ख़तम होती गई हिंदी की एकता और अखंडता भी. इस अखंडता पर ये संकट वाहरी ही नहीं बल्किं भीतरी भी है.इस संकट से निकले के लिए,अपनी भाषा को बचाने के लिए कोल्कता के संगठन 'अपनी भाषा' के प्रोफेसर अमरनाथ और डॉ. ऋषिकेश राय देश भर के बुद्धिजीवियों से संवाद कर रहे हैं.और इसी सिलसिले को आगे बढ़ाते हुवे वे  एक गोष्ठी '' हिंदी उसकी बोलियाँ और संविधान की आठवीं अनुसूची '' दिल्ली में ''गाँधी शांति प्रतिष्ठान'' में 22 अगस्त को आयोजित किये मिलते हैं.जहाँ वे हिंदी पर छाए संकट की लोगों को याद दिलाते हैं...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;               संगोष्ठी दो सत्रों में आयोजित होती है.प्रथम सत्र का संचालन डॉ. ऋषिकेश राय करते हैं और अध्यक्षता वरिष्ठ कथाकार हिमांशु जोशी करते हैं.विषय प्रस्तावना में प्रोफेसर अमरनाथ अपनी चिंता लोगों के सामने रखते हैं.किस तरह कुछ दिनों पहले हिंदी की एक बोली मैथली को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कर हिंदी के समनांतर दर्जा दे दिया गया.उसके बाद हिंदी पट्टी  के लोग अपनी अपनी बोली को संविधान के आठवीं अनुसूची में शामिल करने को लेकर आये दिन आन्दोलन कर रहे हैं.खतरे की तरफ वे इशारा करते हुवे कहते हैं - दरअसल बात सिर्फ इतनी नहीं है की किसी बोली को हिंदी के बराबर दर्जा दिया जा रहा है दरअसल बात ये है की बोली और भाषा के नाम पर कुछ लोग अपनी राजनितिक महत्वकांक्षा साध रहे हैं.आज यदि किसी बोली को भाषा का दर्जा दे दिया जाता है तो कल उस भाषा के आधार पर एक अलग प्रदेश की मांग उठ खड़ी होती है.इसके समर्थक उस बोली के तमाम साहित्यकार भी है क्योंकि आज उन्हें किसी वजह से आकादमिक पुरस्कार नहीं मिल पता तो. जब-तब वे अलग प्रदेश और अलग भाषा की बात उठाने लगते हैं.,जाहिर है प्रदेश बनने के बाद अलग से उस भाषा की एक आकादमी बनेगी और इन लेखकों को सम्मान मिलने में आसानी होगी. आगे कहते हैं खतरा सिर्फ यही नहीं है- हिंदी को राष्ट्रिय भाषा का दर्जा इस वजह से नहीं मिला की इसका साहित्य बहुत समृद्ध और विशाल है, बल्किं इस वजह से मिला की हिंदी क्षेत्र में बोले जानी वाली बोलियों के लोगों के संख्या बल को देखते हुवे ही इसे राष्ट्रिय भाषा होने का अवसर मिला.मगर अब ये अखंडता खतरे में है.क्योंकि मैथली के बाद छत्तीसगढ़ी,बुन्देली, राजस्थानी,भोजपुरी के इलाकों से इन्हें अलग भाषा का दर्जा दिए जाने की मांग उठने लगी है.यदि इन भाषाओं को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कर लिया जाता है तो जाहिर है हिंदी का रास्ट्रीय स्वरूप खतरे में पड़ जायेगा क्योंकि संख्या बल की वजह से ही तो हिंदी रास्ट्रीय भाषा है.ये एक साम्राज्यवादी शाजिस है ताकि भारत की अखंडता और एकता को तोडा जा सके..एक और गृह युद्ध में इसे धकेला जा सके.वे बताते हैं जहाँ जातिय चेतना मजबूत नहीं होती वहां समय समय पर विघटनकारी शक्तियां अपना सर उठती हैं.दुर्भाग्य से हिंदी जाति की जातिय चेतना मजबूत नहीं है.बोलियाँ ही हिंदी की शक्ति हैं. अपनी बोलियों से अलग होकर हिंदी कमजोर होगी ही, बोलियाँ भी अलग थलग हो कर कमजोर हो जाएँगी.बोलियों का विकास हिंदी के साथ जुड़कर रहने और उसमें रचनाकर्म के जरिये ही संभव है.हाँ यदि कोई समस्या है .बोलियों के लेखक और उनकी रचनाओं को यदि कोर्स की किताबों में पर्याप्त जगह नहीं मिलती तो वे इसके लिए अपनी आवाज उठा सकते हैं.लेकिन हिंदी से अलग होकर वे हिंदी को तो तोड़ेंगे ही साथ ही ये बोलियों के लिए भी खतरनाक स्थिति होगी..&lt;br /&gt;       पहले वक्ता के रूप में  वरिष्ठ समीक्षक कमाल किशोर गोयल एक निबंध पढ़ते हैं .दरअसल अपनी अपनी बोलियों को आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग करने वाले लोग .अपने लिए और अपने लोगों के लिए सत्ता की मांग कर रहे हैं.हिंदी का संसार छिन्न-भिन्न करना हमारी राष्ट्रिय एकता और अखंडता के लिए घातक होगा.हिंदी और उसकी बोलियाँ एक दूसरे की पूरक हैं.प्रभाकर क्षोत्रिय हिंदी को एक नदी के समान बताते हैं जो अपनी राह में आने वाले हर छोटे बड़े तालाबों को अपने अन्दर जब्त कर लेती है.बोलियों की मांग पर वे कहते हैं अभी तो ये शुरुवात है हमने अपने आपको खंडो में बाटना तयं कर लिया है.वहीं प्रभाकर जी के वक्तव्य में से ये चीज भी निकाल कर आती है की किस तरह हम तकनीक से पुर्वाहग्रसित हैं,उनकी ये चिंता है की आज कल हिंदी रोमन में लिखी जा रही है.शायद ये बात उन्हें नहीं मालूम की इसी वजह से कितने सारे लोग अपने आपको हिंदी में व्यक्त कर पा रहे हैं.लिखने दीजिये उन्हें रोमन में एक ना एक दिन वे देवनागरी में भी लिखने ही लगेंगे.हाँ जबरदस्ती आपने लोगों पर देवनागरी में लिखने का दबाव डाला तो शायद ये लोग कभी भी हिंदी में ना लिख पायें.क्योंकि ये वे लोग हैं जो अपना हर काम  इंग्लिश में ही करने के आदि हैं लेकिन ये मातृभाषा से जुड़ाव ही है जो उन्हें हिंदी में लिखने को प्रेरित करती है. अनन्त राम त्रिपाठी हमें संविधान निर्माण की बैठक में ले जाते हैं.जहाँ डॉ. भीमराव आंबेडकर लोगों संविधान सभा में सभी से दरख्वास्त कर रहे हैं - मैं आप सबसे निवेदन करता हूँ.कि हिंदी राष्ट्र भाषा होने के साथ साथ प्रान्तों कि भाषा भी हिंदी होनी चाहिए...कहते हैं वे यदि उस वक़्त आंबेडकर का ये निवेदन स्वीकार कर लिया जाता तो आज हमें ये चिंतन मनन करने कि जरुरत नहीं होती.&lt;br /&gt;   बोलियों कि समस्याओं पर देवेन्द्र चौबे प्रकाश डालते हैं.आखिर क्यों बोलियों के लोग अपनी बोली को संविधान के आठवीं अन्सुची में शामिल करने कि मांग ना करें जब भोजपुरी के बड़े कवि 'भिखारी ठाकुर '' को रामचंद्र शुक्ल अपनी किताब 'हिंदी साहित्य के इतिहास में जगह नहीं देते तो जाहिर भोजपुरी के लोग अपने कवि और बोली के लिए संविधान कि आठवीं अनुसूची में शामिल करने कि मांग करेंगे ही. .हिंदी अकेड्मियों को लताड़ लगते हैं-जाहिर है अकेडमिक हिंदी के सवालों को हाल करने में नाकाम रही.हिंदी को बचाए रखना है तो बोलियों को हिंदी के ढांचे में पर्याप्त स्पेश दे नहीं तो वे अपने स्पेश के लिए लड़ेंगे. हम सिर्फ अच्छा सुनना चाहते हैं अपनी गलतियों कि तरफ ध्यान नहीं देना चाहते. आयोजन कि एक सबसे बड़ी कमी मुझे ये दिखी कि यहाँ बोलियों कि समस्याओं पर देवेन्द्र चौबे के बाद कोई बोलने वाला नहीं था जबकि उनकी समस्याओं पर भी प्रकाश डालने वाले और वक्ता होने चाहिए थे.इसके बाद मृदुला सिन्हा अपनी चिंता में ये जाहिर करती हैं कि मैथली के अलग होने के बाद विद्यापति को यदि कोर्स से हटाया जाता है तो हिंदी का ये दुर्भाग्य होगा कि इतना अच्छा वर्णन पढने से वे वंचित हो जायेंगे.अध्यक्षीय उद्बोधन से  पहले अपनी भाषा कि कि पत्रिका '' भाषा विमर्श'' का लोकार्पण प्रभाकर क्षोत्रिय,चित्र मुगदल और हिमांशु जोशी करते हैं.अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में हिमांशु जोशी इस देश को विडम्बनाओं का देश बताते हैं.एक तरफ हम जहाँ चीजों को स्थापित करते हैं दूसरी तरफ उसे हमीं विखंडित भी करते हैं.रचनाकर्म की आवश्यकता पर वे बल देते हैं साथ ही बताते हैं हिंदी गानों की मिठास भोजपुरी से ही आई है.जब हम गाते हैं तो कभी नहीं लगता की ये हिंदी नहीं बल्किं कोई और बोली ,कोई और भाषा है.भोजपुरी का ही स्वरूप है हिंदी और हिंदी का ही स्वरूप है भोजपुरी ये अलग नहीं हो सकते.ये जो हमें अलग अलग करने की शाजिसें  चल रही हैं इनके पीछे पश्चिमी दुनिया का हाथ है.वे साफ शब्दों में बताते हैं - ''हिंदी का होना होने के लिए भोजपुरी, मैथली,अवधी, वर्ज ,राजस्थानी और हरियाणवी का होना भी जरुरी है''..&lt;br /&gt;            इसके बाद भोजन आवकाश के बाद दूसरे सत्र की कार्यवाही शुरू होती है.जिसमें मंच का संचालन श्री भगवान सिंह करते हैं और अध्यक्षता डॉ.कैलाश पन्त करते हैं.तमाम वक्ता अपने -अपने वक्तव्य में हिंदी पर छाए संकट पर चिंता जाहिर करते हैं.लेकिन  उबाल तब आता है जब वेद प्रताप वैदिक मुद्दे पर बात ना कर मंच का इस्तेमाल अपने अजेंडे का प्रोपेगेंडा फैलाने के लिए करते हैं.किसी के ये कहने पर सर आप सब्जेक्ट से हट कर बोल रहे हैं.पर वे अपने आपे से बाहर हो जाते हैं यहाँ तक की वे मंच की गरिमा और लोकतान्त्रिक मूल्यों की भी तिलांजली देते हुवे मंच से नीचे आकर शायद असहमति वाली आवाज का कलर पकड़ना चाहते हैं.किसी तरह उन्हें मंच के संचालक श्री भगवान सिंह रोकते हैं.आज कल हर सेमिनार का नजारा है ये जहाँ वक्ता अपने से असहमति रखने वाली आवाज को अपने आक्रामक रुख के जरिये दबाना चाहता है.इसके बाद प्रोफेसर चमनलाल आते हैं वे अभी बोलना शुरू ही करते हैं की उनके लिए वक़्त समाप्ति की घोषणा कर दी जाती है.लगता है जैसे आयोजक ये पहले से ही मान बैठे हैं कि फलां वक्ता सही बोलते हैं और फ़ला सही नहीं बोलेंगे.वैदिक जी को जहाँ बोलने का निश्चित समय से आधिक समय दिया जाता है.जबकि वे सब्जेक्ट से हट कर बोलते हैं .बोलते क्या हैं कुछ कुछ प्रवचन से करते हैं.उनके लिए कोई समय सीमा नहीं है .जब प्रोफ़ेसर चमनलाल  जिन्हें स्टुडेंट्स सुनना चाहते हैं उन्हें बोलने का पूरा मौका नहीं दिया जाता जबकि वे मुद्दे पर ही बातें कर रहे होते हैं.इस गरमा गर्मी के बाद कई वक्ता अपनी बात रखते हैं जिनमें अजय तिवारी ,चित्र मुगदल,कृस्नदत्त पालीवाल,परमानद पंचाल आदि .मगर दूसरे सत्र की महफ़िल लुटते  हैं इंदौर से आये प्रभु जोशी माहौल में आई गर्मीं को उनकी शांत और गंभीर आवाज़ धीरे धीरे ठंडा करती है वे बताते हैं कैसे कैसे साम्राज्यवादी ताकतें हमारी भाषा और एकता पर हमला कर रही हैं.उनकी आवाज़ उनके टीवी से जुड़ाव की भी कहानी कहती है.आखिर में कैलाश पन्त चीजों को समेटे हुवे कहते हैं -दरअसल हिंदी के खिलाफ शाजिस का माहौल तभी पैदा कर दिया गया जब संविधान में ''इंडिया दैट इज भारत '' कहा गया ...वे सवाल करते हैं क्या कभी किसी प्रापर नउन का ट्रांसलेशन होता है?&lt;br /&gt;           पूरी संगोष्ठी को देखें तो ये कह सकते हैं ये एक सफल गोष्ठी रही ''अपनी भाषा ''के लोग जिस उद्देश्य से आये थे उसमें वे सफल होते हैं.वे ये याद दिलाने में कामयाब जरुर होते हैं- '' याद रहे हिंदी की बोलियाँ ही उसकी ताकत हैं''..हिंदी और उसकी बोलियों को अलग थलग होने की चिंता से वे दिल्ली के बुद्धिजीवियों को चिन्तित जरुर करते हैं.लेकिन वहीं जरा व्यापक दृष्टीकोण से देखें तो ये संगोष्ठी आगे की लड़ाई कैसे हो? उसका तरीका क्या हो ?इस बारे में कोई दिशा दिखने में असफल दिखती है..&lt;br /&gt;                           -अंजुले श्याम मौर्य &lt;br /&gt;                         anjuleshyam@gmail.com&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2333254526940587404-1066077629769347351?l=mudda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mudda.blogspot.com/feeds/1066077629769347351/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2333254526940587404&amp;postID=1066077629769347351' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/1066077629769347351'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/1066077629769347351'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mudda.blogspot.com/2010/08/blog-post.html' title='याद रहे हिंदी की बोलियाँ ही उसकी ताकत हैं'/><author><name>विकास शिशोदिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08157576148519764276</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='18' src='http://1.bp.blogspot.com/_yCbiUlApr1c/TMVfAgIbU7I/AAAAAAAAAVY/7kaK_w148Jg/S220/sing.png'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' 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alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5169832557672893474" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;सैयद जैगम इमाम&lt;/strong&gt; (दोस्तों, नवोदित साहित्यकार सैयद जैगम इमाम की 30 नवम्बर 2009 को लोकार्पित इंकलाबी किताब “दोज़ख़” को मशहूर प्रकाशक राजकमल प्रकाशन ने बैस्ट सेलर की श्रेणी में शुमा...र किया है )&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गली में बनियों का राज था। ढेर सारी दुकानें, आढतें और न जाने कितने गोदाम। सब के सब इसी गली में थे। बनिए और उनके नौजवान लडके दिन भर दुकान पर बैठे ग्राहकों से हिसाब किताब में मसरुफ रहते। शुरु -शुरु में वो इस गली से गुजरने में डरती थी, न जाने कब किसकी गंदी फब्‍ती कानों को छलनी कर दे। फ‍िर क्‍या पता किसी का हाथ उसके बुरके तक भी पहुंच जाए। डरते सहमते जब वो इस गली को पार कर लेती तब उसकी जान में जान आती। मगर डर का यह सिलसिला ज्‍यादा दिनों तक नहीं चला। उसने गौर किया ग्राहकों से उलझे बनिए उसकी तरफ ज्‍यादा ध्‍यान नहीं देते। हां इक्‍का दुक्‍का लडके उसकी तरफ जरुर देखते मगर उनकी जिज्ञासा उसके शरीर में न होकर के उस काले बुर्के में थी जिससे वो अपने को छुपाए रखती थी।&lt;br /&gt;वो पढती नहीं थी, छोटी क्‍लास के बच्‍चों को पढाती थी। तमाम शहर में मकान तलाशने के बावजूद जब उसके अब्‍बा को मकान नहीं मिला तो हारकर इस बस्‍ती का रुख करना पडा। अब्‍बा ने मशविरा दिया था ''बेटी घर से बाहर न निकलो'' मगर उनकी आवाज में ज्‍यादा दम नहीं था। घर में कमाने वाला कोई न था फ‍िर वो कुछ रुपयों का इंतजाम कर रही थी तो इसमें बुरा क्‍या था। दिन गुजर रहे थे उसके स्‍कूल जाने का सिलसिला जारी था। उसने नोट किया इधर बीच बनियों की गली के ठीक बाद पडने वाले चौराहे पर पास के मदरसे के तीन चार लडके रोज खडे रहते हैं। उसने ज्‍यादा ध्‍यान नहीं दिया। दिल में एकबारगी आवाज उठी , भला इनसे क्‍या डरना। एक दिन अजीबो गरीब बात हुई। चौराहे पर एक लडका उसके ठीक सामने आ गया। हाथ उठाकर बडी अदा से कहा अस्‍सलाम आलेकुम। वो चौंक गई। उसके लडकों से इस तरह की उम्‍मीद कतई नहीं थी। उसने कोई जवाब नहीं दिया। कलेजा थर थर कांप रहा था। वापसी में भी वही लडके उसके सामने खडे थे। उसने घबरा कर तेज तेज चलना शुरु कर दिया। लडके उसकी तरफ बढे मगर वो फटाक से बनियों की गली में घुस गई। लंबी -लंबी दाढी, सफाचट मूंछ ओर सिर पर गोल टोपी रखने वाले लडकों के इरादे उसे वहशतनाक लगे। रात को वो सो नहीं सकी। रात भर जहन में यही ख्‍याल आता रहा कि कल क्‍या होगा। उसने ख्‍वाब भी देखा , बडी दाढी वाले एक लडके ने उसका दुपट्टा खींच लिया है।&lt;br /&gt;स्‍कूल जाने का वक्‍त हो गया था। वो दरवाजे तक गई मगर फ‍िर लौट आई। आज फ‍िर बदतमीजी का सामना करना पडा तो.....। उसने अब्‍बा से दरख्‍वास्‍त की, उसके साथ स्‍कूल तक चलें। उसने खुलकर कुछ नहीं कहा। अब्‍बा ने भी कुछ नहीं पूछा। मगर उन्‍हें बनियों पर बेतहाशा गुस्‍सा आया। दांत किचकिचाते हुए उन्‍होंने अंदाजा लगा लिया कि बनिये के किसी लडके ने उनकी बेटी को छेडा है। बेटी को गली के पार पहुंचाने के बाद वो वापस लौटने लगे। चौराहे पर अभी भी वो लडके खडे थे। उसने अब्‍बा से स्‍कूल तक चलने की बात कही। आज लडके कुछ नहीं बोले। वापसी में उसका दिल जोर जोर से धडक रहा था। मगर नहीं चौराहे पर लडके नदारद थे। उसने खुदा का शुक्र अदा किया। घर पहुंची तो अम्‍मा उसकी परेशानी का सबब पूछ रहीं थीं। अम्‍मा बार बार बनियों को गाली भी दे रहीं थीं। उन्‍होंने उसे गली छोडने की सलाह भी दी। मगर वो कुछ नहीं बोली।&lt;br /&gt;आज अब्‍बा घर नहीं थे। उसे पहले की तरह अकेले स्‍कूल जाना था। गली से चौराहे पर पहुंचते वक्‍त उसका कलेजा धाड धाड बज रहा था। चौराहे पर लडके हमेशा की तरह उसके इंतजार में खडे थे। वो हिम्‍मत बांधकर आगे बढी मगर फ‍िर एक लडका उसके सामने आ गया। उसके बढने के अंदाज ने उसकी रीढ में सिहरन पैदा कर दी। उसके मुंह से चीख निकल गई। वो वापस बनियों की गली की तरफ दौड पडी। गली के बनिये सारा तमाशा देख रहे थे। शरीफ लडकी से छेडछाड उन्‍हें रास नहीं आई। गली के नौजवान मदरसों के इन लुच्‍चों की तरफ दौड पडे। जरा सी देर में पूरी गली के बनिये शोहदों की धुनाई कर रहे थे। भीड लडकों को पीट रही थी और वो चुपचाप किनारे से स्‍कूल निकल गई। वापस में चौराहा खामोश था। लडके नदारद थे। गली से गुजरते वक्‍त उसे ऐसा लगा कि हर कोई उसे देख रहा है। मगर ये आंखें उसे निहारने के लिए नहीं उठी थीं। ये सहानूभूति और गर्व से उठी नजरें थीं जो उसे बता रहीं थीं कि चिंता मत करो हम अपनी बहू बेटियों के साथ छेडछाड करने वालों का यही हश्र करते हैं।&lt;br /&gt;घर पहुंची तो देखा अब्‍बा एक मौलवी से गूफ्तगू कर रहे हैं। ये उस मदरसे के प्रिंसिपल थे जहां मार खाने वाले लडके तालीम हासिल कर रहे थे। अब्‍बा ने उसे हिकारत की नजर से देखा। उसे कुछ समझ नहीं आया। कमरे में गई अम्‍मा से मसला पूछने। जबान खोली ही थी कि एक थप्‍पड मुंह पर रसीद हो गया।&lt;br /&gt;उसे समझ नहीं आया कि आखिर माजरा क्‍या है। अम्‍मा सिर पटक रहीं थीं, उसने खानदान के मुंह पर कालिख पोत दी। अम्‍मा बयान कर करके रोए जा रहीं थीं। उनकी बुदबुदाती आवाज में उसे सिर्फ इतना समझ आया, बनिए के लडकों से उसकी यारी थी जिन्‍होंने उन शरीफ तालिबे इल्‍मों को पीट दिया। उसका कलेजा मुंह को आ गया, आंखों में आंसू की बूंद छलक आई। अगली सुबह घर में खाना नहीं पका। उसके स्‍कूल जाना छोड दिया।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2333254526940587404-3761172889953622724?l=mudda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mudda.blogspot.com/feeds/3761172889953622724/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2333254526940587404&amp;postID=3761172889953622724' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/3761172889953622724'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/3761172889953622724'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mudda.blogspot.com/2010/06/blog-post_4419.html' title='बनियों की गली'/><author><name>विकास शिशोदिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08157576148519764276</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='18' src='http://1.bp.blogspot.com/_yCbiUlApr1c/TMVfAgIbU7I/AAAAAAAAAVY/7kaK_w148Jg/S220/sing.png'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://bp0.blogger.com/_yCbiUlApr1c/R77vUfxXjCI/AAAAAAAAAKY/rFJrRxoFZXU/s72-c/gali.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2333254526940587404.post-2054276969810683560</id><published>2010-06-30T00:48:00.000-07:00</published><updated>2010-06-30T00:57:03.196-07:00</updated><title type='text'>नक्सलबाड़ी आंदोलन</title><content type='html'>&lt;strong&gt;-- नक्सलबाड़ी आंदोलन -- &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;संक्षिप्त इतिहास   &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नक्सलवाद का जन्म पिछली सदी के साठ के दशक में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी आंदोलन की कोख से हुआ। नक्सलबाड़ी गांव के कुछ छोटे किसानों ने स्थानीय सामंतों के शोषण के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह किया और उन्हें सजा दी। नक्सलबाड़ी आंदोलन को बौद्धिक वर्ग का जबरदस्त समर्थन मिला, तो इसके पीछे वक्त का तकाजा और व्यवस्था से मोहभंग के कारण उपजी रिक्तता को भरने की आक्षंका भी थी। चारु मजूमदार और कानू सान्याल जैसे नेताओं के नेतृत्व में इसका विस्तार पूरे पश्चिम बंगाल में हुआ। लेकिन सत्तर के दशक के दमन और राज्य में वामपंथी पार्टी के सत्तारुढ़ होने के बाद भूमि सुधार कार्यक्रम के लागू होने के साथ यह आंदोलन पड़ोसी राज्यों की ओर कूच कर गया। पिछले करीब तीन दशक में नक्सली आंदोलन में आई विकृतियों ने उसे बौद्धिक समर्थन से भले ही महरूम किया हो, पर समाज के दबे-कुचले वर्गों, आदिवासियों में उसने काफी पैठ बना ली है। यही कारण है कि आज देश के दर्जन भर से अधिक राज्यों के लिए नक्सलवाद सिरदर्द बन गया है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;-- प्रमुख नक्सली गुट --&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;  &lt;br /&gt;नक्सलवादी आंदोलन से जुड़े तीन मुख्य संगठन हैं   &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नक्सली आंदोलन से जुड़े तीन संगठन मुख्य रूप से सक्रिय रहे हैं- एमसीसी (माउस्टि कम्युनिस्ट सेंटर)- वर्ष १९८४ में इस गुट को बिहार में ठोस पहचान मिली। बाद में इसने अनेक बर्बर नरसंहारें को अंजाम दिया। इसका प्रभाव बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में रहा है। पीडीब्ल्यू (पीपुल्स वार ग्रुप)- वर्ष १९८० में कोंडपल्ली सीतारमैया ने तेलंगाना में इस उग्रवादी संगठन की नींव रखी। आंध्र प्रदेश में इसका व्यापक प्रभाव है। जनशक्ति- यह गुट भी आंध्र प्रदेश में ही सक्रिय रहा है। लेकिन बाद में ये तीनों संगठन सीपीआई (माओस्ट) नामक संगठन की छतरी के नीचे एकत्रित हो गए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(साभार &lt;a href="http://www.amarujala.com"&gt;अमर उजाला&lt;/a&gt;)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2333254526940587404-2054276969810683560?l=mudda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mudda.blogspot.com/feeds/2054276969810683560/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2333254526940587404&amp;postID=2054276969810683560' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/2054276969810683560'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/2054276969810683560'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mudda.blogspot.com/2010/06/blog-post_30.html' title='नक्सलबाड़ी आंदोलन'/><author><name>विकास शिशोदिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08157576148519764276</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='18' src='http://1.bp.blogspot.com/_yCbiUlApr1c/TMVfAgIbU7I/AAAAAAAAAVY/7kaK_w148Jg/S220/sing.png'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2333254526940587404.post-1956200647464555290</id><published>2010-06-25T22:49:00.000-07:00</published><updated>2010-06-25T22:51:17.260-07:00</updated><title type='text'>फ्लाईओवर।</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_yCbiUlApr1c/TCWVQc8vAaI/AAAAAAAAATw/GUgubA2_or8/s1600/pic01.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 191px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_yCbiUlApr1c/TCWVQc8vAaI/AAAAAAAAATw/GUgubA2_or8/s320/pic01.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5486955830902194594" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह लेख उस छात्र की कॉपी से लिया गया है, जिसे निबंध लेखन प्रतियोगिता में पहला पुरस्कार मिला है। निबध का विषय था - फ्लाईओवर।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फ्लाईओवर का जीवन में बहुत महत्व है, खास तौर पर इंजीनियरों और ठेकेदारों के जीवन में तो घणा ही महत्व है। एक फ्लाईओवर से न जाने कितनी कोठियां निकल आती हैं। पश्चिम जगत के इंजीनियर भले ही इसे न समझें कि भारत में यह कमाल होता है कि पुल से कोठियां निकल आती हैं और फ्लाईओवर से फार्महाउस।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर, फ्लाईओवर से हमें जीवन के कई पाठ मिलते हैं, जैसे बंदा कई बार घुमावदार फ्लाईओवर पर चले, तो पता चलता है कि जहां से शुरुआत की थी, वहीं पर पहुंच गए हैं। उदाहरण के लिए ऑल इंडिया इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज के पास के फ्लाईओवर में बंदा कई बार जहां से शुरू करे, वहीं पहुंच जाता है। वैसे, यह लाइफ का सत्य है, कई बार बरसों चलते -चलते यह पता चलता है कि कहीं पहुंचे ही नहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फ्लाईओवर जब नए-नए बनते हैं, तो एकाध महीने ट्रैफिक स्मूद रहता है, फिर वही हाल हो लेता है। जैसे आश्रम में अब फ्लाईओवर पर जाम लगता है, यानी अब फ्लाईओवर पर फ्लाईओवर की जरूरत है। फिर उस फ्लाईओवर के फ्लाईओवर के फ्लाईओवर पर भी फ्लाईओवर चाहिए होगा। हो सकता है कि कुछ समय बाद फ्लाईओवर अथॉरिटी ऑफ इंडिया ही बन जाए। इसमें कुछ और अफसरों की पोस्टिंग का जुगाड़ हो जाएगा। तब हम कह सकेंगे कि फ्लाईओवरों का अफसरों के जीवन में भी घणा महत्व है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिल्ली में इन दिनों फ्लाईओवरों की धूम है। इधर से फ्लाईओवर, उधर से फ्लाईओवर। फ्लाईओवर बनने के चक्कर में विकट जाम हो रहे हैं। दिल्ली गाजियाबाद अप्सरा बॉर्डर के जाम में फंसकर धैर्य और संयम जैसे गुणों का विकास हो जाता है, ऑटोमैटिक। व्यग्र और उग्र लोगों का एक ट्रीटमेंट यह है कि उन्हें अप्सरा बॉर्डर के जाम में छोड़ दिया जाए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फ्लाईओवर बनने से पहले जाम फ्लाईओवर के नीचे लगते हैं, फिर फ्लाईओवर बनने के बाद जाम ऊपर लगने शुरू हो जाते हैं। इससे हमें भौतिकी के उस नियम का पता चलता है कि कहीं कुछ नहीं बदलता, फ्लाईओवर का उद्देश्य इतना भर रहता है कि वह जाम को नीचे से ऊपर की ओर ले आता है, ताकि नीचे वाले जाम के लिए रास्ता प्रशस्त किया जा सके।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फ्लाईओवरों का भविष्य उज्जवल है। कुछ समय बाद यह सीन होगा कि जैसे डबल डेकर बस होती है, वैसे डबल डेकर फ्लाईओवर भी होंगे। डबल ही क्यों, ट्रिपल, फाइव डेकर फ्लाईओवर भी हो सकते हैं। दिल्ली वाले तब अपना एड्रेस यूं बताएंगे - आश्रम के पांचवें लेवल के फ्लाईओवर के ठीक सामने जो फ्लैट पड़ता है, वो मेरा है। कभी जाम में फंस जाएं, तो कॉल कर देना, डोरी में टांग कर चाय लटका दूंगा। संवाद कुछ इस तरह के होंगे - अबे कहां रहता है आजकल रोज अपने फ्लैट से पांचवें लेवल का जाम देखता हूं, तेरी कार नहीं दिखती। सामने वाला बताएगा - आजकल मैं चौथे लेवल के फ्लाईओवर में फंसता हूं। अबे पांचवें लेवल के जाम में फंसा कर, वहां हवा अच्छी लगती है। अबे, ले मैं तेरे ऊपर ही था, पांचवें वाले लेवल पर और तू चौथे लेवल पर, कॉल कर देता, तो झांककर बात कर लेता। आने वाले टाइम में दिल्ली वाले अपने मेहमानों को फाइव डेकर जाम दिखाने लाएंगे।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2333254526940587404-1956200647464555290?l=mudda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mudda.blogspot.com/feeds/1956200647464555290/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2333254526940587404&amp;postID=1956200647464555290' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/1956200647464555290'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/1956200647464555290'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mudda.blogspot.com/2010/06/blog-post_25.html' title='फ्लाईओवर।'/><author><name>विकास शिशोदिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08157576148519764276</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='18' src='http://1.bp.blogspot.com/_yCbiUlApr1c/TMVfAgIbU7I/AAAAAAAAAVY/7kaK_w148Jg/S220/sing.png'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_yCbiUlApr1c/TCWVQc8vAaI/AAAAAAAAATw/GUgubA2_or8/s72-c/pic01.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2333254526940587404.post-3368625146335116860</id><published>2010-06-17T00:23:00.000-07:00</published><updated>2010-06-17T00:28:22.167-07:00</updated><title type='text'>देश में प्रमुख आतंकी घटनाएं</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_yCbiUlApr1c/TBnOK6RQWpI/AAAAAAAAATo/Ko_icB7ss58/s1600/mumbai-taj-pic1.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 177px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_yCbiUlApr1c/TBnOK6RQWpI/AAAAAAAAATo/Ko_icB7ss58/s320/mumbai-taj-pic1.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5483640708135934610" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;• &lt;strong&gt;प्रमुख ब्लास्ट&lt;/strong&gt;-- पुणे में आतंकी हमला, ९ की मौत – &lt;br /&gt;-- मुंबई हमला – ( सशस्त्र आतंकियों ने आठ जगहों पर गोलीबारी की )&lt;br /&gt;-- दिल्ली ब्लास्ट – ( ३० मिनट के भीतर पांच विस्फोट)&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;-- अहमदाबाद ब्लास्ट --  ( ७० मिनट में १६ ब्लास्ट से थर्राया शहर)&lt;br /&gt;-- जयपुर ब्लास्ट – (७० से ज्यादा की मौत, २०० घायल, देश भर में सुरक्षा अलर्ट)&lt;br /&gt;-- मुंबई बम ब्लास्ट (१२ मार्च १९९३) – (२५० लोगों की मौत, ७०० घायल)&lt;br /&gt;-- कोयंबटूर बम ब्लास्ट (१४ फरवरी १९९८) – (५८ लोगों की मौत, २०० घायल)&lt;br /&gt;-- बैंगलौर इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस पर हमला (२००५) – (एक व्यक्ति की मौत, चार घायल)&lt;br /&gt;-- दिल्ली बम ब्लास्ट (२९ अक्टूबर २००५) – (५९ की मौत, २०० घायल)&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;-- घाटकोपर बम ब्लास्ट (२ दिसंबर २००२) – (२ लोगों की मौत, ५० घायल)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;• &lt;strong&gt;ट्रेन हादसे&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;-- बैंगलोर एक्सप्रेस ट्रेन हादसा (२१ दिसंबर २००२) – (२० लोगों की मौत, ८० घायल)&lt;br /&gt;-- जौनपुर ट्रेन हादसा (२८ जुलाई २००५) – (१३ लोगों की मौत, ५० घायल)&lt;br /&gt;-- समझौता एक्सप्रेस बम विस्फोट हादसा (१९ फरवरी २००७) – (६८ लोगों की मौत, ५० घायल)&lt;br /&gt;-- मुंबई ट्रेन हादसा (११ जुलाई २००६) – (२०९ लोगों की मौत, ७१४ घायल)&lt;br /&gt;-- ब्रह्म्पुत्र ट्रेन हादसा (३० दिसंबर १९९६) – (३३ लोगों की मौत)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;• &lt;strong&gt;मंदिरों पर हमला&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;-- राम जन्म भूमि पर हमला (५ जुलाई २००५) – (५ आतंकियों समेत १ नागरिक की मौत)&lt;br /&gt;-- वाराणसी केसंकट मोचन मंदिर पर हमला ( ७ मार्च २००६ ) – (२८ लोगों की मौत, १०१ घायल)&lt;br /&gt;-- अक्षरधाम मंदिर पर हमला (२५ सितंबर २००२) – (२९ लोगों की मौत, ७९ घायल)&lt;br /&gt;-- रघुनाथ मंदिर पर हमला (३० मार्च २००२) – (७ लोगों की मौत, २० घायल)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;• &lt;strong&gt;मसजिदों पर हमला&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; -- मालेगांव ब्लास्ट (८ सितंबर २००६) –(३७ लोगों की मौत, १२५ घायल)&lt;br /&gt;-- हैदराबाद मक्का मसजिद ब्लास्ट (१८ मई २००७) – (१६ लोगों की मौत, १०० घायल)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;• &lt;strong&gt;अन्य हमले&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; -- सीआरपीएफ सेंटर पर हमला (१ जनवरी २००८) – (सात जवानों समेत आठ की मौत)&lt;br /&gt; &lt;br /&gt; -- अब्दुल गनी की मीटिंग में हमला – (मई २००२ में आतंकका शिकार बने लोन)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(साभार &lt;a href="http://www.amarujala.com"&gt;अमर उजाला&lt;/a&gt;)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2333254526940587404-3368625146335116860?l=mudda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mudda.blogspot.com/feeds/3368625146335116860/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2333254526940587404&amp;postID=3368625146335116860' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/3368625146335116860'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/3368625146335116860'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mudda.blogspot.com/2010/06/blog-post_17.html' title='देश में प्रमुख आतंकी घटनाएं'/><author><name>विकास शिशोदिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08157576148519764276</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='18' src='http://1.bp.blogspot.com/_yCbiUlApr1c/TMVfAgIbU7I/AAAAAAAAAVY/7kaK_w148Jg/S220/sing.png'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_yCbiUlApr1c/TBnOK6RQWpI/AAAAAAAAATo/Ko_icB7ss58/s72-c/mumbai-taj-pic1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2333254526940587404.post-1801379621867565559</id><published>2010-06-16T03:57:00.000-07:00</published><updated>2010-06-16T04:10:29.537-07:00</updated><title type='text'>देश में प्रमुख  आतंकी संगठन</title><content type='html'>&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;इंडियन मुजाहिद्दीन का परिचय&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;कई संगठनों का मिलाजुला रूप इंडियन मुजाहिद्दीन देश में जड़ें जमाए कई संगठनों का मिलाजुला रूप है। इन संगठनों में स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट्स ऑफ इंडिया (सिमी), पाकिस्तान स्थित आतंकवादी संगठन लश्कर-ए-तैयबा और बांग्लादेश स्थित हरकत उल जिहाद-ए-इस्लामी (हूजी) से जुड़े आतंकी शामिल हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;लश्कर-ए-तैयबा का परिचय &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;दक्षिण एशिया का सबसे बड़ा आतंकवादी संगठन &lt;br /&gt;लश्कर-ए-तैयबा दक्षिण एशिया का अति सक्रिय व बहुत बड़ा आतंकवादी संगठन है। इस संगठन की स्थापना मोहम्मइ सईद ने अफगानिस्तान के कुनर प्रांत में की थी। वर्तमान में लश्कर-ए-तैयबा लाहौर और पाकिस्तान में स्थित है और पाक अधिकृत कश्मीर में इसके बहुत सारे मिलिटेंट कैंप हैं। लश्कर-ए-तैयबा ने भारत के खिलाफ बहुत सारी आतंकी वारदातों को अंजाम दिया है। इस संगठन का लक्ष्य कश्मीर से भारत का आधिपत्य समाप्त करना है। लश्कर के कुछ सदस्यों पर मुशर्रफ की नीतियों के खिलाफ, विशेषकर करांची में हमले करने के आरोप भी लगे हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्रिटेन, रूस, ऑस्ट्रेलिया, भारत और पाकिस्तान ने इस संगठन को प्रतिबंधित किया हुआ है। कुछ खुफिया एजेंसियों के अनुसार पाकिस्तान द्वारा लगाए गए प्रतिबंध से बचने के लिए लश्कर-ए-तैयबा ने २००२ में अपना नाम बदलकर जमात-अल-दवात रख लिया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;इसलामिक हुजी का परिचय&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;१९८० में हुई थी स्थापना &lt;br /&gt;आतंकी संगठन हरकत-उल-जिहाद-ए-इसलामी की स्थापना १९८० में की गई। दो पाकिस्तानी संग्ठन जमात-उल-उलेमा-ए-इसलामी (जुल) और तबलीग-ए-जमात(तीज) को मिलाकर हुजी का गठन हुआ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt; हिजबुल मुजाहिद्दीन का परिचय&lt;/span&gt; &lt;br /&gt;खूखांर आतंकी संगठन है हिजबुल &lt;br /&gt;आतंकवादी संगठन हिजबुल मुजाहिद्दीन की स्थापना १९८९ में पाकिस्तान में हुई थी। वर्तमान में यह पाकिस्तान व पाक अधिकृत कश्मीर से आतंवादी गतिविधियों को संचालित करता है और भारत प्रशासित कश्मीर में अति सक्रिय है। संगठन अपने आप को स्वतंत्रता सेनानी मानता है जबकि भारव व दूसरे मुल्कों की नजरों में यह एक खूंखार आतंकवादी संगठन है। हिजबुल मुजाहिद्दीन का मुख्यालय पाक अधिकृत कश्मीर की राजधानी मुजफ्फराबाद में है। ऐसा माना जाता है कि पाकिस्तानी खूफिया एजेंसी आईएसआई के उकसाने पर आतंकवादी संगठन अल-बदर से अलग होकर कुछ आतंकवादियों ने पृथक हिजबुल मुजाहिद्दीन संगठन की नींव रखी थी। वर्तमान समय में इस संगठन का मुखिया सईद सलाउद्दीन है। ३० नवंबर २००५ को यूरोपीय यूनियन की आतंकवादी संगठनों की सूची में हिजबुल मुजाहिद्दीन को भी शामिल किया गया। संयुक्त राष्ट्र ने भी आतंकवादी संगठन के रूप में इसकी घोषणा कर चुका है। यूरोपीय यूनियन के सदस्यों ने इस संगठन को आर्थिक मदद और दूसरे अन्य सामान मुहैया कराने पर पाबंदी लगाई हुई है। वर्तमान में हिजबुल मुजाहिद्दीन कश्मीर से संचालित सबसे बड़ा आतंकवादी संगठन है। इसके साथ ही दोनों ओर के कश्मीर से इसे जबरदस्त समर्थन प्राप्त है। यही कारण है कि हिजबुल मुजाहिद्दीन कश्मीर का सबसे सक्रिय आतंकवादी संगठन बन गया है। संगठन का नाम- हिजबुल मुजाहिद्दीन संक्षिप्त नाम- एचएम स्थापना वर्ष- १९८९ मुख्यालय- मुजफ्फराबाद सदस्य संख्या- १५०० मुखिया- सईद सलाउद्दीन इलियास पीर साहिब प्रभावी क्षेत्र- पुंछ, रजौरी और डोडा जिले। दूसरे नेता- मास्टर अहसान धर, गुलाम रसूल शाह इलियास इमरान राही, अब्दुल हमीद बट्ट इलियास बॉम्बर खान, मुस्तफा खान। संगठन स्वरूप- जिहादी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;लश्कर-ए-कहर का परिचय &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;आतंक की दुनिया में सबसे नया नाम &lt;br /&gt;लश्कर-ए-कहर से दुनिया उस समय रू-ब-रू हुई जब इस आतंकवादी संगठन ने ११ जुलाई २००६ में मुंबई की लोकल ट्रेन में हुए सात बम विस्फोटों की जिम्मेदारी ली। हालांकि यह संगठन बहुत ही छोटा है और आतंकवादी संगठनों में सबसे नया नाम है। लेकिन इस संगठन के तार अल-कायदा और लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े हुए हैं। भारतीय खूफिया एजेंसी का मानना है कि लश्कर-ए-कहर एक फर्जी संगठन है और इसका कोई अस्तित्व है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;जैश ए मोहम्मद का परिचय&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;२००० में हुई थी स्थापना &lt;br /&gt;जम्मू-कश्मीर में सक्रिय तमात आतंकवादी संगठनों में सबसे नया आतंकवादी संगठन जैश-ए-मोहम्मद सबसे नया है। इसकी स्थापना फरवरी २००० में की गई। जैश-ए-मोहम्मद का मुखिया मसूद अजहर है जिसे दिसंबर १९९९ में इंडियन एयरलाइंस के अपहरण के बाद भारत सरकार ने दो दूसरे चरमपंथियों के साथ रिहा कर दिया। इस संगठन में हरकत-उल-मुजाहिद्दीन और हरकत-उल-अंसार के कई चरमपंथी शामिल हैं। खुद मौलाना मसूद अजहर हरकत-उल-अंसार का महासचिव रह चुका है और उसके हरकत-उल-मुजाहिद्दीन से भी संपर्क रहे हैं। उसे १९९४ में श्रीनगर में गिरफ्तार किया गया था। लेकिन १९९९ में अफगानिस्तान के कंधार में उसकी रिहाई के बाद वो पाकिस्तान में नजर आया। तभी से उसने मृतप्रायः हरकत-उल-अंसार में जान फूंकने की कोशिश की। हालांकि पाकिस्तान में रहकर मौलाना मसूद अजहर के अपने संगठन में जैश-ए-मोहम्मद के गतिविधियां चलाने से अंतरराष्ट्रीय समुदाय में पाकिस्तान को शर्मिंदगी उठानी पड़ी है क्योंकि विमान अपहरण की घटना से मौलाना अजहर पहले से ही काफी सुर्खियों में आ गया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt; इंडियन मुजाहिद्दीन का परिचय &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;कई संगठनों का मिलाजुला रूप &lt;br /&gt;इंडियन मुजाहिद्दीन देश में जड़ें जमाए कई संगठनों का मिलाजुला रूप है। इन संगठनों में स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट्स ऑफ इंडिया (सिमी), पाकिस्तान स्थित आतंकवादी संगठन लश्कर-ए-तैयबा और बांग्लादेश स्थित हरकत उल जिहाद-ए-इस्लामी (हूजी) से जुड़े आतंकी शामिल हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;अहले हदीज का परिचय&lt;/span&gt; &lt;br /&gt;पाक में लश्कर की स्थापना करने वाला संगठन &lt;br /&gt;अहले हदीज चरमपंथी इस्लामी संगठन है। यह इस्लाम के बहावी मत को मानता है। ऐसा माना जाता है कि अहले हदीज ने ही दहशत और खौफ का पर्याय बन चुके आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा की पाकिस्तान में स्थापना की थी। गौरतलब है कि लश्कर भारत में हुई कई बड़ी आतंकी वारदातों की जिम्मेदारी ले चुका है। अहले हदीज के कई कार्यकर्ता ‘सिमी’ के कैडर माने जाते हैं। वहीं, अहले हदीज से जुड़े लोगों ने भी कई बड़ी घटनाओं को अंजाम दिया &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;‘सिमी’ का परिचय&lt;/span&gt; &lt;br /&gt;१९७७ में ‘सिमी’ की स्थापना &lt;br /&gt;सिमी (स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया)भारत में प्रतिबंधित संगठन है। केंद्र सरकार ने इसे आतंकवादी संगठन मानते हुए वर्ष २००१ से प्रतिबंधित कर रखा है। सिमी की स्थापना अलीगढ़ मुसलिम विश्वविद्यालय के कुछ छात्रों ने १९७७ में की थी। इसका घोषित उद्देश्य भारत को इस्लामिक राष्ट्र में बदलना है। इस काम के लिए यह संगठन हिंसा या जोर-जबरदस्ती को गलत नहीं मानता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(साभार &lt;a href="http://www.amarujala.com"&gt;अमर उजाला&lt;/a&gt;)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2333254526940587404-1801379621867565559?l=mudda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mudda.blogspot.com/feeds/1801379621867565559/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2333254526940587404&amp;postID=1801379621867565559' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/1801379621867565559'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/1801379621867565559'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mudda.blogspot.com/2010/06/blog-post_16.html' title='देश में प्रमुख  आतंकी संगठन'/><author><name>विकास शिशोदिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08157576148519764276</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='18' src='http://1.bp.blogspot.com/_yCbiUlApr1c/TMVfAgIbU7I/AAAAAAAAAVY/7kaK_w148Jg/S220/sing.png'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2333254526940587404.post-6824890916879159298</id><published>2010-06-07T22:36:00.000-07:00</published><updated>2010-06-07T22:45:35.316-07:00</updated><title type='text'>इस राजनीति को कैसे देखें और क्यों देखें?</title><content type='html'>Ravish kumar&lt;br /&gt;&lt;a href="http://naisadak.blogspot.com"&gt;naisadak.blogspot.com&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;राजनीति एक छोटी फिल्म है। छोटी इसलिए क्योंकि अच्छी फिल्म होने के बाद भी दिलचस्प और बेजोड़ की सीमा से आगे नहीं जा पाती। कोई धारणा नहीं तोड़ती न बनाती है। अभिनय और संवाद और बेहतरीन निर्देशन ने इस फिल्म को कामयाब बनाया है। कहानी राजनीति के बारे में नई समझ पैदा नहीं करती। नए यथार्थ को सामने नहीं लाती। लेकिन इतनी मुश्किल कहानी और किरदारों को सजा कर ही प्रकाश झा ने बाज़ी मारी है और एक अच्छी फिल्म दी है। मैं बस इसे एक अच्छी फिल्म मानता हूं। यादगार नहीं। जो कि हो सकती थी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मनोज बाजपेयी और रणबीर कपूर के अभिनय में एक किस्म का रेस दिखता है। पुराना और नया टकराते हैं। अपने-अपने छोर पर दोनों का अभिनय ग़ज़ब का है। मनोज की संवाद अदायगी काफी बेहतरीन है। अभिनय से अपने किरदार में जान डाल दी है। गुस्सा और लाचारी और महत्वकांझा का मिक्स है। रणबीर के अभिनय का भाव अच्छा है। एक अच्छा मगर शातिर लड़का। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महाभारत का दर्शन एक खानदान के भीतरघातों की कहानियों में ऐसे फंसता है कि सबकी जान चली जाती है। कोई अर्जुन नहीं,कोई दुर्योधन नहीं और कोई युधिष्ठिर नहीं है। सब बिसात पर मोहरों को मारने वाले हत्यारे हैं। किसी की नैतिकता महान नहीं है। सब पतित हैं। इस पारिवारिक युद्ध का कथानक बेहद निजी प्रसंगों में कैद होकर रह जाता है। सब कुछ सिर्फ चाल है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतनी रोचक फिल्म महान होते होते रह गई,बस इसलिए क्योंकि तमाम हिंसा के बीच विचारधारा को ओट बनाने की कोशिश नहीं की गई है। कम से कम विचारधाराओं की नीलामी ही कसौटी पर रखते। वही चालबाज़ियां हैं जिन्हें हम जानते हैं और जिनके कई रुपों को अभिनय के ज़रिये दोबारा देखते हैं। लेकिन हिन्दुस्तान की राजनीति विचारधारा की कमीज़ पहन कर घूमा करती है। उस ढोंग का पर्दाफाश नहीं दिखता जो खोखली और असली विचारधारा के बीच की जंग में पारिवारिक चालबाज़ियां छुप कर की जाती हैं। फिल्म में पूरी राजनीति प्रोपर्टी का झगड़ा बन कर रह जाती है। किसी का किरदार राजनेता का यादगार चरित्र नहीं बनाता। सब के सब मामूली मोहरे। हत्या और झगड़ा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सूरज का किरदार ही है जो महाभारत से मिलता जुलता है। लेकिन नाम भर का। आज की दलित राजनीति के बाद भी यह दलित किरदार नाजायज़ निकला,मुझे काफी हैरानी हुई। बहुत उम्मीद थी कि सूरज बीच में आकर पारिवारिक खेल को बिगाड़ देगा लेकिन वो तो हिस्सा बन जाता है। आखिर तक पहुंचते पहुंचते दलित राजपूत का ख़ून निकल आता है। कुंती का नाजायज़ गर्भ दलित के घर में जाकर एक ऐसा लाचार कर्ण बनता है जो बाद में अपने राजपूती ख़ून को बचाने के लिए दोस्त दुर्योधन को ही दांव पर लगा देता है। ये वो वादागर कर्ण नहीं है जो सब कुछ त्याग देता है। फिल्म के आखिरी सीन में अजय देवगन समर प्रताप सिंह के रोल में रणबीर कपूर पर गोली नहीं चलाता। वीरेंद्र प्रताप सिंह मारा जाता है। कर्ण की दुविधा वीरेंद्र प्रताप सिंह के लिए जानलेवा बन जाती है। अगर सूरज समर पर गोली चला देता तो कहानी पलट जाती। लेकिन निर्देशक ने उसकी भी मौत तय कर रखी थी। समर प्रताप के ही हाथ। जिसे सूरज अपना खून समझ कर छोड़ देता है उसे समर प्रताप एक नाजायज़ ख़ून समझ कर मार देता है। बाद में फ्लाइट पकड़ कर अमेरिका चला जाता है पीएचडी जमा करने। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कैटरीना कैफ सोनिया गांधी की तरह लगती होगी लेकिन इसका किरदार सोनिया जैसा नहीं है। सारे किरदारों के कपड़े लाजवाब हैं। मनोज का कास्ट्यूम सबसे अच्छा है। चश्मा भी बेजोड़ है। लगता है प्रकाश झा बेतिया स्टेशन से खरीद कर लाये थे। कैरेक्टर को दुष्ट लुक देने के लिए चश्मा गज़ब रोल अदा करता है। अर्जुन रामपाल का अभिनय भी अच्छा है। धोती कुर्ता में नाना पाटेकर भी जंचते हैं। आरोप-प्रत्यारोपों की हकीकत सामने लाने के लिए महिला यूथ विंग की नेता का अच्छा इस्तमाल है। दलित बस्ती में मर्सेडिज़ की सवारी शानदार है। सबाल्टर्न का मामूली प्रतिरोध। नसीरूद्दीन शाह का किरदार कुछ खास नहीं है। कम्युनिस्ट नेता एक रात की ग़लती का प्रायश्चित लेकर कहीं खो जाता है। ये किरदार वैसा ही है जैसा जेएनयू जाएंगे तो सड़क छाप लड़के कहा करते हैं कि लड़की पटानी हो तो लेफ्ट में भर्ती हो जाया कीजिए। नसीर होते तो विचारधाराएं टकरातीं। विचारधाराओं की बिसात पर शह-मात के खेल होते तो कहानी यादगार बनती। लेकिन भाई ही लड़ते रह गए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रकाश झा का कमाल यही है कि जो भी कहानी सामने थी उसके साथ पूरा न्याय किया है। भाइयों के बीच के झगड़े को बड़ा कैनवस दिया है। उसकी बारीकियों को खूबी से सामने लाया है। भीड़ की अच्छी शूटिंग की है। सहायक निर्देशकों ने भी खूब मेहनत की है। पहले हिस्से में फिल्म अच्छी लगती है लेकिन जब चाल चलने की संभावना खत्म हो जाती है और कहानी नतीजे की तरफ बढ़ती है तब निर्देशक सारे किरदारों को खत्म करने का ठेका ले लेता है। काश अगर इन्हीं दावेदारों में से कोई विजेता बन कर उभरता तो आखिर में ताली बजाने का मौका मिलता। एक सहानुभूति पैदा होती है। सिनेमा हाल से कुछ लेकर निकलते। फिर भी फिल्म देखते वक्त नहीं लगा कि टाइम खराब कर रहे हैं। यह फिल्म इसलिए भी अच्छी है क्योंकि सबने अच्छा काम किया है। कमजोरी कहानी की कल्पना में रह गई है। वर्ना दूसरा हिस्सा फालतू की मारामारी में बर्बाद नहीं होता। आप देख कर आइयेगा। मैं स्टारबाज़ी नहीं करता। इस फिल्म को देखना ही चाहिए।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2333254526940587404-6824890916879159298?l=mudda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mudda.blogspot.com/feeds/6824890916879159298/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2333254526940587404&amp;postID=6824890916879159298' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/6824890916879159298'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/6824890916879159298'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mudda.blogspot.com/2010/06/blog-post_07.html' title='इस राजनीति को कैसे देखें और क्यों देखें?'/><author><name>विकास शिशोदिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08157576148519764276</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='18' src='http://1.bp.blogspot.com/_yCbiUlApr1c/TMVfAgIbU7I/AAAAAAAAAVY/7kaK_w148Jg/S220/sing.png'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2333254526940587404.post-3734422610461744697</id><published>2010-06-04T02:32:00.001-07:00</published><updated>2010-06-04T02:32:32.053-07:00</updated><title type='text'>वे अच्छे नागरिक है</title><content type='html'>अंजुले&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वे अच्छे नागरिक है,वे आदर्श आदमीं हैं क्योंकि वे चुप हैं,वे&lt;br /&gt;बुरे हो भी नहीं सकते क्योंकि वे किसी के फटे में टांग नहीं अड़ाते,वे&lt;br /&gt;अच्छे आदमीं है,वे बुरे कभी हो ही नहीं सकते,वे जंग हार गए हैं और ये बात&lt;br /&gt;उन्होंने लड़ने से पहले ही मान ली है,इसलिए वे अच्छे और आदर्श नागरिक&lt;br /&gt;हैं.....&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2333254526940587404-3734422610461744697?l=mudda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mudda.blogspot.com/feeds/3734422610461744697/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2333254526940587404&amp;postID=3734422610461744697' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/3734422610461744697'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/3734422610461744697'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mudda.blogspot.com/2010/06/blog-post_2676.html' title='वे अच्छे नागरिक है'/><author><name>विकास शिशोदिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08157576148519764276</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='18' src='http://1.bp.blogspot.com/_yCbiUlApr1c/TMVfAgIbU7I/AAAAAAAAAVY/7kaK_w148Jg/S220/sing.png'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2333254526940587404.post-4686705456409820142</id><published>2010-06-04T02:27:00.000-07:00</published><updated>2010-06-04T02:29:46.034-07:00</updated><title type='text'>देश के जीडीपी में कृषि क्षेत्र का योगदान</title><content type='html'>आजादी के बाद पहली बार है देश के जीडीपी में कृषि क्षेत्र का योगदान मैन्यूफैक्चरिंग सेकम है। ताजा आंकड़ों के मुताबिक 2009-10 के जीडीपी में &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;मैन्यूफैक्चरिंग योगदान7,19,975करोड़ रुपए(16.1%)है,&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जबकि &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;कृषि,वानिकी वफिशिंग का योगदान 6,51,901करोड़ रुपए (14.6%) है।&lt;/span&gt; लेकिन उद्योग के बढ़ने&lt;br /&gt;के बावजूद वहां रोजगार के अवसर नहीं बढ़े हैं। कृषि पर न...िर्भर आबादी70करोड़ होगी,उद्योग पर बमुश्किल 15 करोड़।सरकार रोजगार के आंकड़े नहीं देती-अर्थकाम&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2333254526940587404-4686705456409820142?l=mudda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mudda.blogspot.com/feeds/4686705456409820142/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2333254526940587404&amp;postID=4686705456409820142' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/4686705456409820142'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/4686705456409820142'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mudda.blogspot.com/2010/06/blog-post_04.html' title='देश के जीडीपी में कृषि क्षेत्र का योगदान'/><author><name>विकास शिशोदिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08157576148519764276</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='18' src='http://1.bp.blogspot.com/_yCbiUlApr1c/TMVfAgIbU7I/AAAAAAAAAVY/7kaK_w148Jg/S220/sing.png'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2333254526940587404.post-6494132263136040249</id><published>2010-06-02T03:40:00.000-07:00</published><updated>2010-06-02T03:47:20.659-07:00</updated><title type='text'>प्रोफेसनल कोर्स या सामान्य कोर्स</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_yCbiUlApr1c/TAY1lI-fcTI/AAAAAAAAATY/kLO2lyAHGx4/s1600/question-mark.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 240px; height: 320px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_yCbiUlApr1c/TAY1lI-fcTI/AAAAAAAAATY/kLO2lyAHGx4/s320/question-mark.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5478124908923810098" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;हाल ही में सभी बोर्ड के परिणाम घोषित हो चुके हैं। सर्वप्रथम सभी सफल अभ्यर्थियों को हार्दिक बधाई!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;परिणाम घोषित होते ही हर अभ्यर्थी और उसके पिता कॉलेज में एडमिशन के भागदौड़ में शामिल हो चुके हैं।&lt;br /&gt;संजय हाल ही में बारहवीं पास किया है। उसके पिता श्याम सुंदर चाहते हैं कि उसका पुत्र साइंस से ग्रेजुएशन करे, लेकिन संजय कंप्यूटर या मीडिया में अपना कॅरियर संवारना चाहता है। संजय का सोचना सही है। सामान्य कोर्स करने के बाद कोई प्रोफेशनल कोर्स करने में समय अधिाक लगता है। इसलिए बारहवीं के बाद ही प्रोफेशनल कोर्स करने पर समय की बचत हो सकती है।&lt;br /&gt;वर्तमान समय में प्रोफेशनल कोर्स की डिमांड है। सामान्य स्नातक को नौकरी में काफी परेशानी का सामना करना पड़ता है। वर्ल्ड बैंक की एक रिपोर्ट का भी यही मानना है कि भारत में 90 प्रतिशत ग्रेजुएट नौकरी के लायक नहीं हैं। उदारीकरण के बाद भारतीय कंपनियां विदेशी कंपनियों से प्रतिस्पध्र्दा करने के लिए कुशल कामगारों की मांग बढ़ी। रोजगार तो बढ़ा लेकिन कुशल लोगों की कमी बनी रही। यही वजह है कि हॉस्पिटेलिटी, टूरिज्म, रिटेल, प्रबंधान, बीमा, टेलीकॉम जैसे क्षेत्रों में जितने कुशल लोगों की डिमांड है उतना मिल नहीं पा रहा है। इन सभी क्षेत्रों की वर्तमान जरूरतों के हिसाब से सामान्य शिक्षा ग्रहण करना पर्याप्त नहीं है। इसके लिए आवश्यक है प्रोफेशनल कोर्स की। भविष्य में प्रोफेशनल्स की कमी की आशंका को देखकर ही सरकार ने शिक्षित युवाओं को कुशल पेशेवर बनाने का निर्णय लिया है जिसके तहत स्किल डेवलपमेंट सेंटर खोले जाएंगे।&lt;br /&gt;असमंजस का शिकार &lt;br /&gt;लंबे समय से स्कूल के अहाते से बाहर निकलकर छात्र कॉलेज-विश्वविद्यालय जैसे बृहद संसार में प्रवेश करते हैं। बारहवीं के बाद ऐसे चौराहे पर खड़े होते हैं, जहां से एक खास रास्ते का चुनाव करना होता है। ऐसा रास्ता चुनना होता है जो उनकी मनपसंद कॅरियर के मुकाम तक पहुंचाता है। पहले की अपेक्षा अब विकल्पों की कमी नहीं है। अधिाक विकल्प होने की वजह से विद्यार्थी में असमंजस की भी स्थिति भी उतनी होती है। इसी समय विद्यार्थी को तय करना होता है- प्रोफेशनल कोर्स या फिर सामान्य कोर्स।&lt;br /&gt;कमी नहीं विकल्प की&lt;br /&gt;वर्तमान में परंपरागत विषयों के साथ-साथ सैकड़ों नये विकल्प सामने उपलब्धा हैं। इन विकल्पों में से कई ऐसे विकल्प हैं जो विगत कुछ वर्षों में अपनी उपस्थिति बहुत ही प्रभावशाली ढंग से दर्ज किया है। आइए, ऐसे ही क्षेत्रों के बारे में जानते हैं:&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;एनीमेशन:&lt;/span&gt; विगत वर्ष हनुमान और रोडसाइड रोमियो जैसे एनीमेशन फिल्मों के साथ भारतीय कंपनियां और स्टूडियो इस ओर कदम बढ़ाया है। भारत में कम कीमत पर फिल्म तैयार हो जाने के कारण भी कई विदेशी प्रोडक्शन कंपनियां यहां फिल्म बनाने के लिए समझौता किया है। इसी कड़ी में यशराज फिल्म्स ने वाल्ट डिजनी के साथ समझौता किया है। फिक्की की एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2007 में यह उद्योग लगभग 0.31 बिलियन डॉलर का था जो वर्ष 2012 तक 24 प्रतिशत की वृध्दि दर्ज कर 0.94 बिलियन डॉलर का हो जायेगा।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;मीडिया-एंटरटेनमेंट&lt;/span&gt;: मंदी के कारण मीडिया एवं एंटरटेनमेंट उद्योग पर असर पड़ा, लेकिन छात्रों का इस क्षेत्र कोर्स के प्रति रूझान कम नहीं हुआ है। फिक्की के एक रिपोर्ट के अनुसार यह उद्योग वर्ष 2011 तक एक लाख करोड़ रुपये तक का हो जायेगा। इस क्षेत्र में फिल्म प्रोडक्शन से लेकर टीवी चैनलों में काफी अवसर उपलब्ध हैं।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;टेलीकॉम&lt;/span&gt;: सरकार कई नयी टेलीकॉम कंपनियों को लाइसेंस प्रदान कर रही है और भारत में एक नयी पीढ़ी (थ्री जी) की मोबाइल सेवा लांच किया गया है। इसके साथ ही इस क्षेत्र में नये तकनीक का विस्तार होगा जिसके लिए लगभग डेढ़ लाख प्रोफेशनल्स की जरूरत होगी। एक अनुमान के मुताबिक वर्ष 2010 तक भारत में 500 करोड़ मोबाइल उपभोक्ता हो जायेंगे। इस क्षेत्र में टेलीकॉम सॉफ्टवेयर इंजीनियर, टेलीकॉम सिस्टम सॉल्यूशन इंजीनियर, कस्टमर सर्विस एक्जीक्यूटिव और टावर कनेक्शन जैसे में बेहतर संभावनाएं हैं।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;लॉ:&lt;/span&gt; विगत कुछ वर्षों से परंपरागत कॅरियर के अलावा इस क्षेत्र में एक नया कॅरियर उभर कर सामने आया है लॉ प्रोसेसिंग आउटसोर्सिंग (एलपीओ)। एलपीओ काफी तेजी से विकास कर रहा है। नैस्कॉम मार्केट इंटेलिजेंस रिपोर्ट के अनुसार भारत में एलपीओ कारोबार 2010 तक छह अरब डॉलर को पार कर जायेगा। इसके अलावा बहुराष्ट्रीय कंपनियों में लीगल एडवाइजर और कंसल्टेंट जैसे पद के लिए काफी डिमांड बढ़ा है।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;बीमा:&lt;/span&gt; बीमा क्षेत्र हमेशा से ही आसानी से उपलब्धा हो जाने वाला कॅरियर रहा है। इस क्षेत्र को निजी कंपनियों के लिए खोल दिये जाने के बाद इसमें काफी रोजगार सृजन हुए। इतने के बावजूद भारत की लगभग मात्र 22 प्रतिशत लोग ही बीमा करवा पाये हैं, जबकि अमेरिका और यूरोपीय देशों में लगभग शत-प्रतिशत लोग अपना बीमा करवाए होते हैं। देश की सबसे बड़ी बीमा कंपनी भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) ने निजी कंपनियों से मिल रही चुनौतियों का सामना करने के लिए वर्ष 2011 तक 11 लाख एजेंट भर्ती करने की योजना है। इसके अलावा रिलायंस लाइफ 90 हजार, मेटलाइफ इंडिया 32 हजार और टाटा एआईजी लगभग 27 हजार लोगों को भर्ती करने की योजना है।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;बैंकिंग:&lt;/span&gt; वैश्विक मंदी के बावजूद भी भारतीय बैंक इन दिनों काफी विकास कर रहा है। साथ ही अपने विस्तार के लिए नयी भर्तियां भी कर रहे हैं। हाल ही में देश की सबसे बड़ी बैंक भारतीय स्टेट बैंक ने 25 हजार लोगों को भर्ती करने की घोषणा की है। इसके अलावा सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में अमूमन हर हफ्ते नये भर्ती की घोषणा होती रहती हैं। निजी क्षेत्र के भी कई बैंकों में नयी भर्तियां हो रहे हैं। आने वाले दो वर्षों में निजी क्षेत्र की सबसे बड़ी बैंक आईसीआईसीआई बैंक एक लाख लोगों को रोजगार प्रदान करेगी।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;मैनेजमेंट:&lt;/span&gt; मंदी के बावजूद कैंपस प्लेसमेंट कम नहीं हुआ है। मैनेजमेंट की पढ़ाई के लिए छात्रों का रूझान भी कम नहीं हुआ है। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि कैट परीक्षा में शामिल होने वाले अभ्यर्थियों में निरंतर बढ़ोतरी हुई है। बी-स्कूलों में दाखिला के लिए देश में कई एंट्रेंस टेस्ट आयोजित किये जाते हैं। इनमें से किसी परीक्षा में शामिल होकर बेहतर अंक प्रतिशत के साथ पसंदीदा बी-स्कूल में दाखिला लिया जा सकता है।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;हेल्थ सेक्टर:&lt;/span&gt; प्राइसवाटरहाउसकुपर्स के अनुसार, हेल्थ सेक्टर 2012 तक 40 बिलियन डॉलर का हो जायेगा। इस क्षेत्र में आगामी कुछ वर्षों में लगभग 60 अरब डॉलर निवेश की संभावना है। जापान की कंपनी दाइची सैंक्यो ने भारत की सबसे बड़ी फार्मा कंपनी रैनबैक्सी का अधिाग्रहण किया है। इसके अलावा कई विदेशी कंपनियां अपनी इकाई भारत में खोल रहा है। साथ ही भारत में मैनपावर की कम कीमत होने की वजह से अपने शोधा कार्य भी भारत में करवा रहे हैं। इसके लिए काफी प्रोफेशनल्स की मांग होगी।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;टूरिज्म: &lt;/span&gt;नवंबर माह में मुंबई में हुए आतंकी हमले के बाद भारत में विदेशी सैलानियों के आने में कमी दर्ज की गयी थी लेकिन विगत कुछ माह में सुधारे हालात के बाद सैलानियों के आने की संख्या में बढ़ोतरी हुई है। वर्ल्ड ट्रेवल एंड टूरिज्म के मुताबिक भारत ने वर्ष 2008 में टूरिज्म से लगभग 100 बिलियन डॉलर की कमाई अर्जित की है जो वर्ष 2018 तक 9.4 प्रतिशत वार्षिक दर से बढ़कर 275.5 बिलियन डॉलर का हो जायेगा। हाल के वर्षों में भारत ने मेडिकल टूरिज्म से भी काफी घन किया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;क्या करें, क्या न करें&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कोर्स चुनने से पहले अपनी रुचि, क्षमता व कॅरियर विकल्प पर विचार अवश्य करें।&lt;br /&gt;दूसरों की देखा-देखी में कोर्स का चयन न करें। पारंपरिक कोर्स के बजाय नये विकल्पों पर भी विचार करें।&lt;br /&gt;अनिर्णय की स्थिति में काउंसलर की सलाह लें।&lt;br /&gt;लक्ष्यहीन या दिशाहीन पढ़ाई न करें।&lt;br /&gt;जिस संस्थान से कोर्स करना चाहते हैं, उसकी मान्यता के बारे में पता जरूर कर लें।&lt;br /&gt;कोर्स चुनते समय कॅरियर से संबंधिात विकल्प संभावनाओं का भी धयान रखना चाहिए।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2333254526940587404-6494132263136040249?l=mudda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mudda.blogspot.com/feeds/6494132263136040249/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2333254526940587404&amp;postID=6494132263136040249' title='7 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/6494132263136040249'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/6494132263136040249'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mudda.blogspot.com/2010/06/blog-post.html' title='प्रोफेसनल कोर्स या सामान्य कोर्स'/><author><name>विकास शिशोदिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08157576148519764276</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='18' src='http://1.bp.blogspot.com/_yCbiUlApr1c/TMVfAgIbU7I/AAAAAAAAAVY/7kaK_w148Jg/S220/sing.png'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_yCbiUlApr1c/TAY1lI-fcTI/AAAAAAAAATY/kLO2lyAHGx4/s72-c/question-mark.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2333254526940587404.post-2860739020955876247</id><published>2010-05-25T03:44:00.000-07:00</published><updated>2010-05-25T03:46:27.006-07:00</updated><title type='text'>क्या ग़लत है, क्या सही है?</title><content type='html'>क्या ग़लत है, क्या सही है दरअसल ये सवाल ही नहीं है। नज़र बदले तो अच्छा बदतर हो जाता है, बदतर कई बार बेहतर बन जाता है, दूध जब रूप बदले तो बनता दही है, दूध का रूप बदलना ग़लत है या दही का जमना सही है। क्या ग़लत है, क्या सही है दरअसल ये सवाल ही नहीं है।जगह बदले तो अक्सर बातें बदल जाती हैं लोग बदलते हैं, चाहतें बदल जाती हैं, कहीं दिन तो कहीं रातें बदल जाती हैं, क्या दिन का ढलना ग़लत है या रातों का आना सही है । क्या ग़लत है, क्या सही है दरअसल ये सवाल ही नहीं है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2333254526940587404-2860739020955876247?l=mudda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mudda.blogspot.com/feeds/2860739020955876247/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2333254526940587404&amp;postID=2860739020955876247' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/2860739020955876247'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/2860739020955876247'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mudda.blogspot.com/2010/05/blog-post.html' title='क्या ग़लत है, क्या सही है?'/><author><name>विकास शिशोदिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08157576148519764276</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='18' src='http://1.bp.blogspot.com/_yCbiUlApr1c/TMVfAgIbU7I/AAAAAAAAAVY/7kaK_w148Jg/S220/sing.png'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2333254526940587404.post-8694906426374685241</id><published>2010-04-28T03:28:00.000-07:00</published><updated>2010-04-28T03:32:08.207-07:00</updated><title type='text'>एक सवाल</title><content type='html'>पंकज रामेन्दू&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक सवाल हर बार सोचता हूं कि जिंदगी जब एक रूपया हो जायेगी,तो बारह आने खर्च कर डालूंगा औऱ चाराने बचा लूंगा, कभी ज़रूरत पड़े,तो इन चारानों से बारानों का मज़ा ले सकूं,लेकिन जब भी वक्त की मुट्ठी खुलती है तो हथेली पर चाराने ही नज़र आते हैं पूरी जिंदगी चाराने को बाराने बनाने में होम हो जाती है, कई बार लगता है कि जब ये रुपया हो जायेगी तो क्या जिंदगी, जिंदगी रह जाएगी ?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2333254526940587404-8694906426374685241?l=mudda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mudda.blogspot.com/feeds/8694906426374685241/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2333254526940587404&amp;postID=8694906426374685241' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/8694906426374685241'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/8694906426374685241'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mudda.blogspot.com/2010/04/blog-post_28.html' title='एक सवाल'/><author><name>विकास शिशोदिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08157576148519764276</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='18' src='http://1.bp.blogspot.com/_yCbiUlApr1c/TMVfAgIbU7I/AAAAAAAAAVY/7kaK_w148Jg/S220/sing.png'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2333254526940587404.post-6105539560670717243</id><published>2010-04-17T07:40:00.000-07:00</published><updated>2010-04-17T07:45:53.528-07:00</updated><title type='text'>जवान देश बूढ़े लोग </title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_yCbiUlApr1c/S8nJlBO6haI/AAAAAAAAATQ/dq3OL1vSE8g/s1600/3359162079_cc9b8e0bdd.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 213px; height: 320px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_yCbiUlApr1c/S8nJlBO6haI/AAAAAAAAATQ/dq3OL1vSE8g/s320/3359162079_cc9b8e0bdd.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5461117660986770850" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;जवान देश बूढ़े लोग &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;-उन दोस्तों के लिए जो समय से पहले बूढ़े हो चले हैं ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे कुछ दोस्त हैं । पैदाईश की उम्र को पैमाना मानें तो माशाअल्लाह गबरू-जवान कहलाने लायक हैं । पर जवानी उन्ामें झलकती नहीं । जोश नहीं मारती । पतला वाला तीस के करीब पहुंच चुका है । मोटा दो साल पीछे है। ढलती शाम के साथ ही दोनों के कंधे झुक जाते हैं । चेहरे पर पीलापन हावी होने लगता है । बुझा-बुझा सा दिखता चेहरा चिल्ला चिल्ला कर बुढ़ापे से उनकी बढ़ती नजदीकी को बयान करते हैं ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बात महज जवानी से दूर होते बॉडी-लैंग्वेज तक रूकी रहती तो खैर था । क्यां बताएं इन दिनों उनकी बातचीत का लहजा भी खतरनाक हो चला है । महज चार-पांच साल पुरानी नौकरी में पचास साल का अनुभव पा चुके इन दोस्तों के तर्क भी अजब गजब है । हर ओर छाई उदासी और खतरे को खुद से सबसे पहले जोड़ने लेत हैं । मुझे बहुत फिक्र है मेरे भाईयों । क्या होगा तुम दोनों का ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनको देख ऐसा लगता है जैसे छत के उपर मुंडेर पर काला लिहाफ ओढ़े खतरनाक बुढ़ापे का साया उन्हें लगातार पास बुला रहा है । झूलते चेहरों वाले, सफेद बालों और थकी हुई आंखों पर चश्मा लगाने वाला वह चेहरा डरा रहा है । और जवानी । जैसे दूर किसी छत पर खड़ी अलमस्त जवान औरत की तरह बन गई है। पास आने को तरसा रही है । लगातार बढ़ती दूरी का नशतर चुभा रही है ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे यह इन दो दोस्तों की बात नहीं है । ऑफिस में जुटे कामकाजी सहयोगियों पर भी ढलती हुई उम्र का असर दिखता नजर आ रहा है । मिला-जुलाकर एक बेचारगी सी झलकती है सबके चेहरे पर । लड़ने को कोई जज्बा नहीं बचा है किसी में । पैदा हो गए थें । सो किसी तरह समय काटने के लिए खा पका रहे हैं ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सच कहूं तो गहरे अर्थों में यह मुल्क भी बूढ़ा हो चला है । समय से पहले रिटायरमेंट प्राप्त कर चुका बुजूआü मुल्क । विश्वास नहीं होता हो , अपने करीब मौजूद किसी छोटे बच्चे से सवाल पूछीए । जिंदगी और मौत के बारे में उसके विचार जानने की कोशिश कीजिए । उससे तीन गुणे ज्यादा उम्र का पढ़ा लिखा विदेशी भी उतना नहीं बता पाएगा । जितना हमारे देश का छोटा बच्चा जिंदगी और मौत के बारे में अधिकार भाव से बोलता नजर आएगा ।&lt;br /&gt;आप शायद इसे संस्कारों की संज्ञा देंगे । पर मैं इसमें खो गए बचपन की बालपन को देखता हूं । खेलने कूदने की उम्र में ही गंभीर हो चला है । तत्व ज्ञान जैसी बातें करता है। और हम मुग्ध हैं । वाह! इट हैपेन्स ओनली इन इंडिया ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैने सुना था कि आबादी के उम्र के लिहाज से भारत एक युवा देश है । देश की साठ फीसदी आबादी जवान कहलाने लायक है । हां उम्र के पैमाने पर सही है । पर दिमागी तौर पर सब के सब मौत का इंतजार करती हुई एक बेचारी भीड़ से ज्यादा कुछ नहीं है । मामला चाहे कोई भी हो । कोई लहर पैदा नहीं होती । संसद में पैसे लेकर सरकार गिराने की बात हो । बंगलुरु या अहमदाबाद में बम Žलॉस्ट की बात हो । सड़क खराब हो जाने की बात हो । या सरेशाम किसी युवति की इज्जत के साथ होने वाले खिलवाड़ की बात हो । हम पर कोई असर नहीं पड़ता । जब तक हम सुरक्षित हैं । हमें परवाह ही नहीं । आखिर हम जवान जो ठहरे ! इंडिया इज यंग ! ! ! !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जानता हूं अभी भी यकिन नहीं आता होगा । मान ही नहीं सकते । विश्व गुरू रह चुके हैं हम । ऐसे कैसे मान लेंगे । मैंने कहा और मान लें । अरे मैं कौन हूं । एक छोटा प्रयोग करके देखीए । देश और दुनिया में जुड़ी बातों पर लोगों के विचार सुनिए । खाट पर पड़े चर चर करने वाले बुढ़ापा राग और निंदा रस में डूबी व्या�याओं के अलावा कुछ और नहीं दिखेगा । एक भी आदमी ऐसा नहीं दिखता या बोलता कि हम नया क्या कर सकते हैं। पता नहीं क्यों उम्र से जवान लोग भी जवानी की भाषा भूल गए हैंं ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हर मोड़ पर । हर चेहरे पर एक लाचारी दिखती है । बस यूं ही घीसटते रहने की लाचारी । कोई रिस्क लेने को तैयार नहीं है । यही नहीं कोई आगे बढ़े तो एक दो नहीं चालीस लोग उसे रोकने को आगे आ जाते हैं । मां-बाप रोकते हैं । भाई बहन लगाम लगा देतेे हैं । दोस्त समाज सब जुट जाते हैं । अरे रोको इसे । यह पागल है जवानी की बात करता है । अरे कुछ नहीं होगा । बहुत आए और बहुत गए ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बसों में सफर करते वक्त आस पास लोगों के चेहरे देखीएगा । एक बेचारगी सी दिखेगी । सबके चेहरे पर सम भाव बेचारगी । साथ साथ लटके रहने का भाव । उ�मीद बस दो ही है । किसी तरह पास वाली सीट पर बैठने का अवसर मिल जाए । या जल्दी बस स्टॉप आ जाए ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बूढ़ा मुल्क और सोच भी क्या सकता है । मजेदार बात यह है कि लोग तर्क खोज लेते हैं । तर्क के रंग से बाल काले करने का प्रयास करते हैं । कहते हैं कि देखों जिंदगी ऐसे ही चलती है भाई । देखो बाल काले हैं हमारे । जवानी बची है यार । थोथे तर्क । पर कमजोर हाथों में भारी तलवार कितनी देर टिकती है । खुद ही सर या पांव पर दे मारते हैं हम सारे ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपने एक बुढ़ाते दोस्त के छोटे भाई की कहानी सुनाऊं आपको । जिंदगी और मौत के बारे में अधिकार भाव से बोलते नजर आते हैं । नौकरी जो करते हैं उसकी फिक्र कम है । जज्बा नहीं पेट भरने का रूटीन है । बेहतर तरीके से कैसे काम करते हैं यह पूछते ही चुप हो जाते हैं । पर जिंदगी और मौत पर चर्चा छेड़ीए कि उनका व्या�यान शुरू हो जाता है । मेरी एक महिला मित्र हैं। हां, वाकई हैं । उनकी छोटी बहन भी है । एक दिन शुरू हो गइंü । जिंदगी और जिंदगी के बाद की जिंदगी पर । उनकी रूचि देखकर मैं भी दंग रह गया । पूछा, जिंदगी को कौन सी दिशा देना चाहती है । बोलीं , होय वही जो राम रची राखा। अब ऐसे लोगों से हम जवानी की उ�मीद क्या करें । होय वहीं , जो राम रची राखा। हां अधूरा छोड़कर लिखना बंद कर रहा हूं । बाकी जल्द ही । किस्तों में । यहीं ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2333254526940587404-6105539560670717243?l=mudda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mudda.blogspot.com/feeds/6105539560670717243/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2333254526940587404&amp;postID=6105539560670717243' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/6105539560670717243'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/6105539560670717243'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mudda.blogspot.com/2010/04/blog-post.html' title='&lt;strong&gt;जवान देश बूढ़े लोग &lt;/strong&gt;'/><author><name>विकास शिशोदिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08157576148519764276</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='18' src='http://1.bp.blogspot.com/_yCbiUlApr1c/TMVfAgIbU7I/AAAAAAAAAVY/7kaK_w148Jg/S220/sing.png'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_yCbiUlApr1c/S8nJlBO6haI/AAAAAAAAATQ/dq3OL1vSE8g/s72-c/3359162079_cc9b8e0bdd.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2333254526940587404.post-596301402010246104</id><published>2009-02-27T06:09:00.000-08:00</published><updated>2009-02-27T06:19:29.892-08:00</updated><title type='text'>Fucking Frustration</title><content type='html'>कहानी से पहले कुछ शब्द &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे बेहद करीबी दोस्त है&lt;br /&gt;कई सालों से उनका अफेयर चल रहा है &lt;br /&gt;जो अब टूटने की कगार पर है &lt;br /&gt;उनकी जिंदगी में कई ऐसे मोड है &lt;br /&gt;जो किसी मुम्बइया फिल्म के लिए धांसू मासाला साबित हो सकता है &lt;br /&gt;खैर उनके लंबे जीवन के कुछ पलों से प्रेरित होकर और उसमें कुछ कल्पनाओं का घालमेल कर &lt;br /&gt;मैंने यह कहानी लिखी है; &lt;br /&gt;लिखना इसलिए जरूरी था कि &lt;br /&gt;क्योंकि यही इस कहानी की नियती थी &lt;br /&gt;बहरहाल &lt;br /&gt;पेश है एक अजब कहानी &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहला प्रसंग &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह बंदा दिल्ली आया था । शायद 2000 की बात हो । कुछ सपनों के साथ और कुछ दोस्तों के कहने पर कहीं घर में महसूस होने वाली उब और बंदिशों से बचने के के लिए आया था। दिल्ली उम्र बीस बाईस के पास रही होगी। उसकी एक प्रेमिका थी। &lt;br /&gt;जैसा उसने बताया। यहां दिल्ली में जीवन में सकून था। जल्द ही काॅलेज शुरू हो गया।काॅलेज में एक लडकी से मोहब्बत जैसी कुछ चीज हुई एक बार फिर दोस्तों के कहने पर प्रपोजल ठोका लडकी ने इंकार कर दिया । वह पैसे वाली लडकी थी। यह ग्रेट इंडियन मिडिल क्लास का बंदा था । वह सेंटी हो गया दोस्तों के साथ दारू पीकर भूलने की कोशिश करता था।समय गुजरता रहा जाॅब की जददोजहद  पैसे घर से आने कम होने लगे थे। पिता जी कहना था कुछ टयूश्न वगैरह देखो घर की दिक्कतों को देखते हुए उसने नौकरी खोजना शुरू किया पढने में ठीक था एक नौकरी मिली शुरूआती दिनों में वह सारा ध्यान नौकरी पर देने लगा कुछ माह बीत गए उसे वहां एक लडकी दिखी&lt;br /&gt;भोली सी &lt;br /&gt;अपनी सी &lt;br /&gt;उससे बात शुरू&lt;br /&gt;हुई&lt;br /&gt;कई बार दोनों ने &lt;br /&gt;एक दूसरे की मदद की &lt;br /&gt;अनजाने में &lt;br /&gt;एक प्यारे से रिश्ते की &lt;br /&gt;शुरूआत हो चुकी थी&lt;br /&gt;दिन बीते &lt;br /&gt;माह बीते&lt;br /&gt;साल बीते &lt;br /&gt;बंदे ने नौकरी छोड दी &lt;br /&gt;दूसरी जगह नौकरी करने लगा &lt;br /&gt;वह बहुत व्यस्त हो गया था &lt;br /&gt;उसे काम के अलावा &lt;br /&gt;किसी बात की फिक्र नहीं थी &lt;br /&gt;खूब मेहनत करता था&lt;br /&gt;तरक्की मिली&lt;br /&gt;एक दिन जब वह कार्यालय &lt;br /&gt;जा रहा था &lt;br /&gt;तब &lt;br /&gt;बस स्टाॅप पर &lt;br /&gt;उसे वही पुराने आॅफिस वाली &lt;br /&gt;लडकी दिखी&lt;br /&gt;बाइक रोककर &lt;br /&gt;वह उसके पास गया &lt;br /&gt;दोनों में फोन नंबर&lt;br /&gt;एक दूसरे को दिया &lt;br /&gt;एक बार फिर &lt;br /&gt;जिंदगी सुनहरी करवट लेने लगी &lt;br /&gt;धीरे धीरे &lt;br /&gt;बातचीत रंग लाने लगी &lt;br /&gt;अब दोनों को &lt;br /&gt;जब भी काम से फुसर्त मिलती&lt;br /&gt;आपस में बतियाने में जुटे रहते &lt;br /&gt;दिन बीते &lt;br /&gt;माह बीते &lt;br /&gt;कई बार मुलाकात हुई &lt;br /&gt;कई रेस्टोरेट में &lt;br /&gt;संगीतमय शामें &lt;br /&gt;साथ गुजारी &lt;br /&gt;मिलने की ललक बढी &lt;br /&gt;और फिर &lt;br /&gt;दोनों काम को &lt;br /&gt;किनारे कर मिलने लगे &lt;br /&gt;रिश्ते के भंवर कुछ गहरे हो चले थे &lt;br /&gt;सब कुछ सुनहरा सुनहरा था &lt;br /&gt;सपने जैसा सुनहरा &lt;br /&gt;लडके के लिए &lt;br /&gt;एक अच्छी नौकरी &lt;br /&gt;एक अच्छी लडकी &lt;br /&gt;लडकी के लिए &lt;br /&gt;एक अच्छा साथी &lt;br /&gt;एक नौकरी &lt;br /&gt;दोनों &lt;br /&gt;अपने &lt;br /&gt;दोस्तों के बीच &lt;br /&gt;एक दूसरे को प्रेमी प्रेमिका बताते&lt;br /&gt;कुछ दिनों बाद &lt;br /&gt;लडके ने उसे प्रपोज किया &lt;br /&gt;कुछ नाज नखरे के बाद &lt;br /&gt;लडकी मान गई &lt;br /&gt;मगर &lt;br /&gt;शादी के शत्र्त पर &lt;br /&gt;रिश्तों का भंवर और तेज घूमने लगा था &lt;br /&gt;अब दोनों एक दूसरे की फिक्र करने लगे&lt;br /&gt;लडका खाना खाता है या नहीं &lt;br /&gt;लडकी उसके लिए खाना &lt;br /&gt;घर से बनाकर लाती &lt;br /&gt;लडका &lt;br /&gt;उसकी परवाह करता &lt;br /&gt;उसे घर से &lt;br /&gt;लाता और वापस घर ले जाता &lt;br /&gt;इसी बीच &lt;br /&gt;लडके के लडकी की जाॅब के बारे में पूछा &lt;br /&gt;उसे कई दिक्कतों की बात कही &lt;br /&gt;पहली बार &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लडकी अपनी दिक्कतों का रोना रोती रहती थी&lt;br /&gt;लडके की अपनी मुश्किलें थी &lt;br /&gt;दोनों की दिक्कतों ने &lt;br /&gt;एक दूसरे को करीब ला दिया &lt;br /&gt;दोनों और करीब आए &lt;br /&gt;एक दिन &lt;br /&gt;किसी दुपहरी को &lt;br /&gt;वह लडकी इसके घर पहुंची &lt;br /&gt;वहां कोई नहीं था &lt;br /&gt;दोनों के बीच &lt;br /&gt;सेक्स हुआ &lt;br /&gt;लडकी रोने लगी &lt;br /&gt;लडके ने समझाया &lt;br /&gt;लडकी का मन बहल गया &lt;br /&gt;अब &lt;br /&gt;यह दौर &lt;br /&gt;अब हर &lt;br /&gt;सप्ताह जारी रहने लगा &lt;br /&gt;लडकी शादी की बात पर यकीन करती थी &lt;br /&gt;लडका सपने देखता साथ जिंदगी के सपने &lt;br /&gt;दोनों &lt;br /&gt;हर सप्ताह मिलते &lt;br /&gt;सेक्स करते &lt;br /&gt;एक दूसरे के बारे में अच्छी अच्छी बाते करते &lt;br /&gt;एक दूसरे के लिए ढेरो गिफट खरीदते &lt;br /&gt;और काम में लगे रहते &lt;br /&gt;इस बीच &lt;br /&gt;सब अच्छा अच्छा होने लगा &lt;br /&gt;सुनहरा &lt;br /&gt;जिंदगी हसीन थी &lt;br /&gt;प्यार से भरी हुई &lt;br /&gt;सुनहरी &lt;br /&gt;प्यारी &lt;br /&gt;मगर &lt;br /&gt;--&lt;br /&gt;मुझे चेंज चाहिए&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हां &lt;br /&gt;उस दिन लडकी &lt;br /&gt;यही तो कह रही थी &lt;br /&gt;लडके से &lt;br /&gt;मैं इस छोटी और घटीया सी &lt;br /&gt;नौकरी से उब चुकी हूं&lt;br /&gt;मुझे कुछ करना है &lt;br /&gt;मुझे नाम , शोहरत और पैसा पाना है &lt;br /&gt;लडके को भी यही चाहिए था &lt;br /&gt;नाम ,शोहरत पैसा &lt;br /&gt;पर लडकी के सपने ज्यादा बडे थे &lt;br /&gt;उसे घर चाहिए था &lt;br /&gt;कार चाहिए थी&lt;br /&gt;नौकर चाहिए थे&lt;br /&gt;अक्सर &lt;br /&gt;इन बातों को सुनकर &lt;br /&gt;लडके का मन उदास हो जाता &lt;br /&gt;आखिरकार एक अच्छी नौकरी &lt;br /&gt;उसने बदल दी &lt;br /&gt;कुछ पैसों की खातीर उसने भी चेंज कर लिया&lt;br /&gt;लडका नई जगह पर था &lt;br /&gt;ज्यादा पैसे मिलते थे उसे &lt;br /&gt;पैसों से वह अपनी &lt;br /&gt;होने वाली बीबी के लिए &lt;br /&gt;बहुत कुछ खरीदना था &lt;br /&gt;वह उसके लिए घर खरीदना चाहता था&lt;br /&gt;कार भी &lt;br /&gt;नौकरी भी रखने की तमन्ना करता था &lt;br /&gt;रोज रात को सपने में &lt;br /&gt;वह इन चीजों का मालिक बन जाता &lt;br /&gt;वह अक्सर &lt;br /&gt;अपनी होने वाली बीबी को &lt;br /&gt;इन सपनों की कहानी बताता &lt;br /&gt;वह पैसे बचाने लगा था &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लडका उसमें बीबी की खोज करता &lt;br /&gt;लडकी उसमें पति को देखती थी &lt;br /&gt;दोनों कुछ खोज रहे थे &lt;br /&gt;मगर शायद &lt;br /&gt;दोनों को कुछ मिल नहीं पा रहा था &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी बीच लडकी के आॅफिस में &lt;br /&gt;कुछ प्राब्लम हुई &lt;br /&gt;लडके को बताया नहीं &lt;br /&gt;खुद ही फेस करने की कोशिश की &lt;br /&gt;कुछ दिनों बाद &lt;br /&gt;लडके को बात पता चली &lt;br /&gt;कि लडकी का बाॅस &lt;br /&gt;उसका बाॅस उसे तंग करता था &lt;br /&gt;हालांकि &lt;br /&gt;लडकी की खुशकिस्मती देखीए &lt;br /&gt;जल्द ही तंग करने वाला बाॅस बदल गया &lt;br /&gt;नया बास आया &lt;br /&gt;नई समस्याओं के साथ &lt;br /&gt;अब &lt;br /&gt;कुछ बेहतर होने की उम्मीद थी &lt;br /&gt;मगर ऐसा नहीं हुआ &lt;br /&gt;लडकी की स्थिति खराब होती चली गई &lt;br /&gt;नए बास का एक विरोधी &lt;br /&gt;पहले से कार्यालय में मौजूद था &lt;br /&gt;वही लडकी की मदद के लिए आगे आया &lt;br /&gt;लडकी ना नही कर सकी &lt;br /&gt;अब आॅफिस में उस &lt;br /&gt;लडकी की स्थिति बेहतर हो चली थी &lt;br /&gt;जिसने उसकी मदद की थी &lt;br /&gt;वह गुट प्रभावी होने लगा था&lt;br /&gt;एक रात वापस घर जाने के लिए लडकी &lt;br /&gt;बस स्टाॅप पर बस का इंतजार कर रही थी&lt;br /&gt;मददगार बंदा &lt;br /&gt;अपनी कार लेकर आया &lt;br /&gt;लडकी ने ना नुकर की &lt;br /&gt;फिर उसे बस में होने वाली दिक्कतों की याद आई &lt;br /&gt;लडके जिस तरह से कुछ महसूस करने के चक्कर में रहते हैं &lt;br /&gt;उसकी रूह कांप गई &lt;br /&gt;वह झट से कार में बैठ गई &lt;br /&gt;इस बीच &lt;br /&gt;उसके प्रेमी का फोन आया &lt;br /&gt;लडकी ने फोन नहीं उठाया &lt;br /&gt;हालांकि &lt;br /&gt;कुछ सोचकर &lt;br /&gt;वह बीच रास्ते में ही उतर गई &lt;br /&gt;रास्ते में मददगार बास ने &lt;br /&gt;घरवालों के बारे में पूछा &lt;br /&gt;कुछ दिन गुजर गए &lt;br /&gt;लडकी का एक सहकर्मी कार्यालय में था &lt;br /&gt;जिससे उसकी अच्छी बनती थी &lt;br /&gt;दोनों एक दूसरे की मदद करते थे&lt;br /&gt;रात को लडकी को घर जाना था &lt;br /&gt;उसने अपने प्रेमी को फोन किया &lt;br /&gt;बातों ही बातों में प्रेमी ने बताया कि &lt;br /&gt;वह बिजी है &lt;br /&gt;बातों ही बातों में &lt;br /&gt;लडकी को कुछ याद आया &lt;br /&gt;उसने अपने दोस्त को फोन किया &lt;br /&gt;वह आया &lt;br /&gt;उस दिन पहली बार &lt;br /&gt;उसका दोस्त उसे बाइक के पीछे &lt;br /&gt;बिठा कर घर छोड आया था &lt;br /&gt;अब रोजाना उसे &lt;br /&gt;कोई न कोई घर छोड देता &lt;br /&gt;कोई नहीं मिलता तो &lt;br /&gt;वह बस का प्रयोग करती &lt;br /&gt;उधर लडका किसी काम से घर गया था &lt;br /&gt;रोज बातचीत होती थी &lt;br /&gt;कई बार कुछ अनबन सी हो जाती &lt;br /&gt;मगर बातों ही बातों में सब सामान्य हो जाता &lt;br /&gt;दोनों एक दूसरे से बंध चुके थे &lt;br /&gt;मोहब्बत का बंधन मजबूत हो चला था &lt;br /&gt;पर &lt;br /&gt;हमेशा की तरह &lt;br /&gt;नियति को &lt;br /&gt;शायद इस बार भी &lt;br /&gt;कुछ और &lt;br /&gt;ही&lt;br /&gt;मंजूर था&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कयामत का दिन &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हाल ही खरीदी गई &lt;br /&gt;नई सूट पहनकर लडकी आफिस पहुंची थी &lt;br /&gt;उसे लोग अच्छा बता रहे थे&lt;br /&gt;केबिन के पास ही &lt;br /&gt;मददगार बंदा उसे देख रहा था&lt;br /&gt;उसने उसे बुलाया &lt;br /&gt;उसकी तारीफ की &lt;br /&gt;वह अच्छा काम करती है यह भी बताया &lt;br /&gt;लडकी खुश होकर केबिन से निकल गई &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दोपहर को लडकी कैंटीन में थी &lt;br /&gt;अपने उसी सहकर्मी के साथ &lt;br /&gt;मददगार बंदा पहुंचा &lt;br /&gt;लडकी को बुलाया &lt;br /&gt;लडके को हडकाया &lt;br /&gt;बातों ही बातों में &lt;br /&gt;किसी काम को जल्द &lt;br /&gt;निपटाने को कहा &lt;br /&gt;काम जारी था &lt;br /&gt;तभी &lt;br /&gt;लडकी को उसने बुलाया &lt;br /&gt;बोला आज पार्टी है &lt;br /&gt;तुम्हे चलना होगा &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यहां बता दूं कि मददगार बंदा बीच बीच में &lt;br /&gt;उसके काम पर निगाह रखता था; &lt;br /&gt;अक्सर उसके घर तक छोड जाता था ; &lt;br /&gt;उसकी बीबी थी ; &lt;br /&gt;उससे बात भी कराई थी; &lt;br /&gt;बच्चे भी थे &lt;br /&gt;उनसे भी इस लडकी की बातचीत होती थी; &lt;br /&gt;जी खोलकर &lt;br /&gt;लडकी की मदद करता &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लडकी &lt;br /&gt;पार्टी में जाना नहीं चाह रही थी &lt;br /&gt;मगर, वह मना नहीं कर पाई &lt;br /&gt;कार पार्टी स्थल की ओर बढ चली &lt;br /&gt;रास्ते में &lt;br /&gt;बंदे को कुछ याद आया &lt;br /&gt;बोला &lt;br /&gt;अरे एक मिनट के लिए&lt;br /&gt;घर चलना होगा &lt;br /&gt;लडकी को कुछ शक हुआ &lt;br /&gt;मददगार ने भांप लिया &lt;br /&gt;कहा आप कार में बैठे रहना &lt;br /&gt;मैं तुरंत लौअ आउंगा &lt;br /&gt;मददगार का घर &lt;br /&gt;एक महंगी लोकेलिटी पर था &lt;br /&gt;लडकी सोच रही थी &lt;br /&gt;मैं भी अपने &lt;br /&gt;प्रेमी से कहूंगी &lt;br /&gt;कुछ ऐसा ही मकान बनाने को &lt;br /&gt;मैं भी तो अच्छी जिंदगी चाहती हूं&lt;br /&gt;कार में सोचते सोचते &lt;br /&gt;पांच मिनट गुजर चुके थे &lt;br /&gt;मददगार वापस नहीं लौट रहा था &lt;br /&gt;इस बीच &lt;br /&gt;इसके प्रेमी का फोन आया &lt;br /&gt;इसके कहा &lt;br /&gt;आॅफिस में हूं&lt;br /&gt;बाद मंे बात करता हूं&lt;br /&gt;प्रेमी की बातों का उत्साह ठंडा पड गया था &lt;br /&gt;दरअसल &lt;br /&gt;वह घरवालों को रजामंद कर चुका था &lt;br /&gt;उसके लिए कीमती तोहफे लाया था &lt;br /&gt;मगर &lt;br /&gt;वह बोल नहीं पाया &lt;br /&gt;इधर कार में पांच और मिनट गुजर चुके थे &lt;br /&gt;वह कार से उतरी &lt;br /&gt;कुछ सोचती हुई &lt;br /&gt;घर के अंदर दाखिल हुई &lt;br /&gt;अंदर से अचानक आवाज आई &lt;br /&gt;बस हो गया&lt;br /&gt;आ रहा हूं&lt;br /&gt;एक मिनट बाद &lt;br /&gt;दोबारा आवाज आई&lt;br /&gt;अंदर आ जाओ &lt;br /&gt;घबराओ नहीं &lt;br /&gt;पानी पी लो &lt;br /&gt;लडकी ्िरफज से पानी &lt;br /&gt;निकालकर पी रही थी &lt;br /&gt;सामने से उसका मददगार बास &lt;br /&gt;सज संवर कर आ चुका था &lt;br /&gt;सामने दिखते ही उसने कहा &lt;br /&gt;अब तुम इतनी अच्छी लग रही हो तो &lt;br /&gt;मुझे भी अच्छा डेस पहनना पडा&lt;br /&gt;लडकी खुश हो गई &lt;br /&gt;इस बीच दोनों बाहर आ गए &lt;br /&gt;मददगार का मोबाइल अंदर रह गया था &lt;br /&gt;उसने दोबारा दरवाजा खोला &lt;br /&gt;मददगार शख्स ने लडकी की ओर देखा &lt;br /&gt;आंखों में कुछ बात थी &lt;br /&gt;दोनों घर के अंदर &lt;br /&gt;कमरे में बैठ गए &lt;br /&gt;आफिस की दिक्कतों से बात शुरू हुई &lt;br /&gt;लडकी को सपोर्ट करने की बात बताई गई &lt;br /&gt;बातों ही बातों में मददगार &lt;br /&gt;उसके पास आ गया था &lt;br /&gt;लडकी को पता चलने से पहले &lt;br /&gt;उसका हाथ मददगार पकड चुका था &lt;br /&gt;लडकी बिदक गई &lt;br /&gt;उसने विरोध किया &lt;br /&gt;मददगार ने हाथ नहीं छोडा &lt;br /&gt;लडकी रोने लगी &lt;br /&gt;मददगार अडा रहा &lt;br /&gt;वह उसके कपडे उतार रहा था&lt;br /&gt;कमरे में वह इधर उधर &lt;br /&gt;भागती रही &lt;br /&gt;मगर उसके कदम &lt;br /&gt;रूक गए &lt;br /&gt;लडकी रोती जा रही थी &lt;br /&gt;उसने मददगार को एक जोरदार चांटा &lt;br /&gt;मारा विरोध किया &lt;br /&gt;सर यह गलत है सर &lt;br /&gt;ऐसा मैं नहीं कर सकती &lt;br /&gt;प्लीज &lt;br /&gt;मैं मर जाउंगी &lt;br /&gt;मगर पता &lt;br /&gt;नहीं क्यों &lt;br /&gt;उस दिन लडकी &lt;br /&gt;ज्यादा देर तक &lt;br /&gt;मना नहीं कर पाई &lt;br /&gt;नए कपडे &lt;br /&gt;उतार दिए गए &lt;br /&gt;मददगार ने सेक्स किया &lt;br /&gt;लडकी ने जिस्म को झेला &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लडकी देर तक राती रही &lt;br /&gt;जमाने की तस्वीर उसके सामने थी &lt;br /&gt;गरीब मां बाप&lt;br /&gt;प्रेमी, दोस्त &lt;br /&gt;बेदर्द जमाने में वह लुट चुकी थी &lt;br /&gt;वह मरना चाह रही थी &lt;br /&gt;मददगार ने समझाया &lt;br /&gt;एक घंटे बाद &lt;br /&gt;दोनों आॅफिस पहुंचे &lt;br /&gt;उस रात को &lt;br /&gt;लडकी सो नहीं पाई &lt;br /&gt;मददगार &lt;br /&gt;उसके साथ सपने में दुराचार करता रहा &lt;br /&gt;सुबह बोझिल सी &lt;br /&gt;कुछ खोई सी &lt;br /&gt;रूआंसी होकर &lt;br /&gt;आॅफिस &lt;br /&gt;पहुंची &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगले दिन &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मगर यह क्या &lt;br /&gt;लडकी की पूरे आॅफिस में चर्चा थी &lt;br /&gt;मददगार ने उसकी &lt;br /&gt;खबर की खूब तारीफ की थी &lt;br /&gt;लडकी मीडिया में थी &lt;br /&gt;दो दिनों बाद &lt;br /&gt;वह प्राइम टाइम की एक्सक्लूसीव खबर कर रही थी &lt;br /&gt;जल्द ही &lt;br /&gt;उसका प्रमोशन हो गया &lt;br /&gt;जिस्म झेलना उसकी मजबूरी बन गई थी&lt;br /&gt;वह सिगरेट और शराब पीने लगी थी &lt;br /&gt;खोई खोई सी रहती थी &lt;br /&gt;मददगार ने उसकी हर इच्छा पूरी की थी &lt;br /&gt;बगैर कुछ कहे और&lt;br /&gt;बहुत कुछ पाकर &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसे पैसे चाहिए थे, उसे कई प्रमोशन मिले &lt;br /&gt;नाम चाहिए था, प्राइम टाइम में मौका दिया गया &lt;br /&gt;शोहरत चाहिए थी, मशहूर एंकर बन चुकी थी;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उधर लडके से वह आम दिनों की तरह मिलती रही &lt;br /&gt;वह उससे आज भी उतनी ही मोहब्बत करती थी &lt;br /&gt;बेईंतहा मोहब्बत &lt;br /&gt;अपने जानू के लिए वह कई सामान खरीदती &lt;br /&gt;लडका खुश हो जाता &lt;br /&gt;दोनों साथ बिताते &lt;br /&gt;उस दौरान वह लडकी &lt;br /&gt;नार्मल दिखने का प्रयास करती &lt;br /&gt;इस बातों और मजबूरियों से अनजान &lt;br /&gt;लडके को पता नहीं चला कि &lt;br /&gt;उसक दुनिया कितनी बदल चुकी थी &lt;br /&gt;एक बार फिर &lt;br /&gt;वक्त ने करवट ली &lt;br /&gt;कुछ दिनों बाद &lt;br /&gt;चैनल में &lt;br /&gt;मददगार की स्थिति &lt;br /&gt;कमजोर होती गई &lt;br /&gt;राजनीति का दांव इस बार उल्टा पडा था &lt;br /&gt;वह नौकरी छोडकर चला गया था &lt;br /&gt;लडकी &lt;br /&gt;अकेली रह गई थी &lt;br /&gt;रात को बहुत दिनों बाद &lt;br /&gt;उसे बस में जाने की जरूरत पडी थी &lt;br /&gt;उसने पुराने दोस्त को फोन किया&lt;br /&gt;बाइक वाले सहकर्मी आ गया &lt;br /&gt;मगर &lt;br /&gt;दोनों के बीच कोई बात नहीं हुई &lt;br /&gt;घर पर &lt;br /&gt;उस रात &lt;br /&gt;लडकी को नींद नहीं आई &lt;br /&gt;करवट बदलती रही &lt;br /&gt;अपने प्रेमी के बारे में सोचती रही &lt;br /&gt;उसे याद आया &lt;br /&gt;बीते कई माह से &lt;br /&gt;उसे नींद आनी कम हो गई थी &lt;br /&gt;नींद की गोली &lt;br /&gt;उसकी जरूरत बन चली थी&lt;br /&gt;इधर घरवाले &lt;br /&gt;लडकी से कुछ &lt;br /&gt;और पैसों की डिमांड करने लगे थे &lt;br /&gt;रात को ऐसे लगा &lt;br /&gt;उसे लगा &lt;br /&gt;उसका प्रेमी &lt;br /&gt;उससे दूर होने लगा था&lt;br /&gt;वह कितनी कोशिश कर रही थी&lt;br /&gt;मगर वह दूर जा रहा था &lt;br /&gt;सपने में अब &lt;br /&gt;मोहब्बत के बजाए &lt;br /&gt;दिखने लगी थी दूरियां &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छुटृटी वाले दिन &lt;br /&gt;कई माह बाद &lt;br /&gt;दोपहर को &lt;br /&gt;दोनों पुराने प्रेमी &lt;br /&gt;दोबारा मिले &lt;br /&gt;दोनों ने शिकायत की &lt;br /&gt;अब तुम पहले जैसे नहीं रहे&lt;br /&gt;उस दिन भी &lt;br /&gt;लडकी के फोन पर &lt;br /&gt;आॅफिस से फोन आते रहे &lt;br /&gt;इधर शाम को जब &lt;br /&gt;दोनों एक दूसरे में खोने लगे थे &lt;br /&gt;तभी &lt;br /&gt;उन निजी क्षणों में &lt;br /&gt;लडकी का फोन &lt;br /&gt;रिंग करने लगा &lt;br /&gt;सेक्स छोडकर &lt;br /&gt;वह फोन पर बात करने लगी &lt;br /&gt;बात जब थोडी लंबी हो गई तो &lt;br /&gt;लडके को सहन नहीं हुआ &lt;br /&gt;वह बाथरूम चला गया &lt;br /&gt;वापस कमरे में दाखिल &lt;br /&gt;होते वक्त लडकी ने पूछा&lt;br /&gt;कहां चले गए थे &lt;br /&gt;तुम तो &lt;br /&gt;कुछ कर ही &lt;br /&gt;नहीं सकते &lt;br /&gt;बात कहीं चुभी थी &lt;br /&gt;खैर &lt;br /&gt;दोनों में &lt;br /&gt;बातचीत हुई &lt;br /&gt;दोबारा सेक्स भी हुआ &lt;br /&gt;साथ मरने जीने &lt;br /&gt;की कसमें &lt;br /&gt;खाकर दोनों विदा हुए &lt;br /&gt;इधर &lt;br /&gt;लडके की नौकरी पर खतरा मंडराने लगा &lt;br /&gt;उसके यहां माहौल ठीक नहीं था &lt;br /&gt;मंदी की &lt;br /&gt;ताजतरीन मार &lt;br /&gt;सब पर पडने लगी थी &lt;br /&gt;इस बीच &lt;br /&gt;लडके ने &lt;br /&gt;नौकरी के लिए &lt;br /&gt;उसी मददगार को फोन किया &lt;br /&gt;फोन पर मददगार ने उसके काम की सराहना की &lt;br /&gt;पर नौकरी देने से इंकार कर दिया &lt;br /&gt;लडकी को फोन कर वह कुछ &lt;br /&gt;बताने वाला ही था कि &lt;br /&gt;लडकी का फोन आया &lt;br /&gt;मददगार शख्स की बात बताते हुए &lt;br /&gt;लडकी बोल रही थी &lt;br /&gt;सर ने मुझे नई नौकरी दे दी है &lt;br /&gt;ओफ वह कितने अच्छे है &lt;br /&gt;मैं तुम्हारे लिए भी &lt;br /&gt;उनसे बात करूं &lt;br /&gt;क्या &lt;br /&gt;लडके ने मना करते हुए &lt;br /&gt;फोन काट दिया &lt;br /&gt;आज &lt;br /&gt;वह कुछ हार गया था &lt;br /&gt;पुरानी उस दिन वाली बात याद आई &lt;br /&gt;सेक्स के दौरान &lt;br /&gt;फोन आने की घटना &lt;br /&gt;कमाल है लडकी फोन &lt;br /&gt;उस वक्त वह फोन कैसे &lt;br /&gt;उठा सकती थी &lt;br /&gt;वह कुछ उलझन में था &lt;br /&gt;सामने दीवार थी &lt;br /&gt;हाथों में फोन था &lt;br /&gt;अचानक आए &lt;br /&gt;गुस्से ने फोन और दीवार का &lt;br /&gt;तालमेल करा दिया &lt;br /&gt;फोन जमीन पर टुकडो टुकडो में पडा था&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;-&lt;br /&gt;फिर नई नौकरी &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लडकी को नई नौकरी मिल चुकी थी&lt;br /&gt;वह खुश थी &lt;br /&gt;उसे प्रेमी से ज्यादा पैसे मिलते थे &lt;br /&gt;अंदर ही अंदर &lt;br /&gt;उसे इस बात का गहरा सकून मिल रहा था &lt;br /&gt;उधर दोनों की बातचीत अब &lt;br /&gt;आफिस खबर और पैसे को &lt;br /&gt;लेकर ही होती थी &lt;br /&gt;शादी और कसमें भी &lt;br /&gt;इसका हिस्सा हुआ करती थी &lt;br /&gt;मगर कभी कभी &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब दोनों नए तल पर थे &lt;br /&gt;इस बार लडकी उंचे तल पर थी &lt;br /&gt;उसके पास अच्छी नौकरी और पैसा था &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस बीच &lt;br /&gt;मददगार ने एक और दांव खेला &lt;br /&gt;लडकी को बुलाया &lt;br /&gt;बोला यार &lt;br /&gt;हमारे &lt;br /&gt;यहां प्राइम टाइम में लिए स्लाॅट खाली है &lt;br /&gt;लडकी ईशारा समझ चुकी थी &lt;br /&gt;उसके मुंह से गालियां निकल रही थी &lt;br /&gt;लडकी ने गाली देते हुए सिगरेट सुलगाया &lt;br /&gt;कुछ सोचने के बाद &lt;br /&gt;वह राजी थी &lt;br /&gt;मगर दिक्कत कुछ और थी &lt;br /&gt;प्राइम टाइम का प्रोडयूसर कोई और था &lt;br /&gt;सीधे कहे तो &lt;br /&gt;इस लडकी को &lt;br /&gt;उसे खुश करना था &lt;br /&gt;हर तरह से &lt;br /&gt;वह इसके लिए तैयार नहीं थी &lt;br /&gt;मददगार बोलता रहा &lt;br /&gt;वह सुनती रही &lt;br /&gt;सिगरेट को जमीन पर फेंकते हुए बोली &lt;br /&gt;कहां जाना होगा &lt;br /&gt;अगली सुबह &lt;br /&gt;वह &lt;br /&gt;प्रोडयूसर के घर पर थी &lt;br /&gt;उस काले मोटे को देखकर &lt;br /&gt;वह कांप गई &lt;br /&gt;मोटा सब कुछ एक बार में ही पाना &lt;br /&gt;चाहता था &lt;br /&gt;मोटा उसके सामने अपना नंगा जिस्म लेकर &lt;br /&gt;खडा था &lt;br /&gt;लडकी ने मुंह बंद किया &lt;br /&gt;आंखों से आंसू आ गए &lt;br /&gt;वह उसे झेलती रही &lt;br /&gt;मोटा उसे नोंचता खसोटता रहा &lt;br /&gt;लौटते वक्त &lt;br /&gt;कार में बैठी &lt;br /&gt;लडकी सोच रही थी &lt;br /&gt;राक्षस साला &lt;br /&gt;आगे तो देखा भी नहीं &lt;br /&gt;सिर्फ &lt;br /&gt;पिछे ही &lt;br /&gt;खैर &lt;br /&gt;जल्द ही &lt;br /&gt;उस चैनल में &lt;br /&gt;प्राइम टाइम का शो &lt;br /&gt;चलने लगा था &lt;br /&gt;लडकी स्टाॅर बन चुकी थी &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इधर लडका भी नई नौकरी तलाश चुका था &lt;br /&gt;उसे बेहतर पैसे मिलने लगे थे &lt;br /&gt;अपनी नौकरी से खुश था &lt;br /&gt;शादी करना चाहता था &lt;br /&gt;रोज टीवी पर होने वाली बीबी को देखता था &lt;br /&gt;अब तो उसके &lt;br /&gt;घरवाले भी देखते थे &lt;br /&gt;वह फोन करता &lt;br /&gt;तो वह बिजी रहती &lt;br /&gt;सुबह से शाम तक &lt;br /&gt;बिजी &lt;br /&gt;रात को भी बिजी &lt;br /&gt;कुछ टूट रहा था &lt;br /&gt;दोनों के बीच &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शायद &lt;br /&gt;नीले भंवर का रंग हल्का हो चला था &lt;br /&gt;प्रेम का प्रवाह मंद पडने लगा था &lt;br /&gt;दोनों &lt;br /&gt;शादी के फैसले के बारे में &lt;br /&gt;दोबारा सोचने लगे थे &lt;br /&gt;बडे दिनों बाद &lt;br /&gt;उस रात &lt;br /&gt;लडक ने शराब पी &lt;br /&gt;खूब पी &lt;br /&gt;अब वह रोज &lt;br /&gt;शराब पीता था &lt;br /&gt;लडकी के बारे में सोचता था&lt;br /&gt;उसके सपने का क्या होगा &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उधर &lt;br /&gt;लडकी के नए चैनल में &lt;br /&gt;प्रोडयूसर को तीन माह बीत चुके थे &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब प्रोडयूसर भी तंग आ चुका था &lt;br /&gt;रोजाना एक ही जिस्म से तंग आ चुका था &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मददगार का फोन आया लडकी के पास &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बोला यार तुम कुछ दिनों के लिए छुटटी ले लो &lt;br /&gt;लडकी समझ नहीं पाई &lt;br /&gt;पर राजी हो गई &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसे शिमला जाने के पैसे दिए गए &lt;br /&gt;मददगार से साथ जाने से इंकार कर दिया &lt;br /&gt;काला प्रोडयूसर जा नहीं रहा था &lt;br /&gt;अब उसने प्रेमी को फोन किया &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दोनों शिमला गए &lt;br /&gt;साथ &lt;br /&gt;मददगार के पैसे पर&lt;br /&gt;शिमला का मजा &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रात को जब दोनों &lt;br /&gt;बिस्तर पर थे &lt;br /&gt;लडकी उसे शराबी हो जाने पर भला बुरा बोल रही थी &lt;br /&gt;लडके के सामने आज उसने पहली बार शराब पी थी &lt;br /&gt;दोनांे साथ साथ शराब पी रहे थे &lt;br /&gt;सामने टीवी आॅन था &lt;br /&gt;तभी उसके चैनल पर प्राइम टाइम का स्लग दिखा &lt;br /&gt;सामने एक&lt;br /&gt;नई खुबसूरत लडकी दिखी &lt;br /&gt;अरे &lt;br /&gt;लडकी चिल्लाई &lt;br /&gt;यह कैसे हो सकता है &lt;br /&gt;उसने सीधे प्रोडयूसर को फोन किया &lt;br /&gt;प्रोडयूसर का फोन बिजी था &lt;br /&gt;मददगार को फोन किया &lt;br /&gt;इधर लडका हैरान था &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फाॅरप्ले के बाद सेक्स से ऐन पहले &lt;br /&gt;लडकी का फोन पर बिजी हो जाना &lt;br /&gt;परेशान हो जाना &lt;br /&gt;उसे कुछ समझ में नहीं आया &lt;br /&gt;वह चिल्लाया &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उधर लडकी फोन पर चिल्ला रही थी &lt;br /&gt;टीवी पर &lt;br /&gt;वह नई वाली एंकर &lt;br /&gt;चिल्ला रही थी &lt;br /&gt;शोर हर ओर शोर &lt;br /&gt;लडकी बोली &lt;br /&gt;मददगार यह क्या है &lt;br /&gt;मददगार ने उसे समझाने की कोशिश की &lt;br /&gt;उसने साफ कहा &lt;br /&gt;तुम्हारी टीआरपी डाउन हो रही थी &lt;br /&gt;अब ज्यादा टीआरपी चाहिए&lt;br /&gt;इसलिए नई लडकी लाई गई थी &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लडकी ने फोन फेंक दिया &lt;br /&gt;नंगे बदन ही खिडकी के पास पहुंच गई &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ घंटे बाद &lt;br /&gt;वहां सन्नाटा था &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रात के उस सन्नाटे में &lt;br /&gt;कई गुमनाम चीजें थी &lt;br /&gt;किसी के रोने की आवाज थी&lt;br /&gt;एक घुटन &lt;br /&gt;कई सवाल &lt;br /&gt;हवा में &lt;br /&gt;तैर रहे थे &lt;br /&gt;शराब की बदबू &lt;br /&gt;(अगर आप चाहें तो खुशबू भी मान सकते हैं) थी&lt;br /&gt;लडकी उल्टी पडी थी &lt;br /&gt;नींद शराब और frustration&lt;br /&gt;लडके की नींद टूटी&lt;br /&gt;उसने &lt;br /&gt;सामने पडा जिस्म देखा &lt;br /&gt;उसका &lt;br /&gt;frustration&lt;br /&gt;सामने आ गया &lt;br /&gt;वह कुत्तों की तरह&lt;br /&gt;उस पर टूट पडा&lt;br /&gt;वह प्यासा था&lt;br /&gt;सब कुछ &lt;br /&gt;खा जाना चाहता था &lt;br /&gt;एक ही बार में &lt;br /&gt;समूचा &lt;br /&gt;वह पागल हो गया थ&lt;br /&gt;अंधा पागल &lt;br /&gt;कई दिनों का frustration&lt;br /&gt;सामने आ गया था &lt;br /&gt;लडकी चिल्लाइ&lt;br /&gt;लडकी र्का &lt;br /&gt;frustration&lt;br /&gt;बाहन निकला &lt;br /&gt;वह गुस्से में थी &lt;br /&gt;लाल&lt;br /&gt;चिखती हुई बोली &lt;br /&gt;तू भी मेरी मारना चाहता है&lt;br /&gt;ले मार ले&lt;br /&gt;घुसा दे अंदर&lt;br /&gt;बुझा ले प्यास&lt;br /&gt;frustration&lt;br /&gt;लडके ने वैसा ही किया&lt;br /&gt;मगर दूसरे ही सेकेंड ठिठका&lt;br /&gt;उसने कुछ सुना था&lt;br /&gt;तू भी मेरी मारना चाहता है&lt;br /&gt;हां यही शब्द थे&lt;br /&gt;उसकी होने वाली बीबी के&lt;br /&gt;वह&lt;br /&gt;रूक गया जोश ठंडा पड गया&lt;br /&gt;उसने पूछा&lt;br /&gt;तू भी का मतलब क्या है&lt;br /&gt;अरे यार कुछ नहीं&lt;br /&gt;लडकी ने कहा &lt;br /&gt;वह डर गई &lt;br /&gt;लाल चेहरा &lt;br /&gt;फक पड गया &lt;br /&gt;मैं सपना देख रही थी&lt;br /&gt;मुझे लगा ..&lt;br /&gt;कोई मेरे साथ &lt;br /&gt;जबरदस्ती कर रहा है&lt;br /&gt;..&lt;br /&gt;लडका समझ चुका था&lt;br /&gt;frustration&lt;br /&gt;लडकी भी समझा चुकी थी&lt;br /&gt;..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुबह&lt;br /&gt;सामान पैक था &lt;br /&gt;दोनों ने &lt;br /&gt;टूर कैंसल कर दिया&lt;br /&gt;बताते हैं &lt;br /&gt;कई दिनों तक &lt;br /&gt;दोनों में बात नहंी हुई&lt;br /&gt;फोन पर घंटों चिपके रहने वाले &lt;br /&gt;एक &lt;br /&gt;मिस काॅल करने और पाने को तरस गए &lt;br /&gt;एसएमभी नहीं भेजा &lt;br /&gt;इधर &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चैनल में लडकी की टीआरपी डाउन हो चली थी&lt;br /&gt;लडका काम और उस लडकी के बीच उलझ चला था &lt;br /&gt;तभी&lt;br /&gt;नियती का एक और पासा &lt;br /&gt;खतरनाक खेल &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक ब्रेकिंग न्यूज &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लडके को मिली&lt;br /&gt;अरे यार&lt;br /&gt;उस चैनल में &lt;br /&gt;एक प्राइम टाइम एंकर थी&lt;br /&gt;अभी तीन माह पहले आई थी &lt;br /&gt;जिसकी चर्चा है बहुत आज कल &lt;br /&gt;हां&lt;br /&gt;याद है ना&lt;br /&gt;शायद &lt;br /&gt;तू तो उसे जानता है&lt;br /&gt;ना अरे नहंी&lt;br /&gt;क्या हुआ ?&lt;br /&gt;उसका एमएमएस आया है नया &lt;br /&gt;वह देखना नहीं चाहता था &lt;br /&gt;पर दोस्त को मना नहीं किया &lt;br /&gt;ब्लूटूथ से &lt;br /&gt;एमएमएस लेते वक्त&lt;br /&gt;लडके को &lt;br /&gt;पसीने आ गए&lt;br /&gt;प्राडयूसर ने&lt;br /&gt;उसके साथ गुजारे निजी &lt;br /&gt;वक्तों का &lt;br /&gt;एमएमएस बनाया था&lt;br /&gt;बेहद अश्लील&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"tu भी मेरी मारना चाहता है"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसे बहुत कुछ &lt;br /&gt;समझ आ चुका था&lt;br /&gt;रात &lt;br /&gt;उसे नींद नहीं आई&lt;br /&gt;तनाव में उसने गोलियां खा ली&lt;br /&gt;20 नींद की गोलियां&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लडकी भी बेहद तनाव में थी&lt;br /&gt;तनाव कम &lt;br /&gt;पछतावा ज्यादा &lt;br /&gt;बेचारगी भी छुपी हुई &lt;br /&gt;सामने &lt;br /&gt;गरीब मां बाप &lt;br /&gt;और &lt;br /&gt;दूर जाते&lt;br /&gt;प्रेमी की तस्वरी &lt;br /&gt;सी चल रही थी &lt;br /&gt;बेददर्ज जमाने की रूखी तस्वीर &lt;br /&gt;वह प्रोडयूसर का &lt;br /&gt;खून करना चाहती थी &lt;br /&gt;मददगार को मौत देना चाहती थी &lt;br /&gt;मगर वह &lt;br /&gt;ऐसा कर नहीं पाई &lt;br /&gt;शराब पीकर उसने &lt;br /&gt;कुछ गोलियां खा ली &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नियती देखिए&lt;br /&gt;दोनों एक ही अस्पताल में लाए गए थे&lt;br /&gt;दोनों ने ही नींद की गोलियां खाई थी&lt;br /&gt;दोनों ने शराब भी पी थी&lt;br /&gt;उस अंधेरी और सर्द रात को &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सरकारी अस्पताल के डाॅक्टर &lt;br /&gt;उन दोनों को बचा नहीं पाए&lt;br /&gt;मौती जीत गई &lt;br 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rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/596301402010246104'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/596301402010246104'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mudda.blogspot.com/2009/02/fucking-frustration.html' title='Fucking Frustration'/><author><name>विकास शिशोदिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08157576148519764276</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='18' src='http://1.bp.blogspot.com/_yCbiUlApr1c/TMVfAgIbU7I/AAAAAAAAAVY/7kaK_w148Jg/S220/sing.png'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2333254526940587404.post-7195181643353470350</id><published>2008-12-02T06:33:00.000-08:00</published><updated>2008-12-02T06:35:40.190-08:00</updated><title type='text'>एक उत्तर भारतीय का दर्द </title><content type='html'>&lt;strong&gt;ये सन्देश मुझे मेरे एक साथी ने जो मुंबई में रहता है ने ऑरकुट  पर भेजा है &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;anjule: &lt;br /&gt;कहाँ हैं राज ठाकरे.....और उसकी बहादुर gundo ki ''महाराष्ट्र नव-निर्माण सेना' ?? उसको बताओ.....200 एन0 एस0 जी0 कमांडोज़ ( जिनमें कोई 'मराठी-मानुष' नहीं है....सब या तो उत्तर भारतीय हैं या दक्षिण भारतीय) जो भेजे गए उसकी तथाकथित 'आमची मुंबई' को आतंकवादियों से बचाने के लिए. जिन्होंने इसलिए अपनी जान दी ताकि 'वो' जिंदा रह सके......जिन्होंने इसलिए अपनी नींदों की कुर्बानियां की ताकि 'वो' चैन से सो सके. जिन्होंने अपने लहू की सुर्खी से "आमची मुंबई'' नहीं ''अपनी मुंबई'' के माथे पर अपनी शहादत से तिलक कर दिया...........मुंबई किसी के 'बाप' की नहीं....''भारत माँ'' की है. हर हिन्दुस्तानी की है.....बिल में छिपे 'भाषावादी चूहों' से कह दो की अब वो बाहर आ जाएँ, बहादुर शेरों ने.....(वो चाहे किसी भी फोर्स के हों .....किसी भी राज्य के हों) मुंबई के खूबसूरत गुलिस्तान में घुसे वहशी भेड़ियों के कायर कलेजे अपने जूतों की एडियों के तले मसल कर रख दिए हैं.....!!!&lt;br /&gt;इस मुठभेड़ में शहीद हुए हर बहादुर हिन्दुस्तानी की शहादत को सलाम.......!!!!&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2333254526940587404-7195181643353470350?l=mudda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mudda.blogspot.com/feeds/7195181643353470350/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2333254526940587404&amp;postID=7195181643353470350' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/7195181643353470350'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/7195181643353470350'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mudda.blogspot.com/2008/12/blog-post.html' title='&lt;strong&gt;एक उत्तर भारतीय का दर्द &lt;/strong&gt;'/><author><name>विकास शिशोदिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08157576148519764276</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='18' src='http://1.bp.blogspot.com/_yCbiUlApr1c/TMVfAgIbU7I/AAAAAAAAAVY/7kaK_w148Jg/S220/sing.png'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2333254526940587404.post-1900480592607583630</id><published>2008-10-26T02:59:00.000-07:00</published><updated>2008-10-26T05:14:32.909-07:00</updated><title type='text'>दीपावली जादू है।</title><content type='html'>&lt;strong&gt;यह लेख मुझे मेरे एक मित्र अभय ने दीपावली के सन्देश के रूप में भेजा है मुझे लगा शायद ये हम सब की कहानी है इसलिए ये आप सब के  लिए &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दीपावली जादू है। &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;तिलिस्म है अनोखा। &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;आपको एेसा नहीं लगता!!!&lt;br /&gt; &lt;br /&gt; मैं तो बड़ी शिद्दत से इस बात को महसूस करता हूं। &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;चाहे किसी भी जगह सदियों  से कोई रोशनी नहीं गई हो। &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;अंधेरा जम कर सर्द और घना हो गया हो।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt; कुछ भी साफ न हो। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वहां भी रोशनी के आते ही जादू होता है। &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;बस एक किरण अाैर अंधेरे का खात्मा । &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;काफूर हो जाता है। &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;है ना जादू । &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;दोस्तों एक बार फिर दीपावली करीब आ गई है। &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;भागदौड़ से भरी इस नौकरी में भी कुछ दिन होते है जब हम अपने जड़ों की ओर अनायास ही लौट जाते हैं। एेसे ही चंद दिनों में यह त्यौहार भी शामिल है। इस त्यौहार पर मैं जहां भी रहा घर की कमी या अपनों के साथ न होने के एहसास से साराबोर रहा। सच में मुझे घर की बहुत याद आती है। मां-बाप, भाई-बहन, पुराने दोस्त, मोहल्ले के रास्ते, कुछ हंसी , कुछ पकवान, पेंट की खुशबू, नए कपड़े, दीप और तेल, बिजली के झालर, बचपन की बेफ्रिकी और घर पर होने वाली पूजा में देरी, पटाखों का उल्लास। बता नहीं सकता हर चीज की जबरदस्त कमी महसूस होती है। मुझे कई दीपावली याद है। हमारे यहां हर साल इसी रात को रजाई ओढऩा शुरू करते थे। तमाम बातें है। भूली बिसरी सी। एेसा लगता है यादों के झरोखा बड़ा होकर दरवाजा बन जाता हो। ज्यादा नहीं कुछ साल पहले की बात है। हमलोग साथ ही यह त्यौहार मनाते हैं। आज सब अलग-अलग है। सालों हो जाते हैं एक साथ मिले। &lt;br /&gt; &lt;br /&gt; फिर दीपावली आई  है। &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;मौका है। &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;पर साथ नहीं है। &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;घर पर मां बाप अकेले होंगे। &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;फोन पर दीपावली मना ली जाएगी। &lt;br /&gt; &lt;br /&gt; &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;किसी की प्रेमिका होगी । &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;वह उसके साथ दीपावली मनाएगा। &lt;br /&gt;कोई  दोस्तों के साथ मौज मस्ती करेंगे। &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;बहरहाल पहली बार मैं मेरठ में रहूंगा। अभी डेढ़ माह पहले ही यहां आया हूं। ना तो मैं मेरठ को और ना ही यह शहर मुझे जानता है। एेसे में यहां दीपावली मनाना एक नया अनुभव होगा। मैं तो पूरी तरह तैयार हूं। दीपावली मनाने के लिए । हालांकि मेरी उम्मीद और तैयारी का बड़ा दारोमदार उससे पहले मिलने वाले वेतन पर निर्भर करेगा। &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;मेरी ओर से आप तमाम लोगों को इस पर्व की ढेर सारी शुभकामनाएं। &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;दीपावली की शुभकामनाएं। &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;आशा है आप इस अवसर का पूरा आनंद उठा पाएंगे। &lt;br /&gt;यह आपकी जिंदगी को रौशन करेगी। &lt;br /&gt; &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;है ना जादू। &lt;br /&gt;   &lt;br /&gt;Happy Diwali To you and Your Family &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;Let the festivity embrace you..&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;let there be light &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;regards&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;abhay &lt;br /&gt;HT Media LTd&lt;br /&gt;Meerut&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2333254526940587404-1900480592607583630?l=mudda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mudda.blogspot.com/feeds/1900480592607583630/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2333254526940587404&amp;postID=1900480592607583630' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/1900480592607583630'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/1900480592607583630'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mudda.blogspot.com/2008/10/blog-post_26.html' title='दीपावली जादू है।'/><author><name>विकास शिशोदिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08157576148519764276</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='18' src='http://1.bp.blogspot.com/_yCbiUlApr1c/TMVfAgIbU7I/AAAAAAAAAVY/7kaK_w148Jg/S220/sing.png'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2333254526940587404.post-7595843254233213107</id><published>2008-10-07T02:05:00.000-07:00</published><updated>2008-10-07T02:27:57.012-07:00</updated><title type='text'>टी.आर.पी. का खेल</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_yCbiUlApr1c/SOsrjaB87EI/AAAAAAAAAM4/94RK-B7rOTw/s1600-h/122.JPG"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://3.bp.blogspot.com/_yCbiUlApr1c/SOsrjaB87EI/AAAAAAAAAM4/94RK-B7rOTw/s320/122.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5254341277540740162" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2333254526940587404-7595843254233213107?l=mudda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mudda.blogspot.com/feeds/7595843254233213107/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2333254526940587404&amp;postID=7595843254233213107' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/7595843254233213107'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/7595843254233213107'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mudda.blogspot.com/2008/10/blog-post.html' title='&lt;strong&gt;टी.आर.पी. का खेल&lt;/strong&gt;'/><author><name>विकास शिशोदिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08157576148519764276</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='18' src='http://1.bp.blogspot.com/_yCbiUlApr1c/TMVfAgIbU7I/AAAAAAAAAVY/7kaK_w148Jg/S220/sing.png'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_yCbiUlApr1c/SOsrjaB87EI/AAAAAAAAAM4/94RK-B7rOTw/s72-c/122.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2333254526940587404.post-7056455077456891382</id><published>2008-09-26T03:19:00.000-07:00</published><updated>2008-09-29T02:32:17.926-07:00</updated><title type='text'>वेलकम टु सज्जनपुर "फिल्म हिट"</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_yCbiUlApr1c/SNy5kYNKDtI/AAAAAAAAAMw/UWrMbyIcWO0/s1600-h/welcome-to-sajjanpur.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://2.bp.blogspot.com/_yCbiUlApr1c/SNy5kYNKDtI/AAAAAAAAAMw/UWrMbyIcWO0/s320/welcome-to-sajjanpur.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5250275300231220946" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;रुपेश गुप्ता &lt;br /&gt;लोग कहते हैं कि हिट फिल्म के लिए कोई फार्मूला नहीं होता.लेकिन फिर भी कुछ तत्वों का होना फिल्म में ज़रुरी माना जाता है,&lt;br /&gt;जिसके बिनाह पर कहा जा सके कि फिल्म हिट हो सकती है. ये बातें फिल्म को हिट कराने की संभावनाएं बढ़ा देती है. चलिए पहले &lt;br /&gt;इन तत्वों को तलाशते हैं जो अच्छी फिल्म की निशानी के तौर पर देखी जा सकती है, कहानी और प्रस्तुतीकरण के इतर. &lt;br /&gt;अच्छी स्टारकास्ट, हिट गाने, शानदार लोकेशन्स, मार्डन कपड़े और सपनों की दुनिया- जहां जहां ज़िंदगी के कड़वे हकीकत न हों &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ताकि दर्शक तीन घंटे स्वप्नलोक में विचरण कर सके.इन सबके अलावा इंटरनेशनल तकनीक जो फिल्म को आधुनिक लुक दे.&lt;br /&gt;इसमें शानदार इडिटिंग से लेकर विसुअल इफेक्ट तक शामिल हैं. अगर किसी फिल्म में ये तमाम बातें होंगी तो फिल्म के हिट&lt;br /&gt;होने की संभावना ज़्यादा होगी. ग्रामीण पृष्ठभूमि की स्टोरी में इन तत्वों बातों की गुंजाइश काफी कम हो जाती है,और उसके नाकाम होने की&lt;br /&gt;संभावनाएं बढ़ जाती है.इसलिए ग्रामीण परिवेश की फिल्में बनाना जोखिम से भरा माना जाता है और यही वजह है कि पिछले दो दशक से&lt;br /&gt;ग्रामीण पृष्ठभूमि पर फिल्में बननी करीब-करीब बंद हो चुकी हैं. लगान और मालामाल वीकली इसके अपवाद हैं, ये फिल्में दुहस्साहस का विजयी &lt;br /&gt;नतीजा हैं.जो ग्रामीण पृष्ठभूमि के बाद भी सफल रहीं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt; अगर बात दुस्साहस की करें तो सबसे बड़ा दुस्साहसी काम श्याम बेनेगल ने किया है,वेलकम टु सज्जनपुर में. न गाने सुपर हिट हैं न ही &lt;br /&gt;सुपरहिट स्टार कास्ट. और फिल्म भी ऐसे गांव की है जिसके माहौल से परिचय शहरी तबके का परिचय कम ही होगा. सुविधाविहीन गांव.&lt;br /&gt;लेकिन इसके बाद भी एक शानदार और यादगार फिल्म. ये लोगों को एक &lt;br /&gt;नया ज़ायके का मज़ा देती है.&lt;br /&gt;अगर इसके स्टाकास्ट की बात करें तो,श्रेयस तलपड़े स्टार बनने की जद्दोजहद कर रहे हैं, तो अमृता राव कुछ एक फिल्मों के बाद उसकी &lt;br /&gt;कामयाबी को कायम नहीं रख पाईं. बाकी स्टारकास्ट की बात करें तो कोई नाम ऐसा नहीं है जिसके लिए दर्शक फिल्म देखने चले आएं.लेकिन इन&lt;br /&gt;छोटे स्टार और अच्छे कलाकारों ने ऐसा काम किया कि पूछिए मत. श्रेयस तलपड़े अपने पात्र में इतना डूबे हैं कि कहीं भी श्रेयस आपको &lt;br /&gt;नहीं दिखेगी, हर जगह कहानी का मुख्य पात्र महादेव ही नज़र आएगा.और अमृता राव, जैसी खूबसूरती वैसी मासूमियत.ऐसी मासूमियत कि काफी &lt;br /&gt;दिनों बाद याद आया कि हम हिंदुस्तानी खूबसूरती को एक और नाम से जानते हैं मासूमियत. खूबसूरती ऐसी कि मर मिटने को दिल चाहेगा.आपको&lt;br /&gt;ये भी समझ में आ जाएगा कि गर्दन से नीचे नज़र न जाने का मतलब क्या होता है.कुछ दिन बाद फिर से ये खबर पढ़ने को मिल जाए कि मकबूल&lt;br /&gt; फिदा हुसैन कमला यानी अमृता पर पेंटिग बनाएंगे. पूरी गारंटी है कि फिल्म देखने के बाद घूंघट में कुछ छिपा, कुछ झांकता कमला का चेहरा &lt;br /&gt;आपकी आंखों के सामने नाचता रहेगा.और अगर उसके पति से जलन होने लगे तो यकीन मानिए आप इकलौते नहीं हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिल्म की कहानी गांव की है, और काल्पनिक नहीं-हकीकत के इर्दगिर्द। फिल्म की कहानी हमारे समाज में हाल के दिनों में घटी तमाम&lt;br /&gt;असल घटनाओं के ज़िक्र या चित्रण से आगे बढ़ती है. चाहे वो किडनी का काला कारोबार हो या फिर बेरोजगारी और उससे पैदा हुए पलायन से&lt;br /&gt;कैसे घर बार की सामान्य खुशियां तार तार हो जाती हैं, बड़ी ही सफाई से दिखाया गया है. यह फिल्म इन समस्याओं के जड़ में पहुंचती है और &lt;br /&gt;इन समस्याओं का समाज में असर दिखाती हैं, संवेदनाओं के साथ. जहां तक खबरें नहीं पहुंच पाती.हिरोईन सुन्दर है.लेकिन उसकी सुंदरता घुंघट में &lt;br /&gt;कैद रहती है.जब घुंघट से बाहर निकलती है तो चेहरे से नीचे आपकी नज़र नहीं जा सकती. &lt;br /&gt;फिल्म की जान है इसकी कॉमेडी. जो बड़े ही स्वाभाविक हैं.किसी को तोतला या लूला बनाकर कॉमेडी को ठूंसने की कोशिश नहीं की गई है.न ही&lt;br /&gt;आपको हंसने के लिए लॉजिक को घर छोड़कर आने की ज़रुरत है. बल्कि यहां त्रासदियों से भी हंसी निकालने की निर्देशक ने सफल कोशिश की है.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2333254526940587404-7056455077456891382?l=mudda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mudda.blogspot.com/feeds/7056455077456891382/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2333254526940587404&amp;postID=7056455077456891382' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/7056455077456891382'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/7056455077456891382'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mudda.blogspot.com/2008/09/blog-post.html' title='वेलकम टु सज्जनपुर &quot;फिल्म हिट&quot;'/><author><name>विकास शिशोदिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08157576148519764276</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='18' src='http://1.bp.blogspot.com/_yCbiUlApr1c/TMVfAgIbU7I/AAAAAAAAAVY/7kaK_w148Jg/S220/sing.png'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_yCbiUlApr1c/SNy5kYNKDtI/AAAAAAAAAMw/UWrMbyIcWO0/s72-c/welcome-to-sajjanpur.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2333254526940587404.post-5339264970587332680</id><published>2008-06-13T03:47:00.000-07:00</published><updated>2008-06-13T03:48:36.513-07:00</updated><title type='text'>सब कुछ सीख कर भी तुम कुछ न सीख सके</title><content type='html'>इन अंधेरों में, मैं रोशनी की किरण तलाशता रहा,&lt;br /&gt;कुछ इस तरह से मैं अपनी ज़िंदगी तराशता रहा ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझको पाने की मंज़़िल नहीं कोई ख्वाहिश&lt;br /&gt;मेरी मंज़िल तो बस मेरा रास्ता रहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसी ज़िंदगी की नहीं ई हसरत&lt;br /&gt;जिसका बस लालच से ही वास्ता रहा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सफर तो यूं सभी करते हैं पूर्ण जिंदगी का&lt;br /&gt;किसी का तेज़, किसी का आहिस्ता रहा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सब कुछ सीख कर भी तुम कुछ न सीख सके मानव&lt;br /&gt;जिस ने चाहा परखा तुम्हे जिसने चाहा वो जांचता रहा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पंकज रामेन्दू मानव&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2333254526940587404-5339264970587332680?l=mudda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mudda.blogspot.com/feeds/5339264970587332680/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2333254526940587404&amp;postID=5339264970587332680' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/5339264970587332680'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/5339264970587332680'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mudda.blogspot.com/2008/06/blog-post.html' title='सब कुछ सीख कर भी तुम कुछ न सीख सके'/><author><name>विकास शिशोदिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08157576148519764276</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='18' src='http://1.bp.blogspot.com/_yCbiUlApr1c/TMVfAgIbU7I/AAAAAAAAAVY/7kaK_w148Jg/S220/sing.png'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2333254526940587404.post-5704575363034152826</id><published>2008-04-26T00:07:00.000-07:00</published><updated>2008-04-26T00:15:27.886-07:00</updated><title type='text'>ख्वाहिश</title><content type='html'>अंजुले श्याम मौर्य &lt;a href="http://editworksindia.com"&gt;'एडिट वर्क्स स्कूल ऑफ मास कम्यूनिकेशन&lt;/a&gt;' में बी.एस.सी. इलेक्ट्रानिक मीडिया के द्वीतीय वर्ष के छात्र हैं। ये अपनी एक प्यारी सी अभिव्यक्ति के साथ 'मुद्दा' पर हाज़िर हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अंजुले श्याम मौर्य&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;काश, यह ज़िन्दगी&lt;br /&gt;खुशनुमा इक पथ होता&lt;br /&gt;साथ में इक खूबसूरत हमसफर होता&lt;br /&gt;बातों-बातों में यूं रास्ता नप जाता&lt;br /&gt;पमारे होंठो पे जो कोई मोहब्बत भरा तराना होता&lt;br /&gt;इस तरह हमारा सफर 'आशिकाना' होता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;काश हमारे बीच&lt;br /&gt;कोई समझौता होता&lt;br /&gt;प्रेमभरा कोई घरौंदा होता&lt;br /&gt;तो मिल बैठ कर दो-चार, मीठी-तीखी बातें होंती&lt;br /&gt;जहाँ रूठने-मनाने का इक 'िसलसिला' होता&lt;br /&gt;फिर धीरे-धीरे मशहूर हमारा 'फसाना' होता&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;काश मेरा देखा &lt;br /&gt;हर सपना सच होता&lt;br /&gt;मैं ख्वाहिशों के द्वीप में सो रहा होता&lt;br /&gt;हर शाम जहाँ सपनों की बारिश और आरजू के ओले गिरते,&lt;br /&gt;यहाँ न कोई ख्वाहिश और न सपना अधूरा होता&lt;br /&gt;काश ऐसा ही दिलचस्प अपना 'आशियाना' होता।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2333254526940587404-5704575363034152826?l=mudda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mudda.blogspot.com/feeds/5704575363034152826/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2333254526940587404&amp;postID=5704575363034152826' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/5704575363034152826'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/5704575363034152826'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mudda.blogspot.com/2008/04/blog-post_26.html' title='ख्वाहिश'/><author><name>विकास शिशोदिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08157576148519764276</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='18' src='http://1.bp.blogspot.com/_yCbiUlApr1c/TMVfAgIbU7I/AAAAAAAAAVY/7kaK_w148Jg/S220/sing.png'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2333254526940587404.post-2113438200582352826</id><published>2008-04-17T05:35:00.000-07:00</published><updated>2008-04-17T05:39:41.858-07:00</updated><title type='text'>भूख मुक्त या आलस युक्त दिल्ली</title><content type='html'>जैसे जैसे चुनाव निकट आता है सबसे पहले विवेक मर जाता है। यह बात दिल्ली की राज्य सरकार या केंद्र सरकार दोनों पर बड़ा सटीक बैठता है। दिल्ली की इसलिए बोलना पड़ रहा है क्योंकि एक तो दिल्ली की है ही और जो दूसरी है जिसे आप केंद्रीय सरकार कहते हैं  वो दिल्ली के अळावा कहीं की सोचती नहीं है। खैर विषय यह नहीं है हम विषय से ना भटकते हुए सीधे विषय पर आते हैं। १६ अप्रैल को हिंदुस्तान के पेज नं. १३ पर एक विज्ञापन छपा,(हिंदुस्तान का ज़िक्र इसलिए कर रहा हूं क्योंकि मैंने इसमें देखा था, आपने हो सकता है किसी और अखबार में देखा हो) विज्ञापन का विषय है भूख मुक्त दिल्ली-एक सार्थक कदम। आप की रसोई नाम के इस कार्यक्रम में लोगों को मुफ्त खाना खिलाया जाएगा, इस महान काम में जनहित कार्य क्यों नहीं कह रहा हूं इसका आगे विवरण दूंगा, अभी से अलबलाइए मत।  इस महान काम में दिल्ली सरकार का सहयोग दे रहे हैं स्वामीनारायण अक्षरधाम मंदिर। &lt;br /&gt;भारत को भिखारियों का देश कहा जाता है ऐसा कुछ लोग कहते हैं औऱ यह कुछ लोग विदेशी ज्यादा होते हैं यह ऐसा क्यों कहते हैं क्योंकि यह ऐसा कह सकते हैं औऱ चूंकि यह लगातार ऐसा कह रहे हैं तो हमने मान भी लिया है अब जब हमने मान लिया है तो इस बात को साबित भी करना होगा तो हम लगातार लोगों को फोकट में खाना देंगे औऱ अलालों की संख्या में तेज़ी के साथ इज़ाफा होगा। औऱ हम झूठे नहीं कहलाएंगे वैसे भी आजकल स्लम टूरिज्म की काफी मांग है तो इसमें भिखारी टूरिज़्म भी बढ़ जाएगाा औऱ सरकार को टूरिज़्म से फायदा मिल जाएगा औऱ जो बाकी सहयोगी बचे हैं उन्हे मुफ्त का प्रचार मिल रहा है। &lt;br /&gt;भारत को संतो का देश भी कहा जाता है जो संत होते हैं वो कोई काम-वाम नहीं करते वो सिर्फ बातें करते हैं, उन्हें मोह-माया भौतिकता से कोई नाता नहीं होता है, वो जेब में पैसा लेकर नहीं घूमते, अब जब जेब में पैसा लेकर नहीं घूमते तो भरण-पोषण कैसे करेंगे, और जेब में पैसा आएगा कैसे जब कुछ काम नहीं करेंगे औऱ काम क्यों करे जबकि यह कहा गया है कि संत सिर्फ ईश्वर के आदेश पर चलते हैं। जब ईश्वर की मर्जी के बगैर कुछ चलता नहीं, उसकी मर्जी के बगैर पत्ता भी नहीं हिलता, वो ही चोर से कहता है चोरी कर वो ही पहरेदार से कहता है जागता रह, जब सब कुछ उसी को करना है तो फिर हम क्यों कुछ करें, हम निठल्ले रहेंगे। ये निठल्ले होने का आदेश हमें ईश्वर से मिला है तो दिल्ली सरकार की क्या मजाल की वो इस आदेश का पालन ना करे, फिर अक्षरधाम भी तो ईश्वर का ही धाम है तो वो तो इस आदेश का पालन करने के लिए करबद्ध है, तो कुल मिलाकर ये देश संतों का हे, संत फकीर होते हैं, फकीर कुछ काम नहीं करते, बगैर काम किये पैसा नहीं मिलता, बगैर पैसे के पेट नहीं पलता, बगैर पेट पले इंसान ज़िंदा नहीं रहता, तो भारत की पंरपरा को आगे बढ़ाते हुए हमें निठल्लावाद, कामचोरीवाद और फोकटवाद को एकसाथ बढ़ावा देते हुए लोगों को मुफ्त में भोजन कराना है और अपनी परपंरा को आगे बढ़ाना है। भारत माता की जय।&lt;br /&gt;माफ कीजिएगा जज्बात में आकर एक तकनीकी पक्ष रखना भूल गया। भूख मुक्त दिल्ली नामक इस विज्ञापन का एक तकनीकी पक्ष भी है जिसकी रखे बगैर बात अधूरी सी रह जाएगी। इस फोटू को गौर से देखिए, इस तस्वीर से आप को इसे छापने वाले, इसके लिए दान लेने वाले औऱ मुख्यमंत्री जी की भागीदारी प्रदर्शित करने वाले, कुल मिलाकर इस पूरी योजना में संपूर्ण रूप से सम्मिलित लोगों की भूख का अंदाजा लगाया जा सकता है। इस तस्वीर में जो लोग बैठ कर खाना खा रहे हैं उनमें से किसी को भी देख कर यह नहीं लगता की वो काम करके पेट नहीं भर सकता, इससे भी आगे बढ़कर एक बात औऱ है जो लोग खाना खा रहे हैं उनमें से पहले वाले की थाली ही खाली और चमचमाती सी रखी है। यानि हम सिर्फ बातें परोसेंगे। खा सको तो खालो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसी का पेट भरना बुरी बात नहीं है, बुरी बात है समस्याओं का ढांकना, केंद्र सरकार किसानों की समस्याओं को सुलझाएगी नहीं उन्हे ६० अरब रू का दान देकर उन्हे कामचोर बनाएगी। किसान मरते रहे तो मरे हमें क्या हमने तो अरबों रु का कफन का इंतज़ाम कर दिया है। लोग बेरोज़गार है तो सत्ता उन्हे काम नहीं दिलवाएगी, वो उन्हे फोकट में खाना खिलाएगी। जब रोटी जितनी भारी चीज़ उठाने मात्र से ही पेट भर रहा है तो मेहनत का सब्बल-फावड़ा उठाने की क्या ज़रूरत।&lt;br /&gt;हे सत्ता तुम धन्य हो. तुम्हे नमन हो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पंकज रामेन्दू&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2333254526940587404-2113438200582352826?l=mudda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mudda.blogspot.com/feeds/2113438200582352826/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2333254526940587404&amp;postID=2113438200582352826' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/2113438200582352826'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/2113438200582352826'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mudda.blogspot.com/2008/04/blog-post_17.html' title='भूख मुक्त या आलस युक्त दिल्ली'/><author><name>विकास शिशोदिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08157576148519764276</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='18' src='http://1.bp.blogspot.com/_yCbiUlApr1c/TMVfAgIbU7I/AAAAAAAAAVY/7kaK_w148Jg/S220/sing.png'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2333254526940587404.post-181843975460111473</id><published>2008-04-10T23:58:00.000-07:00</published><updated>2008-04-11T00:07:13.143-07:00</updated><title type='text'>मेरा भारत महान</title><content type='html'>रविन्द्र&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरा भारत महान,&lt;br /&gt;100 में से 99 बेइमान,&lt;br /&gt;अगर ये होता भारत का नारा,&lt;br /&gt;तो अच्छा होता,&lt;br /&gt;क्योंकि इसमें कुछ तो सच्चा होता।&lt;br /&gt;आज़ादी के हर नारे को,&lt;br /&gt;इन बेइमानो ने सूली दिया है टांग,&lt;br /&gt;क्योंकि बेइमानों का यही है असली काम।&lt;br /&gt;और फिर निकले हैं देश चलाने कि राह में,&lt;br /&gt;बेच के अपना दीन और ईमान।&lt;br /&gt;देते हैं हज़ारों सपनों की आस,&lt;br /&gt;फिर कर देते हैं उन्हे अपने बेइमानी के बिल से पास।&lt;br /&gt;फिर न जाने क्यों लगता है अभी भी है कुछ आस,&lt;br /&gt;उसके बाद भी होता नहीं है कुछ खास।&lt;br /&gt;न जाने कब वो दिन आएगा,&lt;br /&gt;जब बेइमानी का चोला इस दुनिया से उठ जाएगा।&lt;br /&gt;तब देखेंगे हम भारत का नया चेहरा,&lt;br /&gt;जिसमें बेइमानी का कभी न होगा बसेरा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2333254526940587404-181843975460111473?l=mudda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mudda.blogspot.com/feeds/181843975460111473/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2333254526940587404&amp;postID=181843975460111473' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/181843975460111473'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/181843975460111473'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mudda.blogspot.com/2008/04/blog-post_4028.html' title='मेरा भारत महान'/><author><name>विकास शिशोदिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08157576148519764276</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='18' src='http://1.bp.blogspot.com/_yCbiUlApr1c/TMVfAgIbU7I/AAAAAAAAAVY/7kaK_w148Jg/S220/sing.png'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2333254526940587404.post-1688079895319732652</id><published>2008-04-10T04:24:00.000-07:00</published><updated>2008-04-10T04:36:55.226-07:00</updated><title type='text'>मै देखना चाहती थी</title><content type='html'>रविन्द्र का ताल्लुक पत्रकारिता जगत से नया नया है, ये &lt;a href="http://editworksindia.com"&gt;एडिटवर्क्स स्कूल ऑफ मास कम्यूनिकेशन &lt;/a&gt;में बी.एस.सी. इलेक्ट्रानिक मीडिया में प्रथम वर्ष के छात्र हैं। इनकी उम्र मात्र सत्रह वर्ष है। ये अपनी पहली रचना के साथ मुद्दा पर आये हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;रविन्द्र&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://bp0.blogger.com/_yCbiUlApr1c/R_35rIjxqlI/AAAAAAAAAMY/MSwUNvL_GnE/s1600-h/images.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp0.blogger.com/_yCbiUlApr1c/R_35rIjxqlI/AAAAAAAAAMY/MSwUNvL_GnE/s320/images.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5187576865227909714" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;मै देखना चाहती थी, &lt;br /&gt;शिखर की उन ऊंचाईयों को,&lt;br /&gt;न जाने क्यों देख न पाई।&lt;br /&gt;एक लड़की होने के अहसास,&lt;br /&gt;के बंधन को कभी तोड़ न पाई।&lt;br /&gt;मै चाहती थी कुछ ऐसा कर दिखाना,&lt;br /&gt;जो मेरी छवि को बना देता और भी निराला।&lt;br /&gt;कुछ ऐसा जहाँ ने दिया फिर ताना,&lt;br /&gt;जिसने बना दिया समाज से बेगाना।&lt;br /&gt;मै चाहती थी आजाद भारत में रहकर कुछ करने की,&lt;br /&gt;मगर आजाद हो कर जीना मेरा समाज को रास ना आया।&lt;br /&gt;फिर मुझे दबंगों कि तरह जीना सिखाया,&lt;br /&gt;जिसके बाद मुझे सभ्य नारी का पद मिल पाया।&lt;br /&gt;न जाने कब ये समझेगा ज़माना,&lt;br /&gt;कि नारी ही होती है, हर इंसान को समाज में लाने का बहाना।&lt;br /&gt;न जाने कब लिखा जायेगा,&lt;br /&gt;नारी को अपने हक से जीने का अफसाना।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2333254526940587404-1688079895319732652?l=mudda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mudda.blogspot.com/feeds/1688079895319732652/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2333254526940587404&amp;postID=1688079895319732652' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/1688079895319732652'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/1688079895319732652'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mudda.blogspot.com/2008/04/blog-post_10.html' title='मै देखना चाहती थी'/><author><name>विकास शिशोदिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08157576148519764276</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='18' src='http://1.bp.blogspot.com/_yCbiUlApr1c/TMVfAgIbU7I/AAAAAAAAAVY/7kaK_w148Jg/S220/sing.png'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://bp0.blogger.com/_yCbiUlApr1c/R_35rIjxqlI/AAAAAAAAAMY/MSwUNvL_GnE/s72-c/images.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2333254526940587404.post-4201512281051514106</id><published>2008-04-07T08:39:00.000-07:00</published><updated>2008-04-07T08:41:25.120-07:00</updated><title type='text'>हमउ भी कोई कम नीच नाही</title><content type='html'>पंकज रामेन्दू&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मध्यप्रदेश के एक कवि हैं, माणिक वर्मा, उनकी कविता पढ़ने का  अंदाज़ एकदम जुदा है। जब वो कविता पढ़ते हैं तो ऐसा लगता है कि किसी को गाली बक रहे हैं, गाली भी ऐसी की आपने आज तक नही सुनी होगी, एकदम अनूठा प्रयोग करते हैं। उनकी एक कविता की एक पंक्ति है- उच्च कोिट के नीच लोगों।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आप यह सोच रहे होंगे कि मैं माणिक वर्मा का ज़िक्र क्यों कर रहा हूं, दरअसल रविवार के जनसत्ता के संपादकीय पृष्ठ पर दो लेख एक दूसरे के बगल में बाते करते हुए नज़र आए। एकतरफ भारत भारद्वाज जी गुड़िया भीतर गुड़िया हेडिंग के साथ यह कह रहे थे कि मैत्रयी पुष्पा ने जो अपनी आत्मकथा लिखी है वो एकदम सतही है, उन्होंने यह तक लिखा है कि आजकल जिन्हें लिखना नहीं आता है वो आत्मकथा लिखने लगे हैं। रसेल, गांधी से लेकर तसलीमा तक उन्होंने सभी आत्मकथाओं का ज़िक्र भी छेड़ दिया था। यह सब बताने के साथ वो राजकिशोर जी की छीछालेदर भी करने पर तुले थे, वो यह कहना चाह रहे थे कि राजकिशोर जी ने पैसे लेकर इस आत्मकथा की शान में कसीदे पढ़े हैं।&lt;br /&gt;दूसरी तरफ - मो सम कौन कुटिल खल कामी के साथ राजकिशोर जी यह कहते नज़र आये कि उन्होंने मैत्रेयी पुष्पा से उनकी किताब की आलोचना लिखने के लिए दस हज़ार रु मांगे थे, वो उन्हे आज तक नहीं मिले, ऐसी ही कई प्रकार की व्यंग्योक्तियों के साथ राजकिशोर जी की किलपन नज़र आई।&lt;br /&gt;इस बात की शुरूआत १६ मार्च के जनसत्ता में छपी मैत्रेयी पुष्पा की आत्मकथा गुड़ियी भीतर गुड़िया की आलोचना से हुई, जिसमें राजकिशोर जी ने इस पुस्तक की काफी तारीफ की हुई है।&lt;br /&gt;भारत भारद्वाज जी इसे सतही बता रहे हैं और वो यह भी कह रहे हैं कि राजकिशोर जी इसकी मार्केटिंग कर रहे हैं।&lt;br /&gt;अब यहां से समस्या खड़ी होती है। जब आपके सामने दो वरिष्ठ एवं गरिष्ठ साहित्यकारों की विपरीत प्रतिक्रिया किसी समान विषय पर मिलती है तो वो अकस्मात ही आप में एक जिज्ञासा पैदा कर देती है। आप सोचने लगते हैं कि चलो पढ़ कर देखा तो जाए आखिर है क्या मामला । &lt;br /&gt;तो इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि ऐसा भी हो सकता है कि मैत्रयी पुष्पा से जो पैसे प्राप्त हुए वो आपस में बांट लिए गए हों। भई हंगामा खड़ा करना भी तो एक मकसद हो सकता  है। अब मेरे जैसे लोग जिनमें साहित्य पढ़ने की खुजली है और जो यह विश्वास करके बैठा है कि यह वरिष्ठ साहित्यकार थोड़े ईमानदार टाइप के भी हैं मुझमें और खुजाल पैदा कर देगा और नतीजा में वो किताब खरीद डालूंगा। मेरे जैसे कई ग़रीब लेखक है (वैसे हिंदी के लेखक का ग़रीब होना ही इस बात का सूचक है कि वो लेखक है या यूं कह लो की ग़रीब ही लेखक है)वो इस किताब को खरीद डालेंगे। अब हम सब एक दूसरे से मिलते तो हैं नहीं तो किताब के अच्छे या बुरे होने की बात भी नहीं बता सकेंगे। नतीजा, उद्देश्य की पूर्ति ।&lt;br /&gt;अगर दोनों वरिष्ठ मतैक्य नहीं भी हैं तो भी मैत्रयी पुष्पा के लिए तो यह फायदे का सौदा रहा। वो कुछ कहा जाता है ना कि दो .. कि लड़ाई में .. तीसरे का फायदा। वैसे एक बात काबिल-ए-तारीफ है, इनका इस तरह से लड़ना इस बात की पुष्टि कर देता है कि हिंदी साहित्य में जो केकड़ा प्रथा का बार बार ज़िक्र आता है वो कितना सही है। तो इस बात की पुष्टि कराने के लिए मैं इन दोनों का धन्यवाद भी देता हूं। यह बात हमें बताती है कई कीचड़ ऐसी हैं जिनमें कमल खिलते नहीं है, हां अगर खिले हुए कमलों को उनमें डाल दो तो वे मुरझा ज़रूर जाएंगे।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2333254526940587404-4201512281051514106?l=mudda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mudda.blogspot.com/feeds/4201512281051514106/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2333254526940587404&amp;postID=4201512281051514106' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/4201512281051514106'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/4201512281051514106'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mudda.blogspot.com/2008/04/blog-post.html' title='&lt;strong&gt;हमउ भी कोई कम नीच नाही&lt;/strong&gt;'/><author><name>विकास शिशोदिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08157576148519764276</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='18' src='http://1.bp.blogspot.com/_yCbiUlApr1c/TMVfAgIbU7I/AAAAAAAAAVY/7kaK_w148Jg/S220/sing.png'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2333254526940587404.post-7507482231928071336</id><published>2008-03-30T09:15:00.000-07:00</published><updated>2008-03-30T09:20:21.612-07:00</updated><title type='text'>गुरुजी, आपके शिष्य जोड़-घटाना नहीं जानते</title><content type='html'>&lt;a href="http://bp0.blogger.com/_yCbiUlApr1c/R--9u1XcI4I/AAAAAAAAAMQ/zO_Tvmunwq8/s1600-h/3india_wave.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp0.blogger.com/_yCbiUlApr1c/R--9u1XcI4I/AAAAAAAAAMQ/zO_Tvmunwq8/s320/3india_wave.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5183570308423754626" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संजीव मिश्र]&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; यह खबर शिक्षकों के लिए एक आइना है। बच्चों के विद्या-बुद्धि के विकास में गुरुजी की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। बच्चे के प्रतिभा विकास का श्रेय उनको जाता है, तो उनके अल्प विकास की जिम्मेदारी से भी वे नहीं बच सकते। अगर पांचवीं कक्षा के बच्चे जोड़-घटाना नहीं जानते, हिंदी नहीं पढ़ पाते; तो यह पूरी शिक्षण प्रक्रिया और उससे जुड़ी सरकारी कवायद पर एक सवाल है। उत्तर प्रदेश में एक हद तक ऐसी हालत दिख रही है। प्रदेश में अगर सर्व शिक्षा अभियान अपेक्षा पर खरा नहीं उतर रहा है, तो जिम्मा मास्टर साहब का भी है। यहां हर वर्ष इस अभियान पर करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं, इसके बावजूद वह प्रभावी नहीं हो सका है। अभियान के मूल्यांकन के लिए योजना आयोग की पहल पर संस्था 'प्रथम' द्वारा देश भर में किए गए सर्वेक्षण में चौंकाने वाले तथ्य मिले हैं। 'ऐनुअल स्टेटस आफ एजूकेशन रिपोर्ट' [असर-2007] के मुताबिक प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में उत्तर प्रदेश खासा पिछड़ा है। रिपोर्ट योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह आहलूवालिया को सौंप दी गई है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अध्ययन के मुताबिक राष्ट्रीय स्तर पर जहां कक्षा तीन के 49 फीसदी बच्चे शुरुआती स्तर की हिंदी पढ़ लेते हैं, वहीं उत्तर प्रदेश में यह संख्या महज 40 फीसदी है। इसी तरह राष्ट्रीय स्तर पर कक्षा पांच के 59 फीसदी बच्चे कक्षा दो की हिंदी पढ़ सकते हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश में इसी कक्षा के सिर्फ 48 फीसदी बच्चे कक्षा दो के स्तर की हिंदी पढ़ सकते हैं। जोड़-घटाने के मामले में भी उत्तर प्रदेश फिसड्डी है। राष्ट्रीय स्तर पर कक्षा तीन से पांच के 42 फीसदी बच्चे जोड़-घटाना एवं गुणा-भाग जानते हैं, पर उप्र में कक्षा तीन से पांच के महज 34 फीसदी बच्चे प्रारंभिक गणित समझते हैं। कक्षा पांच के महज 42.8 फीसदी बच्चे जोड़-घटाना ठीक से कर पाते हैं। मतलब यह कि आधे से अधिक [57.2 प्रतिशत] बच्चे तो बिना जोड़-घटाना सीखे ही कक्षा पांच तक पहुंच जाते हैं। आंगनबाड़ी केंद्रों में भी छात्र-छात्राएं पर्याप्त संख्या में नहीं पहुंच पा रहे हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिलावार छात्र-छात्राओं की पढ़ाई के स्तर व उनके स्कूल पहुंचने में अंतर है। तमाम कोशिश के बावजूद बदायूं के 12.5 फीसदी व बाराबंकी के 10.3 फीसदी बच्चे स्कूलों से दूर हैं। सबसे बुरा हाल कानपुर देहात का है, जहां कक्षा तीन से पांच में पढ़ने वाले 72.3 फीसदी बच्चे हिंदी तक नहीं पढ़ पाते। रामपुर दूसरे व चित्रकूट तीसरे स्थान पर है, जहां तीसरी से पांचवीं कक्षा के क्रमश: 71.1 व 69.9 फीसदी बच्चे हिंदी नहीं पढ़ पाते। श्रावस्ती 80.3 फीसदी बच्चों के हिंदी पढ़ने की क्षमता के साथ अव्वल है। हिंदी पढ़ने के मामले में 78.8 फीसदी बच्चों के साथ मेरठ व 75.2 फीसदी बच्चों के साथ ज्योतिबाफुले नगर तीसरे स्थान पर है। कानपुर देहात के बच्चे गणित में भी फिसड्डी हैं। वहां कक्षा तीन से पांच के 77.4 फीसदी बच्चे सामान्य जोड़-घटाने के सवाल भी नहीं हल कर पाते। इस दृष्टि से 77.1 प्रतिशत बच्चों के साथ चित्रकूट दूसरे व 75.3 प्रतिशत बच्चों के साथ प्रतापगढ़ तीसरे स्थान पर है। गणित में श्रावस्ती अव्वल रहा, जहां 75.1 फीसदी बच्चे जोड़-घटाना ही नहीं, गुणा-भाग भी कर लेते हैं। गणित में 65.9 फीसदी बच्चों के साथ औरैया दूसरे व 65.3 फीसदी बच्चों के साथ ज्योतिबाफुले नगर तीसरे स्थान पर है। &lt;br /&gt;(साभार &lt;a href="http://jagran.com"&gt;याहू&lt;/a&gt;)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2333254526940587404-7507482231928071336?l=mudda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mudda.blogspot.com/feeds/7507482231928071336/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2333254526940587404&amp;postID=7507482231928071336' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/7507482231928071336'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/7507482231928071336'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mudda.blogspot.com/2008/03/blog-post_30.html' title='गुरुजी, आपके शिष्य जोड़-घटाना नहीं जानते'/><author><name>विकास शिशोदिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08157576148519764276</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='18' src='http://1.bp.blogspot.com/_yCbiUlApr1c/TMVfAgIbU7I/AAAAAAAAAVY/7kaK_w148Jg/S220/sing.png'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://bp0.blogger.com/_yCbiUlApr1c/R--9u1XcI4I/AAAAAAAAAMQ/zO_Tvmunwq8/s72-c/3india_wave.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2333254526940587404.post-7656040708844328230</id><published>2008-03-23T03:34:00.000-07:00</published><updated>2008-03-23T03:37:42.447-07:00</updated><title type='text'>सबसे खर्चीले पीएम थे नेहरू</title><content type='html'>&lt;a href="http://bp2.blogger.com/_yCbiUlApr1c/R-Yy7lXcI3I/AAAAAAAAAMI/-RG0946Pyrc/s1600-h/images.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp2.blogger.com/_yCbiUlApr1c/R-Yy7lXcI3I/AAAAAAAAAMI/-RG0946Pyrc/s320/images.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5180884420560429938" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;क्या देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू दुनिया के सबसे अधिक खर्चीले प्रधानमंत्री थे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस सवाल पर पचास के दशक में देश में करीब पांच साल तक संसद, मीडिया और सार्वजनिक जीवन में यह बहस चली थी। पंडित नेहरू के सबसे खर्चीले प्रधानमंत्री होने का आरोप प्रख्यात समाजवादी चिंतक डा. राम मनोहर लोहिया ने लगाया था। उनका कहना था कि नेहरू ब्रिटेन के प्रधानमंत्री और अमेरिकी राष्ट्रपति से भी ज्यादा खर्चीले हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डा. लोहिया ने सरकारी आंकड़ों से यह सिद्ध किया था कि पंडित नेहरू पर प्रतिदिन 25 हजार रुपये खर्च होते हैं और वह दुनिया के सबसे अधिक खर्चीले प्रधानमंत्री हैं। इतना खर्च तो ब्रिटेन के प्रधानमंत्री मैकमिलन और अमेरिकी राष्ट्रपति कैनेडी पर भी नहीं होता। लोहिया ने इस पूरी बहस पर प्रतिदिन पच्चीस हजार रुपये नामक एक पुस्तक भी लिखी थी जो तब बिहार के दरभंगा से कौटिल्य प्रकाशन से हुई थी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डा. लोहिया की 98वीं जयंती के मौके पर अनामिका प्रकाशन द्वारा नौ खंडों में प्रकाशित लोहिया रचनावली में यह अनुपलब्ध पुस्तक दोबारा प्रकाशित हुई थी। रचनावली का संपादन प्रख्यात समाजवादी पत्रकार, लेखक एवं विचारक मस्तराम कपूर ने किया है। 82 वर्षीय कपूर ने यूनीवार्ता को बताया कि लोहिया के निधन के 40 वर्ष बाद बड़ी मुश्किल से लोहिया की रचनाएं एकत्र हो पाई हैं, क्योंकि उनकी बहुत-सी सामग्री अनुपलब्ध है ओर लोगों को इसकी जानकारी भी नहीं है। पंडित नेहरू को सबसे अधिक खर्चीला प्रधानमंत्री बताने वाली पुस्तक प्रतिदिन पच्चीस हजार रुपये के बारे में भी आज कइयों को जानकारी नहीं है। यह बहस तब संसद में भी चली थी और किशन पटनायक जैसे समाजवादी नेता का पंडित नेहरू से इस बारे में लंबा पत्राचार भी हुआ था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डा. लोहिया का कहना था कि उन्होंने पंडित नेहरू के सरकारी खर्च की बात व्यक्तिगत द्वेष के कारण नहीं कहीं थी। उन्होंने बजट के आंकड़ों को पेश कर अपने आरोप की पुष्टि की थी। पंडित नेहरू इससे तिलमिला गए थे, उन्होंने बार-बार इस आरोप का खंडन किया और अंत में किशन पटनायक से इस संबंध में पत्राचार ही बंद कर दिया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रचनावली के अनुसार ब्रिटेन के प्रधानमंत्री पर 500 रुपये प्रतिदिन और अमेरिका के राष्ट्रपति पर करीब पांच हजार रुपये प्रतिदिन खर्च होते थे। किशन पटनायक ने डा. लोहिया के इस आरोप की जांच कराने की भी संसद में मांग की थी, लेकिन सरकार ने इस मांग को ठुकरा दिया था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डा. कपूर का कहना है कि अब तो सरकारी अधिकारियों और मंत्रियों पर अनाप-शनाप सरकारी खर्च हो रहे हैं पर यह अब संसद में बहस का विषय नहीं है। डा. लोहिया सार्वजनिक जीवन में सादगी और नैतिकता के पक्षधर थे। जब वह सांसद बने तो उनके पास मात्र दो जोड़ी कपड़े थे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डा. लोहिया पहले नेहरू से प्रभावित थे, पर धीरे-धीरे उनकी नीतियों से उनका मोहभंग हो गया और वे नेहरू के कटु आलोचक होते चले गए। वह हर तरह के अन्याय, दमन, गुलामी, शोषण और असमानता के विरोधी थे। वह समतामूलक समाज का सपना देखते थे। इसके लिए उन्होंने काफी संघर्ष भी किया। अभी सात आठ खंडों में उनकी और सामग्री आएगी। इस रचनावली से भविष्य में डा. लोहिया का समग्र मूल्यांकन हो सकेगा। दो साल बाद जब उनकी जन्मशती पड़ेगी तो नई पीढ़ी नए सिरे से लोहिया को जानेगी और उनकी समग्र रचनाओं के आधार पर इतिहास में उनको सही जगह मिलेगी। &lt;br /&gt;(साभार&lt;a href="http://in.jagran.yahoo.com/news/national/politics/5_2_4286734/"&gt; याहू&lt;/a&gt;)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2333254526940587404-7656040708844328230?l=mudda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mudda.blogspot.com/feeds/7656040708844328230/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2333254526940587404&amp;postID=7656040708844328230' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/7656040708844328230'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/7656040708844328230'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mudda.blogspot.com/2008/03/blog-post_23.html' title='&lt;strong&gt;सबसे खर्चीले पीएम थे नेहरू&lt;/strong&gt;'/><author><name>विकास शिशोदिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08157576148519764276</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='18' src='http://1.bp.blogspot.com/_yCbiUlApr1c/TMVfAgIbU7I/AAAAAAAAAVY/7kaK_w148Jg/S220/sing.png'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://bp2.blogger.com/_yCbiUlApr1c/R-Yy7lXcI3I/AAAAAAAAAMI/-RG0946Pyrc/s72-c/images.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2333254526940587404.post-7489149506123218016</id><published>2008-03-20T20:05:00.001-07:00</published><updated>2008-03-20T20:06:15.566-07:00</updated><title type='text'>होली मुबारक हो...........</title><content type='html'>&lt;a href="http://bp2.blogger.com/_yCbiUlApr1c/R-MmHVXcI2I/AAAAAAAAAMA/WUVZGXyTkww/s1600-h/happy_holi_4thmarch2007.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp2.blogger.com/_yCbiUlApr1c/R-MmHVXcI2I/AAAAAAAAAMA/WUVZGXyTkww/s320/happy_holi_4thmarch2007.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5180025903842599778" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2333254526940587404-7489149506123218016?l=mudda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mudda.blogspot.com/feeds/7489149506123218016/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2333254526940587404&amp;postID=7489149506123218016' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/7489149506123218016'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/7489149506123218016'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mudda.blogspot.com/2008/03/blog-post_20.html' title='&lt;strong&gt;होली मुबारक हो...........&lt;/strong&gt;'/><author><name>विकास शिशोदिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08157576148519764276</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='18' src='http://1.bp.blogspot.com/_yCbiUlApr1c/TMVfAgIbU7I/AAAAAAAAAVY/7kaK_w148Jg/S220/sing.png'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://bp2.blogger.com/_yCbiUlApr1c/R-MmHVXcI2I/AAAAAAAAAMA/WUVZGXyTkww/s72-c/happy_holi_4thmarch2007.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2333254526940587404.post-4065942145975073698</id><published>2008-03-19T20:33:00.000-07:00</published><updated>2008-03-19T20:35:42.661-07:00</updated><title type='text'>होली </title><content type='html'>जिस दिन जिसकी लालसा ने&lt;br /&gt;मनवांछित तृप्ति पा ली&lt;br /&gt;वह दिन उसके लिए &lt;br /&gt;बस समझो हो गया होली .&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भूख से भैराते भिखमंगे ने&lt;br /&gt;जिस दिन भरपेट रोटी खा ली&lt;br /&gt;वह दिन उसके लिए &lt;br /&gt;बस समझो हो गया होली .&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विरह वेदना से व्याकुल विरही ने&lt;br /&gt;जिस दिन प्रिय की झलक पा ली&lt;br /&gt;वह दिन उसके लिए&lt;br /&gt;बस समझो हो गया होली .&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वर्षों से कलम घिसते कवि ने &lt;br /&gt;जिस दिन संपादक की कृपा हथिया ली&lt;br /&gt;वह दिन उसके लिए&lt;br /&gt;बस समझो हो गया होली&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2333254526940587404-4065942145975073698?l=mudda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mudda.blogspot.com/feeds/4065942145975073698/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2333254526940587404&amp;postID=4065942145975073698' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/4065942145975073698'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/4065942145975073698'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mudda.blogspot.com/2008/03/blog-post_19.html' title='&lt;strong&gt;होली &lt;/strong&gt;'/><author><name>विकास शिशोदिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08157576148519764276</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='18' src='http://1.bp.blogspot.com/_yCbiUlApr1c/TMVfAgIbU7I/AAAAAAAAAVY/7kaK_w148Jg/S220/sing.png'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2333254526940587404.post-8580044659509512911</id><published>2008-03-15T20:09:00.000-07:00</published><updated>2008-03-15T20:12:58.188-07:00</updated><title type='text'>ऐसे तो उच्च शिक्षा में मिल चुकी मंजिल </title><content type='html'>राजकेश्वर सिंह&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम आने वाले वर्षो में उच्च शिक्षा की तस्वीर बदल देने के जो भी सब्जबाग दिखा रहे हों, लेकिन जमीनी तौर पर चीजें उतनी ठोस दिखती नहीं हैं। दुनिया के दूसरे देशों के मुकाबले हमारे पास तो पीएचडीधारकों तक की बहुत बड़ी कमी है। वैज्ञानिक शोध के मामले में हम कहीं ठहरते ही नहीं। बावजूद इसके शोध की जरूरत के हिसाब से सरकार धन नहीं दे पा रही। संसद की एक समिति भी हैरान है कि आखिर सुधारों पर अमल होगा तो कैसे? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विश्वविद्यालय अनुदान आयोग से संबंधित मानव संसाधन विकास मंत्रालय की प्राक्कलन समिति की बीते दिनों संसद में पेश रिपोर्ट काबिलेगौर है। जान सकते हैं कि आजादी के 60 साल बाद भी सालभर में हमारे यहां सिर्फ पांच हजार लोग पीएचडी करके तैयार होते हैं। जबकि भारत से बाद में आजाद हुए पड़ोसी देश चीन में सालाना 35 हजार और अमेरिका में हर साल 25 हजार लोग पीएचडी करते हैं। इसी तरह 2005 में भारत के पास कुल 648 पेटेंट थे, जबकि चीन के पास 2452, अमेरिका के पास 45,111 और जापान के पास 25,145 पेटेंट थे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बात इतनी ही नहीं है। अकेले अमेरिका पूरे विश्व के 32 प्रतिशत शोधपत्र प्रकाशित करता है। इस मामले में भारत का हिस्सा सिर्फ 2.5 प्रतिशत है। शोध को बढ़ावा देने के उपाय सुझाने के लिए सरकार की ओर से गठित प्रो. एमएम शर्मा समिति ने चालू वित्तीय वर्ष में 600 करोड़ रुपये के प्रावधान की सिफारिश की थी लेकिन सरकार ने दिए हैं सिर्फ 205 करोड़। यह स्थिति तब है, जब यूजीसी ने प्रो. शर्मा की सिफारिशों को स्वीकार कर लिया है। समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि वह यह समझ पाने में नाकाम है कि बुनियादी ढांचे और मानव संसाधनों के अभाव में यूजीसी वैज्ञानिक अनुसंधानों में कैसे सुधार ला पाएगा? समिति ने यूजीसी से वित्तपोषित विश्वविद्यालयों में शोध की बहुत कम संख्या और उसकी गुणवत्ता को लेकर भी गहरा दुख जताया है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्थिति की गंभीरता को देखते हुए ही समिति ने वैज्ञानिक अनुसंधानों में सुधार के लिए सरकार से अगले वित्तीय वर्ष में हर स्थिति में 600 करोड़ रुपये का प्रावधान करने की ठोस सिफारिश की है। यह भी कहा है कि जरूरी हो तो लागत वृद्धि के मद्देनजर आवंटन को और भी बढ़ाया जाए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यूजीसी बोर्ड में अध्यक्ष व उपाध्यक्ष के अलावा दस सदस्य होते हैं। इनमें सचिव (शिक्षा) व सचिव (व्यय) भी शामिल हैं। समिति तब दंग रह गई, जब उसे पता चला कि सचिव (व्यय) ने 2005 से 2007 के बीच आयोग की एक भी बैठक में शिरकत ही नहीं की। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(साभार &lt;a href="http://in.jagran.yahoo.com/news/national/general/5_1_4271433/"&gt;याहू&lt;/a&gt;)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2333254526940587404-8580044659509512911?l=mudda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mudda.blogspot.com/feeds/8580044659509512911/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2333254526940587404&amp;postID=8580044659509512911' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/8580044659509512911'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/8580044659509512911'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mudda.blogspot.com/2008/03/blog-post_15.html' title='&lt;strong&gt;ऐसे तो उच्च शिक्षा में मिल चुकी मंजिल &lt;/strong&gt;'/><author><name>विकास शिशोदिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08157576148519764276</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='18' src='http://1.bp.blogspot.com/_yCbiUlApr1c/TMVfAgIbU7I/AAAAAAAAAVY/7kaK_w148Jg/S220/sing.png'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2333254526940587404.post-6891681487919735342</id><published>2008-03-12T02:41:00.000-07:00</published><updated>2008-03-12T02:47:31.051-07:00</updated><title type='text'>कब्ज़</title><content type='html'>कभी आपने सुना है ,&lt;br /&gt;कब्ज़ के बारे में,&lt;br /&gt;कुछ लोग इसे बीमारी कहते हैं,&lt;br /&gt;यह भी कहा जाता है कि यह बीमारी &lt;br /&gt;अमीरों की बीमारी है,&lt;br /&gt;जी हां अमीरों की भीमारी&lt;br /&gt;बीमारी भी अमीर और ग़रीब दोनों होती हैं,&lt;br /&gt;यह भी भेद करती हैं,&lt;br /&gt;ग़रीबों को कभी कब्ज़ नहीं होता,&lt;br /&gt;गरीबों को दस्त लगते हैं।&lt;br /&gt;कब्ज़ में कुछ खा नहीं सकते हैं,&lt;br /&gt;पेट हमेशा भरा सा लगता है,&lt;br /&gt;सोचिए अगर ग़रीब को कब्ज़ हो जाए&lt;br /&gt;तो क्या मज़ा आए,&lt;br /&gt;उसे हमेशा पेट भरा लगेगा,&lt;br /&gt;कुछ खाने का दिल नहीं करेगा,&lt;br /&gt;इससे यह फायदा होगा&lt;br /&gt;कि वो आसानी से दो तीन दिन &lt;br /&gt;भूखा रह सकता है,&lt;br /&gt;उसे उपवास नहीं करना पड़ेगा,&lt;br /&gt;क्योंकि पेट तो भरा हुआ रहेगा,&lt;br /&gt;मगर अफसोस&lt;br /&gt;ग़रीबों को कब्ज़ नहीं होता&lt;br /&gt;ग़रीबों को तो दस्त लगते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पंकज रामेन्दू मानव&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2333254526940587404-6891681487919735342?l=mudda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mudda.blogspot.com/feeds/6891681487919735342/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2333254526940587404&amp;postID=6891681487919735342' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/6891681487919735342'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/6891681487919735342'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mudda.blogspot.com/2008/03/blog-post_12.html' title='कब्ज़'/><author><name>विकास शिशोदिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08157576148519764276</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='18' src='http://1.bp.blogspot.com/_yCbiUlApr1c/TMVfAgIbU7I/AAAAAAAAAVY/7kaK_w148Jg/S220/sing.png'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2333254526940587404.post-3891449977658207150</id><published>2008-03-07T22:56:00.000-08:00</published><updated>2008-03-07T23:00:02.213-08:00</updated><title type='text'>हे नारी !</title><content type='html'>&lt;a href="http://bp3.blogger.com/_yCbiUlApr1c/R9I5ZJpDNjI/AAAAAAAAALk/RhAX42-AkK4/s1600-h/images.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp3.blogger.com/_yCbiUlApr1c/R9I5ZJpDNjI/AAAAAAAAALk/RhAX42-AkK4/s320/images.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5175262026049730098" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रेम हो तुम, स्नेह हो&lt;br /&gt;वात्सल्य हो, दुलार हो&lt;br /&gt;मीठी सी झिड़की हो, प्यार हो,&lt;br /&gt;भावनाओं में लिपटी फटकार हो&lt;br /&gt;हे नारी ! तुम अपरंपार हो ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रसव वेदना सहती ममता हो&lt;br /&gt;विरह वेदना सहती ब्याहता हो,&lt;br /&gt;सरस्वती, लक्ष्मी भी तुम हो&lt;br /&gt;तुम ही काली का अवतार हो,&lt;br /&gt;हे नारी ! तुम अपरंपार हो ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कैकयी हो, कौशल्या हो,&lt;br /&gt;मंथरा भी तुम, तुम ही अहिल्या हो.&lt;br /&gt;वृक्षों से लिपटी बेल हो,&lt;br /&gt;कहीं सख़्त, सघन देवदार हो&lt;br /&gt;हे नारी ! तुम अपरंपार हो ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सति तुम ही, सावित्री तुम हो&lt;br /&gt;जीवन लिखने वाली कवियत्री हो,&lt;br /&gt;दोहा, छंद , अलंकार तुम ही&lt;br /&gt;तुम ही मंगल सुविचार हो&lt;br /&gt;हे नारी ! तुम अपरंपार हो ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नदी हो तुम कलकल बहती,&lt;br /&gt;धरती हो तुम हरियाली देती,&lt;br /&gt;जल भी तुम हो, हल भी तुम हो,&lt;br /&gt;तुम जीवन का आधार हो&lt;br /&gt;हे नारी ! तुम अपरंपार हो ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जीवन का पर्याय हो तुम&lt;br /&gt;आंगन, कुटी, छबाय हो तुम&lt;br /&gt;यत्र तुम ही, तत्र तुम ही,&lt;br /&gt;तुम ही सर्वत्र हो&lt;br /&gt;ईश्वर की पवित्र पुकार हो&lt;br /&gt;हे नारी ! तुम अपरंपार हो ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गेंहू तुम हो, धानी तुम ही&lt;br /&gt;तुम मीठा सा पानी हो,&lt;br /&gt;जब भी सुनते अच्छी लगती&lt;br /&gt;ऐसी एक कहानी हो,&lt;br /&gt;कविता में शब्दों सी गिरती&lt;br /&gt;एक अविरल धार हो&lt;br /&gt;हे नारी ! तुम अपरंपार हो ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जन्म दिया तुम ही ने सबको&lt;br /&gt;तुम ही ने तो पाला है&lt;br /&gt;पहला सबक लेते हैं जिससे&lt;br /&gt;वो तेरी ही पाठशाला है&lt;br /&gt;एक पंक्ति में, &lt;br /&gt;तुम जीवन का आधार हो&lt;br /&gt;हे नारी ! तुम अपरंपार हो ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पंकज रामेन्दू मानव&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2333254526940587404-3891449977658207150?l=mudda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mudda.blogspot.com/feeds/3891449977658207150/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2333254526940587404&amp;postID=3891449977658207150' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/3891449977658207150'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/3891449977658207150'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mudda.blogspot.com/2008/03/blog-post_7003.html' title='हे नारी !'/><author><name>विकास शिशोदिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08157576148519764276</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='18' src='http://1.bp.blogspot.com/_yCbiUlApr1c/TMVfAgIbU7I/AAAAAAAAAVY/7kaK_w148Jg/S220/sing.png'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://bp3.blogger.com/_yCbiUlApr1c/R9I5ZJpDNjI/AAAAAAAAALk/RhAX42-AkK4/s72-c/images.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2333254526940587404.post-8484855595457070215</id><published>2008-03-07T08:43:00.000-08:00</published><updated>2008-03-07T08:46:57.261-08:00</updated><title type='text'>"अपना क्या जाता है "। </title><content type='html'>आजकल मैं रिसर्च कर रहा हूं। रिसर्च का मतलब तो आप सभी लोग जानते होंगे। जब किसी विषय पर दोबारा खोज की जाती है तो वह रिसर्च कहलाती है। जैसे आप रास्ते से गु़ज़र रहे हों, कोई सुन्दर कन्या आप को दिख जाती है, आप को दोबारा से उसकी सुंदरता को आंकना ही रिसर्च हो। लेकिन मेरा उद्देश्य आप को शोध के विषय में जानकारी देना नहीं है, वो तो बात निकली तो दूर तलक जा पहुंची। तो मै क्या कह रहा था, हां रिसर्च, मैं आजकल एक रिसर्च कर रहा हूं औऱ इस शोध से मुझे जो बोध हुआ है उससे मैं काफी हैरत में हूं औऱ मेरी दिली तमन्ना थी कि आप भी मेरी हैरानी में शामिल हों। दरअसल मैं काफी दिनों से सोच रहा था कि इस दुनिया ने जितनी तरक्की की क्या उतनी काफी थी या उससे भी बेहतर कुछ हो सकता था औऱ अगर हो सकता था तो क्यों नही हुआ।&lt;br /&gt;फिर भारत को लेकर भी एक सवाल उभरा, अब भाई मैं भारत का रहने वाला हूं तो मेरा अपने देश के लिए भी तो कोई दायित्व बनता है कि नहीं, जिस देश में जन्म लिया उसके लिए कुछ कर तो पाते नहीं हैं तो कम से कम सोच तो सकते हैं, वैसे भी भारत में ज्यादातर लोगों का अधिकतर समय दो ही बातों में व्यतीत होता है- सोच औऱ शौच। खैर हम विषय से ना भटके, हां तो भारत को लेकर प्रश्न यह उभरा कि, क्या कारण हैं कि हम विकास को लेकर इतने शील बने हूए हैं ? &lt;br /&gt;अब दिमाग में सवाल रूपी खुजली उठी है तो खुजाने के लिए जवाब रूपी नाखून की आवश्यकता भी होगी, यही सोचकर मैं शोध करने पर मजबूर हुआ और इस नतीजे पर पहुंचा कि दुनिया की तमाम बड़ी घटनाओं औऱ विकास में बाधक महज़ एक वाक्य की मानसिकता है। जिसके कारण समस्याएं खड़ी हुई हैं। यह एक वाक्य कई प्रकार की परेशानियों की मूल जड़ है। यह वाक्य है "अपना क्या जाता है "। &lt;br /&gt;आप खुद ही देखिए, बिजली का एक तार गया हुआ है औऱ नज़र दौड़ाओ तो उस तार में उलझे हुए कई तार दिख जाएंगे। अरे व्यवस्था है भई, मुफ्त बिजली घर पहुंचाने के लिए। बैठे ड्राइंगरूम में हैं लेकिन बाथरूम का बल्ब औऱ बेडरूम का पंखा भी अपनी कर्तव्यपरायणता निभाता रहता है औऱ क्यों न निभाए मालिक उसके लिए पैसे देते हैं, (कब देते हैं, कहां देते हैं. किसे देते हैं, औऱ कितना देते हैं, यह मेरा विषय नहीं है)। फिर देश पर बिजली संकट गहराए तो गहराए, अपना क्या जाता है।&lt;br /&gt;पानी नल में आ रहा है नाली में जा रहा है, हम क्यों उसे नाली में जाने से रोकें ? हमारे यहां तो कहा भी गया है,रमता जोगी, बहता पानी इनके मन की किसने जाती। अब भाई पानी की नाली में जाने की उमंग है तो जाए, अपना क्या जाता है।&lt;br /&gt;सड़क पर जा रहे हैं रास्ते में प्रेशर बन गया तो क्या करें, नहीं कर सकते बर्दाश्त फिर खुले वातावरण का मजा ही कुछ औऱ है। पान खा रहे हैं, अब क्या मुंह में थूक भरे घुमते रहें आखिर मुंह की भी कुछ महिमा है तो भैया मुंह की महिमा को बनाए रखने के लिए दीवारों, सड़कों को रंगना भी ज़रूरी है बाद में सफाई विभाग जाने उनका काम जाने आखिर हमारे पैसों पर पल रहे हैं वो सोचें इस विषय में अपना क्या जाता है।&lt;br /&gt;दोस्त का फोन आया लगे है बतियाने,एक घंटे या इससे ऊपर बात हुई,जिसमें बीच बीच में कम से कम 30 बार, और सुनाओ, औऱ बताओ जैसे वाक्यांश का उच्चारण करके तल्लीनता का प्रदर्शन भी हुआ। अरे यार ऐसे ही तो बात आगे बढ़ेगी, बिल भी तो मित्र का ही बढ़ेगा अपना क्या जाता है।&lt;br /&gt;कई बार तो मैं सोचता हूं कि हिटलर ने हज़ारों लोगों को गैस चैंबर में ठूंस दिया था, उसके पीछे भी हिटलर की यही मानसिकता रही होगी, मरे तो मरे, अपना क्या जाता है।&lt;br /&gt;मुगलों ने भारत पर आक्रमण कर दिया तो जयचंद ने सोचा होगा मैं क्यों किसी का साथ दूं जिसको लड़ना हो लड़े मरे अपना क्या जाता है।&lt;br /&gt;अंग्रेज दो सौ सालों तक राज कर गए, हमारे राजा धीरे धीरे गुलाम बनते गए, सबने यही सोचा होगा कि बगल वाला जान वो बनेगा गुलाम अपना क्या जाता है।&lt;br /&gt;देश आज़ाद हो गया, टुकड़ों में बंट भी गया हम इंसान से हिंदू-मुस्लिम बन बनकर मरे जा रहे हैं। एक कौम और है, वो है सियासतदारों की कौम, वो सोचती है कि और लड़े अच्छा है मरे, अपना क्या जाता है।&lt;br /&gt;अमेरिका ने अफगानिस्तान पर दादागिरी की और फिर ईराक पहुंच गया, सबको निपटा रहा है, सब तमाशा देख रहे हैं और सभी सोच रहे हैं कि भैया अपना क्या जाता है।&lt;br /&gt;आजकल एक शब्द बहुत चलन में है एनकाउंटर, हिंदी मे इसे मुठभेड़ कहते हैं, वैसे पुलिसवाले जब इस शब्द का प्रयोग करते हैं तो एक हाथ में बंदूक की मुठ होती है और सामने एक भेड़ होती है। एक आदमी के मरने की खबर छपती है, मरनेवाला आतंकवादी या वगैरह-वगैरह बताया जाता है, पड़ौसी सोचते हैं कि बरसों से बगल में रह रहा था तब तो कभी महसूस नहीं हुआ, अब पुलिसवाले कहते हैं तो..... पुलिस सोचती है कि भई आतंक के साये में जीने वाले को आतंकवादी बनाने में समय कितना लगता है और फिर सबसे बड़ी बात तो यह कि इसमें आखिर अपना क्या जाता है।&lt;br /&gt;क्रिकेटर से लेकर रूलिंग पार्टी को चलायमान रखने वाले सपोर्टर तक सभी की यही सोच बन चुकी है, चाहे देश मैच हारे या सत्ता की तलवार से जनता का सर कलम हो हमें कुछ नहीं सोचना है,हमें कुछ नहीं करना है आखिर अपना क्या जाता है।&lt;br /&gt;आपको क्या लगता है ? मेरी शोध के बारे में आपके क्या विचार हैं ? अब आप विचार बनाएं या ना बनाएं मुझे जो कहना था सो कह दिया, सुन ले तो अच्छी बात नहीं तो अपना क्या जाता है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2333254526940587404-8484855595457070215?l=mudda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mudda.blogspot.com/feeds/8484855595457070215/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2333254526940587404&amp;postID=8484855595457070215' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/8484855595457070215'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/8484855595457070215'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mudda.blogspot.com/2008/03/blog-post_07.html' title='&lt;strong&gt;&quot;अपना क्या जाता है &quot;। &lt;/strong&gt;'/><author><name>विकास शिशोदिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08157576148519764276</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='18' src='http://1.bp.blogspot.com/_yCbiUlApr1c/TMVfAgIbU7I/AAAAAAAAAVY/7kaK_w148Jg/S220/sing.png'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2333254526940587404.post-4803189649990311336</id><published>2008-03-04T23:59:00.000-08:00</published><updated>2008-03-05T00:02:07.953-08:00</updated><title type='text'>कौन चले इस मार्ग पर</title><content type='html'>&lt;a href="http://bp2.blogger.com/_yCbiUlApr1c/R85TcxwDQ9I/AAAAAAAAALc/wg7w-PEKgmw/s1600-h/images.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp2.blogger.com/_yCbiUlApr1c/R85TcxwDQ9I/AAAAAAAAALc/wg7w-PEKgmw/s320/images.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5174164775751599058" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पंकज रामेन्दू &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत में हर क्रांतिकारी और समाज सुधारक के नाम से एक मार्ग बना दिया जाता है, फिर यह मार्ग बस वालों के लिए एक स्टॉप, आम जनात के लिए एक रास्ता और हज़ारों लाखों के लिए गुज़रने का एक ज़रिया बन कर रह जाता है। महज़ एक रास्ता जिसे, जिसके नाम पर रखा गया है ना उसे किसी को वास्ता होता है ना हमारी राजनीति चाहती हबै कि कोई उससे वास्ता रखे ।&lt;br /&gt;हल्ला बोल.. फिल्म में एक नुक्कड़ नाटक के माद्यम से अवाम को जगाने की कोशिश को दिखाया गया। मैं यह फिल्म देख कर निकला, गाड़ी मैं बैठा, गाड़ी कई रास्तों से गुज़रती हुई सफदर हाशमी मार्ग से निकली, सफदर हाशमी मार्ग मंडी हाउस के पास से निकलता हुआ एक रास्ता है। रास्ता इसलिए कह रहा हूं क्योंकि यहां से सभी गुज़रते हैं, कुछ को अपना काम रहता है, कुछ यूंही तफरीह करते रहते हैं. फिल्म की स्क्रिप्ट दिमाग में चल रही थी जैसे ही इस मार्ग से निकला तो एकदम से सफदर हाशमी की याद ताजा हो गई। यह मेरा दुर्भाग्य रहा कि मैं कभी उनसे मिल नहीं सका, उनके बारे में जो भी मालूम चला वो लिखे-पढ़े से ही जान पाया था। नुक्कड़ नाटक के माध्यम से सफदर ने जो क्रांति पैदा की थी, उसकी वो लपट इतनी तेज थी कि वो तात्कालीन राजनीति को झुलसाने लगी थी और यही कारण रहा कि सफदर राजनीतिक गोली का शिकार बन गए। उनकी मौत के पश्चात उनके नाम से एक मार्ग बना दिया गया। अब यह मार्ग एक सार्वजनिक मार्ग है जिस पर से गुजरने वालों में से अधिकांश को यह भी नहीं मालूम कि सफदर आखिर थे कौन  ? &lt;br /&gt;सफदर की जलाई हुई आग काफी तीखी थी इसलिए उसे बुझाने के लिए सांत्वना का मार्ग बना दिया गया है। लेकिन कई ऐसे भी लोग है जो लगातार ऐसा काम कर रहे हैं, लेकिन उन्हे भरोसे के शब्द भी नहीं मिलते हैं । स्कूल दिनों में भोपाल में नुक्कड़ नाटक हमारा मुख्य शगल हुआ करता था, इस नाटक की सर्वेसर्वा पाखी दीदी हुआ करती थी।  वो कहां से आती थी हम नही जानते थे, बस वो जब भी आती तो हमेशा हमारे मोहल्ले से लगी झुग्गी बस्ती के बच्चों को इकट्ठा करती थी और नुक्कड़ नाटक करवाया करती थी।  उनके नाटकों का कई बार मुहल्ले में विरोध होता था, मोहल्लेवाले का विरोध इस बात को लेकर रहता था कि पाखी दीदी झुग्गी वाले बच्चों और मोहल्ले के दूसरे बच्चों को नाटक में हिस्सा दिलवाती हैं और उन्हें इस बात का डर रहता था कि इससे बमारे बच्चे बिगड़ जाएंगे। बाद में पता नहीं दीदी कहां चली गई मैं भी बड़ा हो गया और रोज़ी रोटी ने दिल्ली धकेल दिया। लेकिन आज सोचता हूं कि पाखी दीदी का क्या स्वार्थ था ? वो तो एक अच्छा ही काम कर रही थी। यह सोचते सोचते बचपन में दिमाग में पैदा हुई एक उलझन ताज़ा हो जाती है, बचपन में जब हमें ऐसे तथाकथित बच्चों के साथ खेलने से रोका जाता था तो हमेशा सोचता रहता था कि आखिर यह बिगड़ा होता क्या है ?&lt;br /&gt;खैर पाखी दीदी का पता नही है लेकिन सफदर हाशमी मार्ग से गुज़रना हो जाता है, सफदर हाशमी मार्ग जैसे ही भारत के लगभग सभी बड़े शहरों में एक  प्रचलित रोड ज़रूर होती है, इस रोड का नाम है एम.जी रोड। महात्मा गांधी को भारत का बच्चा-बच्चा जानता है, जो नहीं भी जानता ता उसे मुन्ना भाई की गाधीगिरी ने बता दिया था कि गांधी जी क्या चीज़ थे। लेकिन इन जानने वालों में बहुत से लोग यह नही जानते कि यह एम.जी रोड दरअसल महात्मा गांधी मार्ग है। दिल्ली में ऐसे ही एक रोड और है जी.बी रोड, वैसे तो  दिल्ली में रहने वाले और यहां घूमने आने वाले इस रोड को दिल्ली के रेड लाइट एरिये के नाम से जानते हैं। मेरी पहचान वालों में से कई ऐसे भी है जो जब में दिल्ली से जाता हूं तो यह ज़रूर पूछते हैं कि जी.बी रोड घूमा कि नहीं। इस पूछ के साथ उनके चेहरे पर एक शरारत भरी मुस्कान भी दौड़ जाती है।&lt;br /&gt;एक दिन मैं भीपाल के अपने एक मित्र जो कि इश रोड के मेरे अनुभव जानने के लिए काफी आतुर थे, से पूछ बैठा, यार तुम्हे मालूम है कि जीबी रोड का क्या मतलब है ? मेरे मित्र ने काफी दार्शनिक अंदाज़ में मुझसे कहा था कि रेज लाईट एरियों का क्या नाम ? जब मैंने उनसे कहा कि इस रोड का नाम गोविन्द बल्लभ मार्ग है तो वो नाम  को लेकर बिल्कुल आश्चर्यचकित नहीं हुए, अलबत्ता वो मुझसे यह ज़रूर पूछ बैठे, तो क्या हुआ ? मुझे चुप रहने के अलावा कोई और जवाब नहीं सूझा ।&lt;br /&gt;महात्मा गांधी का एम.जी रोड में, गोविन्द बल्लभ मार्म का जीबी रोड में तब्दीलल होना हमें यह बता देता है कि चाहे सफदर हाशमी  हो या सुभाष चंद्र बोस, भगत सिंह हो या गौतम बुद्ध यह सिर्फ एक मार्ग के नाम है.. भोपाल में दुष्यंत कुमार मार्ग से गुज़रता  हूं तो यह बात ध्यान आती है.. हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए.. इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए.. मेरे सीने में नही. तेरे सीने में सही... हो कहीं भी आग जलनी चाहिए। दरअसल दूसरे के सीने में आग जलने की अपेक्षा रखने वाले इस मार्ग से गुज़र तो सकते हैं ... लेकिन इस पर चल नहीं सकते हैं&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2333254526940587404-4803189649990311336?l=mudda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mudda.blogspot.com/feeds/4803189649990311336/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2333254526940587404&amp;postID=4803189649990311336' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/4803189649990311336'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/4803189649990311336'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mudda.blogspot.com/2008/03/blog-post_04.html' title='कौन चले इस मार्ग पर'/><author><name>विकास शिशोदिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08157576148519764276</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='18' src='http://1.bp.blogspot.com/_yCbiUlApr1c/TMVfAgIbU7I/AAAAAAAAAVY/7kaK_w148Jg/S220/sing.png'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://bp2.blogger.com/_yCbiUlApr1c/R85TcxwDQ9I/AAAAAAAAALc/wg7w-PEKgmw/s72-c/images.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2333254526940587404.post-5245585861557840026</id><published>2008-03-01T03:35:00.000-08:00</published><updated>2008-03-01T03:37:53.013-08:00</updated><title type='text'>ब्लाग में होती नंगाई</title><content type='html'>पंकज रामेन्दू &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहावत बहुत पुरानी है मगर कभी इसका असर कम नहीे हुआ है, हमाम में सभी नंगे होते हैं, और जब सब नंगे हों तो दूसरे को कम या ज़्यादा नहीं आंका जा सकता है। आज कल ब्लागों के बीच जो वाक् और युद्ध और शक्ति प्रदर्शन चल रहा है। वो हमाम में बैठे एक नंगे के दूसरे के नंगत्व पर हंसने जैसा हो रहा है। हिंदी लेखकों और कवियों हमेशा से बेचारे रहे, हर बार लिखी हुई रचना का वापस आ जाना, उसमें सुधार की सलाह मिलना, और कलम घिसते-घिसते हाथों से तक़दीर की लकीर का मिट जाना एक हिंदी रचनाकार के लिए नियति रही है। हिंदी रचनाकार जब महान होता है तो हर महान की तरह उसकी ज़बान में भी यह दर्द आ ही जाता है कि फलां प्रकाशक ने मुझे भगाया था, फलां पत्रिका औऱ  अखबार में मेरी रचनांए नहीं छपी। हर रचनाकार की रचना को अच्छा ना बताकर वापस करने की प्रथा रही है, लेकिन जब वो बड़ा हो जाता है तो उसकी वो ही लौटी हुई रचना बड़े मजे से छापी जाती है और चाव से साथ पड़ी जाती है। पहल हर समय यह प्रश्न बना रहता था कि ऐसा क्यों. क्या कारण है कि जो रचना पहले वापस आ गई वो दोबारा बेहतर से बेहतरीन हो जाती है। दरअसल हिंदी साहित्य में केकड़े पलते हैं, जो किसी भी दूसरे केकड़े को आगे बढ़ता हुआ देख उसकी टांग खींच लेते हैं।&lt;br /&gt;हिंदी साहित्य में आज तक कभी ऐसा नहीं हुआ कि किसी रचनाकार को आसानी से मिल गया हो, सभी साहित्यकारों ने उसकी मदद की है, यही कारण है कि हिंदी के विकास की दुहाई देने वाले तमाम लोग खुद की इसकी रेड़  मारते रहते हैं। गिद्ध के समान हमेशा सब कुछ झपट लेने की मानसिकता हमारे  तथाकथित साहित्यकारों की एक विधा रही है। &lt;br /&gt;अब इस काम को आग बढ़ाने का बीढ़ा उठाया है, इन ब्लागरों ने, यह भी वही हरकत कर रहे हैं जो हिंदी साहित्यकार करते हैं, जिसके कारण हिंदी साहित्य और तमाम खूबसूरत कृतियां लोगों तक आने  से पहले ही मर जाती हैं। लगे हुए हैं एक दूसरे की जूतमपैजार करने में। सब एक दूसरे को गरिया कर अपनी लकीर बड़ी करने में लगे हुए हैं, इन सभी लोगों का एक ही सिद्दांत हो चुका है, मेरी साड़ी से तेरी साड़ी सफेद कैसे।&lt;br /&gt;लेकिन इन तमाम पहलुओं में एक बात पर गौर करना सभी लोग भूल रहे हैं, या यूं कहे कि गुस्से में सभी का ध्यान इस ओर नहीं गया है कि यह प्रचार का एक बाज़ारु तरीका भी हो सकता है। अभी कुछ दिनों पहले सराय में ब्लागरों की मीटिंग हुई थी, मैं भी वहां पहुंचा था, वहां कोई सज्जन थे( नाम मुझे याद नहीं आ रहा है क्योंकि मैें उनसे पहली बार ही मिला था और चेहरे और नाम याद रखने में मेरी याददाश्त थोड़ी कमज़ोर है) उन्होने कहा था कि हमें ब्लाग में सबसे पहले इस बात पर ध्यान देना होगा कि इसकी पाठक संख्या कैसे बढ़ती है, मीडिया वाले जहां भी अपनी नाक घुसेड़ेंगे वहां वो टी आर पी की ही गंध चाहते हैं, इसे कहा जाता है, बिल्ली की नज़र में छींछडे। तो वो ब्लागरों की संख्या बढ़ाने को लेकर काफी चिंतित थे, इस चिंता के पीछे का सच तो वो ज़्यादा बेहतर बता सकते हैं। इसके अलावा एक चीज़ और देखने को मिली थी कि जिस प्रकार किसी कविता गोष्ठी में अगर कोई नया कवि बगैर किसी का हाथ थामे पहुंच जाए , तो उसके साथ जैसा बर्ताव वरिष्ठ कवियों द्वारा किया जाता है, यानि जैसे ही वो अपनी कोई रचना प्रस्तुत करेगा तो कई वरिष्ठ चेहरों पर संतो वाली मुस्कान लहर जाती है, ऐसे ही कुछ लोग थे जिनके चेहरे पर वो संतो वाली मुस्कान थी। अविनाश जी को तो हमेशा से बहस में मज़ा आया है, उनकी कम्युनिस्ट विचार धारा  उन्हे हमेशा से ऐसा करने पर मजबूर करती रहती है, तो वो तो बहस का भरपूर आनंद उठा रहे थे।&lt;br /&gt;यह पूरी बात बताने के पीछे मंतव्य यही था कि अभी जो ब्लाग पर मारकुटाई चल रही है, वो महज एक प्रचार का तरीका भी हो सकता है, जिसे देशी भाषा में कह सकते हैं . तू मेरी खुजा,में तेरी खुजाता हूं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन ऐसा कहा जाता है कि अपने को होशियार और दूसरे को बेवकूफ समझना बुरे वक्त की निशानी होती है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2333254526940587404-5245585861557840026?l=mudda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mudda.blogspot.com/feeds/5245585861557840026/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2333254526940587404&amp;postID=5245585861557840026' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/5245585861557840026'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/5245585861557840026'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mudda.blogspot.com/2008/03/blog-post.html' title='ब्लाग में होती नंगाई'/><author><name>विकास शिशोदिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08157576148519764276</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='18' src='http://1.bp.blogspot.com/_yCbiUlApr1c/TMVfAgIbU7I/AAAAAAAAAVY/7kaK_w148Jg/S220/sing.png'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2333254526940587404.post-8808263411716600011</id><published>2008-02-29T19:20:00.000-08:00</published><updated>2008-02-29T19:23:47.252-08:00</updated><title type='text'>टी.वी. पर ट्राई मारने का है एक बार।</title><content type='html'>&lt;a href="http://bp2.blogger.com/_yCbiUlApr1c/R8jMO6OJlcI/AAAAAAAAALQ/AuVBmc2RkME/s1600-h/poor+chi.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp2.blogger.com/_yCbiUlApr1c/R8jMO6OJlcI/AAAAAAAAALQ/AuVBmc2RkME/s320/poor+chi.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5172608728553854402" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;संजीव चौधरी&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सात-आठ साल उम्र के दो बच्चे । एक के गले में लटका हुआ छोटा-सा पुराना&lt;br /&gt;हारमोनियम और दूसरे के हाथ में एक डफ़ली । महानगर नयी दिल्ली का व्यस्ततम&lt;br /&gt;इलाका कनॉट प्लेस इन दोनों बच्चों के कमाने-खाने की जगह। फुटपाथ और खुले&lt;br /&gt;आसमान के अलावा जमा पूंजी के नाम पर और तीसरा उनके पास कुछ भी नहीं। उलझे&lt;br /&gt;बाल, बुझे चेहरे और अलमस्त आंखों में सुलगते हुए सवाल महानगर की इलीट&lt;br /&gt;सोसायटी से अनजान नहीं है । समाज में हाशिये पर रुके ये बच्चे इतने नादान&lt;br /&gt;भी नहीं हैं कि हवा का रुख भी न भांप सके । माहौल और मौका देखकर कभी माता&lt;br /&gt;की भेंट गाते हैं तो कभी दुत्कार मिलने पर सिर खुजाने के अलावा और दूसरा&lt;br /&gt;चारा नहीं रहता । कभी हल्की सी रोमांटिक आवारगी में 'ये इश्क हाय' गाते&lt;br /&gt;हैं कभी 'सारे जहां से अच्छा हिन्दुस्तान हमारा' । जनपथ बाज़ार पर पटरी&lt;br /&gt;के किनारे चिंहुकते इन दोनों बच्चों से मुखातिब हुआ -&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;      &lt;strong&gt; क्या नाम है?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;       असली नाम तो कुछ और है लेकिन मुझे रितिक कहते हैं और मेरे इस दोस्त को&lt;br /&gt;अभिषेक । आपको क्या काम है हमसे, गाना सुनोगे?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;       &lt;strong&gt;नहीं, कहां रहते हो?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;       यूं तो हम पहाड़गंज के हैं । यहां और कई ऐसे बच्चे हैं, जो जमनापार,&lt;br /&gt;पहाड़ी धीरज और कुचापातीराम से आते हैं। अपुन कनॉट प्लेस में रहते हैं,&lt;br /&gt;अपुन का दिल यहीं लगता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;      &lt;strong&gt; मां-बाप क्या करते हैं?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;       नहीं मालूम।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;       &lt;strong&gt;मां-बाप का क्या नाम है?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;       होगा कुछ, वो भी नहीं मालूम।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;      &lt;strong&gt; सिंगर कैसे बने?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;       पैसा कमाने के लिए। अभी इधर दिल्ली में हैं। टी.वी. पर ट्राई मारने का&lt;br /&gt;है एक बार। बाम्बे जाने का मूड है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;       &lt;strong&gt;मां की याद नहैं आती?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;       नहीं।एक बाई है बाई। वे जी.बी. रोड एरिया है न, वहीं है। उसी को मां बोलते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;       &lt;strong&gt;गाकर कितना कमा लेते हो?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;       कुछ पक्का नहीं। इधर धंधा बहुत डल है। बीस-तीस की पॉकेट हो जाती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;       &lt;strong&gt;कभी स्कूल गये हो?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;       क्यों जाएं स्कूल, वहां कोई पैसे मिलते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;     &lt;strong&gt;  कहां-कहां गाते हो?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;       कभी सफेद बस में, कभी लाल बस में, कभी नीली बस में। कई बार रेल में भी&lt;br /&gt;गाते हैं। शाम को इधर जनपथ पर गाते हैं। इधर का छोकरी बहुत अच्छा है।&lt;br /&gt;छोकरा लोग पैसा नहीं देता। कुछ और पूछना है आपको? कौन हैं आप?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;       &lt;strong&gt;सबसे ज्यादा गाना कौन सा गाना गाते हो?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;       बस दीवानगी है, ओम शान्ति ओम।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2333254526940587404-8808263411716600011?l=mudda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mudda.blogspot.com/feeds/8808263411716600011/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2333254526940587404&amp;postID=8808263411716600011' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/8808263411716600011'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/8808263411716600011'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mudda.blogspot.com/2008/02/blog-post_6017.html' title='&lt;strong&gt;टी.वी. पर ट्राई मारने का है एक बार।&lt;/strong&gt;'/><author><name>विकास शिशोदिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08157576148519764276</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='18' src='http://1.bp.blogspot.com/_yCbiUlApr1c/TMVfAgIbU7I/AAAAAAAAAVY/7kaK_w148Jg/S220/sing.png'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://bp2.blogger.com/_yCbiUlApr1c/R8jMO6OJlcI/AAAAAAAAALQ/AuVBmc2RkME/s72-c/poor+chi.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2333254526940587404.post-2811848403901106428</id><published>2008-02-29T04:21:00.000-08:00</published><updated>2008-02-29T04:25:00.401-08:00</updated><title type='text'>ब्लाग मेरे बाप की</title><content type='html'>&lt;a href="http://bp2.blogger.com/_yCbiUlApr1c/R8f5kKOJlbI/AAAAAAAAALI/HAkhVJBoSdw/s1600-h/images-1.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp2.blogger.com/_yCbiUlApr1c/R8f5kKOJlbI/AAAAAAAAALI/HAkhVJBoSdw/s320/images-1.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5172377096672613810" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;पंकज रामेन्दू&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आखिरकार ब्लागरों ने अपनी औकात दिखाना शुरु कर दिया, लगातार छप रही इन तकरीरो को देख कर एक कहानी याद आती है, एक सियार शहर में गया, शहरी लोग उसे भगाने लगते हैं, वो छिपते-छिपते एक रंग के टब में गिर जाता है और उसका रंग नीला हो जाता है।  उसके रंग को देख कर सब लोग अचंभित रह जाते हैं और उसकी देख रेख होने लगती है, एक दिन अचानक सियार हू हू करते हैं तो वो भी उनके साथ ताल में ताल मिलाने लगता है। &lt;br /&gt;ब्ललागर भी अब सियारों की तरह हू हू करने में लगे हुए हैं, सब को दूसरे की दाद में खुजाने में आनंद आ रहा है, भड़ास हो या मोहल्ला। सभी को दूसरे की छीछालेदर करने में आनंद आ रहा है, मोहल्ला कौन होता है यह कहने वाला की भड़ास बंद होना चाहिए, भड़ास कौन होता है मोहल्ला को अनुशासन सिखाने वाला। अपने आप को क्या यह ब्ललॉग का बाप मानने लगे हैं या ब्ललॉग इन्होंने खरीद लिया है।&lt;br /&gt;जब ब्लागिंग शुऱू हुई थी, तो इसका उद्देश्य हिंदी को आगे बढ़ाने और एक दूसरे के भावनाओं को बांटने का था। बहुत अच्छी पहल थी, जिसने इन्हे शुरू किया था वो उस छोटे बच्चे के समान थे जो अपने तन पर कपड़े इसलिए नहीं रखना चाहता है क्योंकि उसे कपड़े एक बनावटी आवरण लगते हैं। उसको प्राकृतिक रूप से रहने में आनंद आता है, उसके नंगेपन में मासूमियत होती है। यह तथाकथित पत्रकारों ने इसमें अपनी नाक घुसेड़ कर इसमे होने वाले नंगेपन को अश्लीलता की सीमा पर ला दिया है.&lt;br /&gt;ब्लाग ब्लाग ना रहकर अखाड़ा बन गया है, सब लाल लंगोटी पहने तैयार है, और एक दूसरे की लंगोटी उतारने का प्रयास करने में लगे हए हैं।&lt;br /&gt;दरअसल यह सारे के सारे किसी विषय पर चरचा नहीं करना चाहते यह बहस करना चाहते हैं, यह ग़लतफहमी पाले बैठे हैं कि ब्लाग की सत्ता इनके हाथों में है, यह जैसे चाहे नचा लेंगे। कुछ लोगों को अतिक्रमण करने की आदत होती है, वो चाहे रेल्वे की बर्थ पर बैठे, टेलीफोन की लाइन में खड़े हो, या कुछ लिखे पढ़े, हर जगह वो पिछवाड़ा टिका कर पांव पसारने पर विश्वास रखते हैं।&lt;br /&gt;लेकिन यह भूल गए हैं कि १२ घंटे बाद तो सूरज भी अस्त हो जाता है। &lt;br /&gt;इसलिए भैया अगर आप लोग यह सोच कर बैठे हो कि जिस तरह मीडिया में फन फैलाए बैठे हो और किसी दूसरे को अंदर नहीं आने देने चाहते हो, खड़ी भाषा में कहें तो, जो आप लोग अगले को चूतिया समझने की भूल कर रहे हो ना, तो यह भूल जाओ क्योंकि &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हर एक चीज़ का होता है, एक ना एक दिन अंत&lt;br /&gt;बारहों महीने नहीं रहता बंसत&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2333254526940587404-2811848403901106428?l=mudda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mudda.blogspot.com/feeds/2811848403901106428/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2333254526940587404&amp;postID=2811848403901106428' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/2811848403901106428'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/2811848403901106428'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mudda.blogspot.com/2008/02/blog-post_29.html' title='ब्लाग मेरे बाप की'/><author><name>विकास शिशोदिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08157576148519764276</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='18' src='http://1.bp.blogspot.com/_yCbiUlApr1c/TMVfAgIbU7I/AAAAAAAAAVY/7kaK_w148Jg/S220/sing.png'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://bp2.blogger.com/_yCbiUlApr1c/R8f5kKOJlbI/AAAAAAAAALI/HAkhVJBoSdw/s72-c/images-1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2333254526940587404.post-3930759297499694483</id><published>2008-02-27T00:29:00.000-08:00</published><updated>2008-02-27T00:34:59.502-08:00</updated><title type='text'>मर्जी एक्सप्रेस</title><content type='html'>&lt;a href="http://bp2.blogger.com/_yCbiUlApr1c/R8UgoPxXjHI/AAAAAAAAALA/umwlv_gOjaM/s1600-h/mail.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp2.blogger.com/_yCbiUlApr1c/R8UgoPxXjHI/AAAAAAAAALA/umwlv_gOjaM/s320/mail.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5171575622905334898" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;अभय मिश्र&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;अशोक कुमार की एक फिल्म का गाना याद आ रहा है। बोल थे- रेलगाड़ी रेलगाड़ी छुक छुक छुक छुक, बीच वाले स्टेशन बोले रुक रुक रुक रुक। बचपन में यह गाना गाते हुए भाई बहनों के साथ रेलगाड़ी का खेल खेलना हमारा प्रिय शगल होता था। खेलते वक्त बीच में गाड़ी रोक कर घर के अन्य सदस्य खुद को गाड़ी में बैठाने का आग्रह करते थे और हम उन्हें अपनी रेल में बिठा कर नानी के य़हां छोड़ देने का उपक्रम करते .&lt;br /&gt;बचपन में खेले जाने वाले इस खेल की याद हाल में एक खबर से आई। एक चैनल ने दिखाया कि बिहार के पूर्वी चंपारण जिले में लोग पटरियों पर खड़े बीस रुपये का नोट हाथ में लेकर हिलाते हैं। ट्रेन आती है और रुक जाती है. ड्राइवर बीस रुपये हाथ में लेता है और लोग आराम से ट्रेन में चढ़ जाते हैं। यह लोगों की रेल ड्राइवरों के साथ मिल कर बनाई हुई व्यवस्था है।&lt;br /&gt;लोगों का कहना है कि रेल मंत्री भी तो यही चाहते हैं कि सबको रेलवे की सुविधा मिले। रेल आपकी अपनी संपत्ति है- इस सूत्र को पूरी तरह अपने में समाहित करने इन गांव वालों को स्टेशन जाने की ज़रूरत नहीं पड़ती. वे आराम से घर के पास ही सुविधा प्राप्त कर लेते हैं, बिना इस बात की चिंता किए कि ट्रेन के इस तरह बार-बार रोके जाने से दूसरे दूसरे लोगेों को कितनी असुविधा और रेलवे को राजस्व का कितना नुकसान होता होगा। उन्हें इस बात से भी फर्क नहीं पडता कि उस ट्रेन में बैठा कोई बेटा शायद अपने बीमार बूढे मां-बाप को देखने जा रहा होगा और जितनी बार गाड़ी रुकती होगी उतनी बार उसके मन में हज़ार आशंकाएं उठ खड़ी होती होंगी. गाड़ी में जा रही किसी बारात को देर हो रही होगी या नौकरी के लिए इंटरव्यू देने जा रहे किसी बेरोज़गार को समय पर न पहुंच पाने का डर सता रहा होगा. यही नही, यह सुविधा उठाने वालों को यह अहसास ही नहीं रहता होगा कि उनकी वजह से कोई बीमार समय पर अस्पताल नहीं पहुंच पाया और समय पर कारखाने न पहुंच पाने के कारण किसी की आधे दिन की दिहाड़ी काट ली गई। ऐसे कितने अफसानों के साथ एक ट्रेन के भीतर हज़ारों लोग यात्रा करते हैं।&lt;br /&gt;देश की राजधानी दिल्ली हो या बघेलखंड के पिछड़े इलाके में बसा मेरा गांव, सार्वजनिक सुविधाओं का जितना दुरुपयोग हम करते हैं उसकी नज़ीर कही और देखने को नहीं मिलती । पिछले दिनों लंबे अंतराल के बाद गांव जाने का मौका मिला। रीवा से गांव की दूरी मात्र नब्बे किलोमीटर है। लेकिन यह सफर तय करने में सात या आठ घंटे तक का समय लगता है। क्योंकि हर मुसाफिर अपने घर के समाने बस रुकवाना चाहता है। थोड़ी थोड़ी दूरी पर खड़े रहते है, एक जगह खड़ा रहने में मानों उनका अहं आड़े आता हो। कोई ब्राह्मण या ठाकुर किसी दलित के साथ खड़े होकर कैसे बस का इंतज़ार कर सकता है ।&lt;br /&gt;बहरहाल, बस धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी कि चुरहट पार करते ही फिर रुक गई। बारह झांक कर हक़ीकत जानने की कोशिश की, बस किसी नई-नवेली दुल्हन के लिए रुकवाई गई थी, और वह दूर से लंबा घूंघट और चमकीलीी गुलाबी साड़ी में लिपटी धीरे-धीरे बड़बड़ाता हुआ गाड़ी को रोके रहा और दुल्हन का इंतज़ार करता रहा. उसके पास कोई चारा नहीं था, क्योंकि उसे रोज़ इसी रास्ते निलना है और यहां बसों में तोड़-फोड़ मारपीट रोज़ की बात है।&lt;br /&gt;इस तरह ट्रेन-बसों को रोकने की प्रवृत्ति सिर्फ बिहार में नहीं है। खंडवा-इंदौर रेल लाइन पर दूध वाले ड्राइवर को थोड़े से दूध के बदले में कहीं भी रुकने पर मजबूर कर देते हैं। नब्बे के दशक में दूरदर्शन पर रेलवे का एक विज्ञापन आता था- हम बेहतर इसे बनाएं और इसका ळाभ उठाएँ, रेल रेल। हमने इसे बेहतर तो पता नहीं कितना बनाया, लेकिन इसका मनमुताबिक लाभ ज़रूर उठा रहे हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2333254526940587404-3930759297499694483?l=mudda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mudda.blogspot.com/feeds/3930759297499694483/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2333254526940587404&amp;postID=3930759297499694483' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/3930759297499694483'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/3930759297499694483'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mudda.blogspot.com/2008/02/blog-post_27.html' title='&lt;strong&gt;मर्जी एक्सप्रेस&lt;/strong&gt;'/><author><name>विकास शिशोदिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08157576148519764276</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='18' src='http://1.bp.blogspot.com/_yCbiUlApr1c/TMVfAgIbU7I/AAAAAAAAAVY/7kaK_w148Jg/S220/sing.png'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://bp2.blogger.com/_yCbiUlApr1c/R8UgoPxXjHI/AAAAAAAAALA/umwlv_gOjaM/s72-c/mail.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2333254526940587404.post-1665085697915803995</id><published>2008-02-25T04:20:00.000-08:00</published><updated>2008-02-25T04:24:19.275-08:00</updated><title type='text'>जय जवान, जय किसान</title><content type='html'>&lt;a href="http://bp2.blogger.com/_yCbiUlApr1c/R8KzS_xXjGI/AAAAAAAAAK4/HthtWE8kbOQ/s1600-h/image2.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp2.blogger.com/_yCbiUlApr1c/R8KzS_xXjGI/AAAAAAAAAK4/HthtWE8kbOQ/s320/image2.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5170892461112265826" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;जय जवान, जय किसान, यह नारा भूतपूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय श्री लाल बहादूर शास्त्री ने दिया था, यह बात हम सब को मालूम है, इस नारे से प्रभावित होकर उपकार फिल्म का निर्माण हूआ यह भी हम लोग जानते हैं। उपकार फिल्म का गाना मेरे देश की धऱती सोना उगले-उगले हीरे मोती, हम सभी ने सुना है (वैसे भी हर स्वतंत्रता दिवस पर यह गीत कही ना कहीं सुनाई दे ही जाता है।)। मेरे ख्याल से मेरी इस बात से किसी को गुरेज नहीं होगा।&lt;br /&gt;भूतपूर्व प्रधानमंत्री के नारे दिए जाने औऱ फिल्म निर्माण से अब तक काफी समय गुजर गया, देश ने काफी तरक्की भी कर ली, हर जगह मॉल भी खड़े हो गए, औऱ तो औऱ सेज़ की सेज बनाकर सरकार ने गहरी निंद्रा भी तान ली। इस पूरे बदलावीकरण में कुछ चीजें है जो हमारी परंपराओं के समान अडिग रही, औऱ ना पहले बदली औऱ नही अब बदली, हां बदतर ज़रूर होती गई। किसान आज भी मुंशी प्रेमचंद की पूस की रात का किरदार है जो अपने कुत्ते झबरा को छाती से चिपटाकर हाड़ तोड़ती सर्दी में गर्माहट लेता है, यह किसान कभी जवान नहीं हो पाया क्योंकि वक्त से पहले झुकती कमर ने इसे बचपन से सीधे बूढ़ापे ला पटका, हर जगह पराजय स्वीकारता किसान कभी जय किसान नहीं बन पाया।&lt;br /&gt;कभी प्रकृति की मार सहता, कभी सूखा कभी बाढ़ सहता यह किसान इन त्रासदियों से उभर नहीं पाता है कि कोई नई मुसीबत उसके सामने दम साधे खड़ी रहती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://bp2.blogger.com/_yCbiUlApr1c/R8KzH_xXjFI/AAAAAAAAAKw/gnioI89ufw0/s1600-h/images.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp2.blogger.com/_yCbiUlApr1c/R8KzH_xXjFI/AAAAAAAAAKw/gnioI89ufw0/s320/images.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5170892272133704786" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सेज़ की सेज पर नंदीग्राम में कई लाशे सोई पड़ी है, तो विदर्भ में अपने पेट को घुटने से चिपकाकर अपनी भूख को मारता किसान आत्महत्या करने पर मजबूर हो रहा है। यहां प्रधानमंत्री भी आते है, औऱ मुख्यमंत्री भी दौरा करते हैं लेकिन इनके वादों की आभासीय मिठाई मुंह मीठा नहीं कड़वा कर जाती है। किसान इन मु्द्दो को सहन करने के बाद फिर उठने का प्रयास करने लगा तो हमारे देश के कर्णधारों को यह भी नागवार गुजरा औऱ वो गेंहू के मूल्य निर्धारण का निर्णय लेकर फिर किसान की कमर तोड़ने पर आमादा हो गए।&lt;br /&gt;जिस देश का स्थान कृषि में सर्वोच्च रहा करता था, आज उस भारत में कृषि सरककर तीसरे स्थान पर आ गई है। बढ़ते शहरीकरण औऱ खेती में लगातार होते घाटे को देखते हुए किसान का मन भी अब खेती की ओऱ से खट्टा होने लगा है औऱ वो शहरों की तरफ आकर्षित हो रहा है, जो न सिर्फ उसके लिए बल्कि देश के लिए भी एक चिंतन का विषय है। आज का किसान अपनी दो बीघा ज़मीन को वापस पाने के लिए शहरों में संघर्ष करने नहीं पहुंच रहा है बल्कि उसका उचटा मन उसे यह करने पर मजबूर कर रह है। हमारे देश की शासन व्यवस्था जिसने कभी ज़मींदारी प्रथा औऱ सूदखोरी जैसी व्यवस्थाओं पर लगाम लगाने के लिए कदम उठाए थे, आज मदर इंडिया के सुख्खी लाला की तरह हर किसान का दो तिहाई अनाज छीन रही है औऱ बिरजू बना किसान आज भी सुख्खी लाला के बही को दुनिया की सबसे कठिन पढ़ाई समझे बैठा हुआ, एक बेबस की तरह उसे समझने का प्रयास कर रहा है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2333254526940587404-1665085697915803995?l=mudda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mudda.blogspot.com/feeds/1665085697915803995/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2333254526940587404&amp;postID=1665085697915803995' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/1665085697915803995'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/1665085697915803995'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mudda.blogspot.com/2008/02/blog-post_25.html' title='&lt;strong&gt;जय जवान, जय किसान&lt;/strong&gt;'/><author><name>विकास शिशोदिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08157576148519764276</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='18' src='http://1.bp.blogspot.com/_yCbiUlApr1c/TMVfAgIbU7I/AAAAAAAAAVY/7kaK_w148Jg/S220/sing.png'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://bp2.blogger.com/_yCbiUlApr1c/R8KzS_xXjGI/AAAAAAAAAK4/HthtWE8kbOQ/s72-c/image2.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2333254526940587404.post-522715774843507834</id><published>2008-02-24T03:35:00.000-08:00</published><updated>2008-02-24T03:37:38.230-08:00</updated><title type='text'>राहत की चाहत </title><content type='html'>&lt;a href="http://bp1.blogger.com/_yCbiUlApr1c/R8FW4_xXjEI/AAAAAAAAAKo/mlG66L8Z-6w/s1600-h/death6.png"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp1.blogger.com/_yCbiUlApr1c/R8FW4_xXjEI/AAAAAAAAAKo/mlG66L8Z-6w/s320/death6.png" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5170509384389200962" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कई बार ज़िंदगी में कुछ ऐसी घटनाए घट जाती हैं, जो हमें सोचने पर तो मजबूर करती ही हैं साथ ही साथ हमारी आत्मा को भी कचोट देती है। कुछ दिनों पहले मैं एक ऐसी महिला के दर्द से रूबरू हुआ, जिसने मुझे हमारे देश की स्वास्थ्य व्यवस्था की रजाई में पड़े पैबंद दिखाए, यह वो व्यवस्था है जो हालातों की सर्दी में ठिठुरते आम लोगों को राहत देने का वादा तो करती है, लेकिन इसमें हुए दंबगदारी के छेद से गरीब और मजबूर जनता के हाड़ तक को कंपा देने वाली असंवेदशील सर्द हवा अंदर प्रवेश करती ही रहती है।&lt;br /&gt;मै जिस महिला की बात कर रहा हूं वो अनिता नाम की एक मध्यमवर्ग की महिला है। एक ऐसा वर्ग जो अपने ज़िंदगी के कुंए में रोज़ हक़ीकत की बाल्टी उतारता है औऱ उसमें अपने सपने के पानी को देखने की कोशिश करता है। अनिता की मां भी है और पिता भी, यानि एक भरापूरा परिवार, जो एक दूसरे की मुस्कुराहटों पर जीवित है। अनिता एक कामकाजी महिला है, जो अपनी कमाई से अपने माता-पिता औऱ घर का खर्च चलाती है। मां बाप बूढ़े हो चुके है, इसलिए उनके सेहत को ध्यान में रखते हुए अनिती ने उनका मेडिकल इंश्योरेंस भी करवा रखा है। आखिर बुरा वक्त कह कर थोड़ी ना आता है। वो अपनी छोटी सी कमाई में से इस इंश्योंरेंस के पैसों को जमा करना कभी नहीं भूलती है। &lt;br /&gt;एक दिन अनिता की मां को हल्का सा बुखार हो गया, उसकी मां को सर्दी-जुखाम कुछ दिनों से था, उसने सोचा शायद उसी के कारण बुखार हो गया होगा।&lt;br /&gt;वो अपनी मां को लेकर पास के मैक्स नाम के निजी अस्पताल में पहुंची, डॉक्टरों ने बताया कि उसकी मां को मामूली सा वायरल इंफेक्शन है, एक दो दिन में ठीक हो जाएगा। एहतियात के तौर पर उसे अस्पताल में भर्ती करा दिया गया । अनिता ने सोचा, किसी बात को जोखिम क्यों उठाया जाए और फिर मेडिकल इंश्योरेंस भी है, उसने अपनी मां को अस्पताल में भर्ती कर दिया, इलाज भी शुरू हो गया।&lt;br /&gt;दो दिन की बीमारी दो महीने में तब्दील हो गई, वो डॉक्टर जो इसे एक मामूली बीमारी बता रहे थे, अब इसकी गंभीरता बयान करने लगे। पैसा लगातार खर्च हो रहा था। इंश्योरेंस कंपनी भी पैसा देने में नानुकुर करने लगी । डॉक्टर अपने अनुसार अनिता की मां के इलाज का बिल बना रहे थे, वैसे भी इंश्योरेंस कंपनी जिन अस्पतालों से समझौता करती हैं, वे दोनों मिल कर क्या करते हैं यह कभी ग्राहक को पता नहीं चल पाता है। उसे तो अंत में मालूम चलता है कि वो इतना लुट चुका है। एक दिन डॉक्टर ने आकर बताया कि उसकी मां को निमोनिया है वो भी ऐसा जो हज़ारों में किसी एक को होता है। अनिता कुछ कहने की स्थिति में नहीं थी वो सिर्फ चुपचाप अपनी मां को देख रही थी, उसे अपनी बेबसी पर रोना आ रहा था। दिन बीतते गए। एक दिन इंश्योरेंस कंपनी वालों ने आकर कहा कि हमारी योजना में इतना खर्च वहन करना नही है और पता नहीं उसे क्या समझा गए, उसे सिर्फ इतना समझ में आया कि पॉलिसी लेते वक्त उसे अंधेर में रखा गया, वो कुछ नहीं कर सकती थी। एक दिन डॉक्टरों ने कहा कि उसे एक नियत राशि जमा करनी होगी तभी आगे उसकी मां का इलाज हो सकता है अन्यथा वो अस्पताल खाली करे। सरिता डॉक्टरों के आगे गिड़गिड़ाई, रोई, लेकिन डॉक्टर ने एक नहीं सुनी, आखिर उन्होंने खैरातखाना तो खोल नहीं रखा था। एक दिन अनिता की मां को अस्पताल से डिस्चार्ज कर दिया गया, अनिता इसके बात जी.बी पंत नामक सरकारी अस्पताल में गई। ये वो अस्पताल है, जिन्हे ऐसी गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए ही जाना जाता है, और यह अस्पताल आम जनता के लिए ही बनाए गए हैं,। मगर अफसोस हमारे देश में आम नागरिक आमतौर पर मरने के लिए बना है, जीना तो उसके अधिकार में है ही नही। जिन अस्पतालों के विषय में कहा जाता है कि यहां गरीबों का इलाज किया जाता है, यह खैराती अस्पताल है वहां भी खैरात सिर्फ दंबगदारों के नसीब में ही है। आपके पास कितनी लंबी पहुंच है कितना जेब में माल है, यह बात निर्धारित करती है कि आप जीने के हकदार है कि नहीं । अनिता की मां इस बात को साबित करने में नाकामयाब रही और उसे किसी सरकारी अस्पताल में दाखिला नहीं मिला। अनिता ने लाख सिर पटके, कार्यालय दर कार्यालय, यहां तक कि मुख्यमंत्री के पास भी पहुंची, लेकिन आम जनता की आवाज़ में वो बुलंदी नहीं होती की वो किसी खास के कान में जूं को रेंगा सके, धीरे-धीरे अनिता की मां मरती गई, यह सब हमारी आंखो के सामने घटा। अनिता रोज़ अपनी मां को तड़पता देखती और बिलखते हुए ईश्वर से प्रार्थना करती कि है ईश्वर मेरी मां को उठा ले, उसे मुक्ति दे दे, उसे जीने का कोई हक नहीं है क्योंकि वो एक आम इंसान है। एक दिन ईश्वर ने अनिता की सुन ली औऱ उसकी मां ने इलाज के अभाव में अंतिम हिचकी ली। यह बात सुन कर किसी को कोई फर्क नहीं पड़ने वाला शायद किसी की आत्मा भी ना कचोटे, क्योंकि हमने अपनी संवेदनाओं, इंसानियत, मानवता को सरे बाज़ार नीलाम कर दिया है। फिर ऐसे आदमी के मरने पर क्या अफसोस करना जो कीड़ों मकोड़ों की तरह जी रहा है, भारत का हर आम नागरिक एक कीड़ा है, जो ना जीने का हक़दार है औऱ ना ही जिसे मौत भी मयस्सर है, उसे सिर्फ तड़प मिल सकती है, यह आम आदमी, उस चूसने वाले आम की तरह होता है जिसका रस का आनंद उठाया जाता है, और फिर उसे कूड़ा समझ कर फेंक दिया जाता है। अनिता की मां महज एक उदाहरण है जो हमारी दिन प्रति दिन खत्म होती संवेदना को बताती है, क्योंकि सरकार चाहे लाख वादे कर ले प्रशासन चाहे लाख दुरुस्त हो जाए लेकिन सबसे अहम बात यह है कि इसे चलाने वाले हैं तो आखिर इंसान, जिनकी आंखे भौतिकता की चकाचौंध का कारण तड़पती मानवता को नहीं देख पा रही है। अगर देश के एक बड़े तबके को यूंही मरना है तो फिर उन्हें सीधे सीधे मरने देना चाहिए, यह अस्पतालों का झूठा दिखावा क्यों ? जो एक इंसान की जान भी लेता है औऱ दूसरे की हिम्मत को तोड़ भी देता है। क्या हमारे देश के नेता जिस जनता के सामने झोली फैलाए गद्दी की भीख मांगते रहते हैं, बाद में उसका जीवन उनके सामने बोझ बन जाता है ? हर साल स्वास्थ्य विभाग के लिए करोड़ो का बज़ट पास होता लेकिन आम जनता ऐसे ही इलाज के अभाव में मरती रहती है, तो आखिर यह पैसा जाता कहां है ? यह खैराती अस्पताल आखिर किसको खैरात बांट रहे हैं ? यह ऐसा यक्ष प्रश्न है जिसका जवाब कोई भी नहीं देना चाहता है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2333254526940587404-522715774843507834?l=mudda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mudda.blogspot.com/feeds/522715774843507834/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2333254526940587404&amp;postID=522715774843507834' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/522715774843507834'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/522715774843507834'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mudda.blogspot.com/2008/02/blog-post_24.html' title='&lt;strong&gt;राहत की चाहत &lt;/strong&gt;'/><author><name>विकास शिशोदिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08157576148519764276</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='18' src='http://1.bp.blogspot.com/_yCbiUlApr1c/TMVfAgIbU7I/AAAAAAAAAVY/7kaK_w148Jg/S220/sing.png'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://bp1.blogger.com/_yCbiUlApr1c/R8FW4_xXjEI/AAAAAAAAAKo/mlG66L8Z-6w/s72-c/death6.png' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2333254526940587404.post-5139444599188120227</id><published>2008-02-23T08:07:00.000-08:00</published><updated>2008-02-23T08:10:13.733-08:00</updated><title type='text'>भूख</title><content type='html'>&lt;a href="http://bp3.blogger.com/_yCbiUlApr1c/R8BFWvxXjDI/AAAAAAAAAKg/i--NHKKTj54/s1600-h/images.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp3.blogger.com/_yCbiUlApr1c/R8BFWvxXjDI/AAAAAAAAAKg/i--NHKKTj54/s320/images.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5170208629304298546" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;पंकज रामेन्दू मानव &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब घुटने से सिकुड़ा पेट दबाया जाता है&lt;br /&gt;जब मुंह खोल कर हवा को खाया जाता है&lt;br /&gt;जब रातें, रात भर करवट लेती है&lt;br /&gt;जब सुबह देर से होती है&lt;br /&gt;जब चांद में रोटी दिखती है&lt;br /&gt;तब दिल में यह आवाज़ उठती है&lt;br /&gt;भूख ऐसी ही होती है&lt;br /&gt;भूख ऐसी ही होती है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब गिद्ध मरने की राहें तकता है&lt;br /&gt;जब कचरे में भी कुछ स्वादिष्ट दिखता है&lt;br /&gt;जब कलम चलाने वाला बार-बार दाल-चावल लिखता है&lt;br /&gt;जब एक वक्त की खातिर जिगर का टुकड़ा बिकता है&lt;br /&gt;जब रातें सूरज पर भारी होती हैं&lt;br /&gt;तब दिल से एक आवाज़ होती है&lt;br /&gt;भूख ऐसी ही होती है &lt;br /&gt;भूख ऐसी ही होती है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब हांडी में चम्मच घुमाने का कौशल दिखलाया जाता है&lt;br /&gt;जब चूल्हे की आंच से बच्चों का दिल बहलाया जाता है&lt;br /&gt;जब मां बच्चों की कहानी सुना, फुसलाती है&lt;br /&gt;जब सेहत की बातें बता ज़्यादा पानी पिलवाती है&lt;br /&gt;जब रोटी की बातें ही आनंदित कर जाती हैं&lt;br /&gt;तब दिल से एक हूक उठती है&lt;br /&gt;भूख ऐसी ही होती है&lt;br /&gt;भूख ऐसी ही होती है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब पेट का आकार बड़ा सा लगता है&lt;br /&gt;जब इंसान भगवान पर दोष मढ़ता है&lt;br /&gt;जब भरी हुई थाली महबूबा लगती है&lt;br /&gt;जब महबूबा सुंदर कम स्वादिष्ट ज़्यादा दिखती है&lt;br /&gt;तब दिल से एक हूक उठती है&lt;br /&gt;भूख ऐसी ही होती है&lt;br /&gt;भूख ऐसी ही होती है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब एक टुकड़ा ज़िंदगी पर भारी लगता है&lt;br /&gt;जब तिल तिल कर जीना लाचारी लगता है&lt;br /&gt;जब बातें रास नहीं आती&lt;br /&gt;जब हंसना फनकारी लगता है&lt;br /&gt;जब एक निवाले पर लड़ती भौंक सुनाई देती है&lt;br /&gt;तब दिल से एक हूक उठती है&lt;br /&gt;भूख ऐसी ही होती है &lt;br /&gt;भूख ऐसी ही होती है&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2333254526940587404-5139444599188120227?l=mudda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mudda.blogspot.com/feeds/5139444599188120227/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2333254526940587404&amp;postID=5139444599188120227' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/5139444599188120227'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/5139444599188120227'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mudda.blogspot.com/2008/02/blog-post_23.html' title='&lt;strong&gt;भूख&lt;/strong&gt;'/><author><name>विकास शिशोदिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08157576148519764276</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='18' src='http://1.bp.blogspot.com/_yCbiUlApr1c/TMVfAgIbU7I/AAAAAAAAAVY/7kaK_w148Jg/S220/sing.png'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://bp3.blogger.com/_yCbiUlApr1c/R8BFWvxXjDI/AAAAAAAAAKg/i--NHKKTj54/s72-c/images.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2333254526940587404.post-3142872357237389943</id><published>2008-02-21T07:21:00.000-08:00</published><updated>2008-02-21T07:24:17.287-08:00</updated><title type='text'>बलात्कार के प्रकार</title><content type='html'>&lt;a href="http://bp2.blogger.com/_yCbiUlApr1c/R72XkPxXjBI/AAAAAAAAAKQ/n4N6SGX5BLU/s1600-h/images.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp2.blogger.com/_yCbiUlApr1c/R72XkPxXjBI/AAAAAAAAAKQ/n4N6SGX5BLU/s320/images.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5169454596255878162" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;पंकज रामेन्दु मानव &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं एक औरत हूं&lt;br /&gt;मेरा रोज़ बलात्कार किया जाता है&lt;br /&gt;बलात्कार सिर्फ वो नहीं है&lt;br /&gt;जो अंग विच्छेदन पर हो&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बलात्कार सिर्फ वो भी नही है&lt;br /&gt;जब कपड़ों को तार तार करके कई लोग जानवरों के समान&lt;br /&gt;मेरा मांस नोचते हैं&lt;br /&gt;वो तो अपराध भी होता है&lt;br /&gt;यह बात जानते हुए, अब मेरा बलात्कार &lt;br /&gt;दूसरी तरह से किया जाता है&lt;br /&gt;यह बलात्कार हर दिन होता है&lt;br /&gt;भीड़ में होता है, समाज के सामने होता है&lt;br /&gt;कई बार समाज खुद इसमें शरीक भी हो जाता है&lt;br /&gt;इसमें मेरे कपड़े तार -तार नहीं होते &lt;br /&gt;कई निगाहें रो़ज़ मुझे इस तरह घूरती हैं कि&lt;br /&gt;वो कपड़ो को भेदती चली जाती हैं, और मैं सबके सामने&lt;br /&gt;खुद को नंगा खड़ा पाती हूं&lt;br /&gt;कई बार बातों से भी मेरी अस्मिता लूटी जाती है और&lt;br /&gt;धृतराष्ट्र समाज के सामने द्रोपदी बनी मेरी आत्मा &lt;br /&gt;मदद की गुहार लगाती रहती है,&lt;br /&gt;अपने हाथों से अपने बदन को ढांकती &lt;br /&gt;मेरी आत्मा ज़ुबान से आवाज़ नहीं निकाल पाती है&lt;br /&gt;ऐसे ही न जाने कितने तरीकों से लुटती मैं रोज़ाना&lt;br /&gt;इन्ही अपराधियों का सामना करती हूं&lt;br /&gt;समाज के शरीफ की श्रेणी में रखे जाने वाले यह लोग&lt;br /&gt;बात बात पर मेरे बदन के स्पर्श का लुत्फ लेते यह लोग&lt;br /&gt;कभी अपराधी नहीं माने जाएगें&lt;br /&gt;क्योंकि यह आपराधिक बलात्कार नहीं&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2333254526940587404-3142872357237389943?l=mudda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mudda.blogspot.com/feeds/3142872357237389943/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2333254526940587404&amp;postID=3142872357237389943' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/3142872357237389943'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/3142872357237389943'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mudda.blogspot.com/2008/02/blog-post_21.html' title='&lt;strong&gt;बलात्कार के प्रकार&lt;/strong&gt;'/><author><name>विकास शिशोदिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08157576148519764276</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='18' src='http://1.bp.blogspot.com/_yCbiUlApr1c/TMVfAgIbU7I/AAAAAAAAAVY/7kaK_w148Jg/S220/sing.png'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://bp2.blogger.com/_yCbiUlApr1c/R72XkPxXjBI/AAAAAAAAAKQ/n4N6SGX5BLU/s72-c/images.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2333254526940587404.post-7932928439368350265</id><published>2008-02-20T06:22:00.000-08:00</published><updated>2008-02-20T06:24:08.228-08:00</updated><title type='text'>जनतंत्र एक डैश है </title><content type='html'>सफ़हे पे दर्ज &lt;br /&gt;दो ईस्वीसनों के बीच छोटी लकीर की तरह &lt;br /&gt;जन और तंत्र के बीच का छोटी लकीर की तरह &lt;br /&gt;पर आंख से एकदम ओझल&lt;br /&gt;यह जनतंत्र &lt;br /&gt;जन और तंत्र के बीच का&lt;br /&gt;सिर्फ़ एक डैश ( - ) है &lt;br /&gt;(जो समझो, उसके पहिये की कील है) &lt;br /&gt;जिसे जनगण ने उस आदमीनुमा जंतु के हवाले कर दिया है &lt;br /&gt;जो सियार और सांप के हाईब्रीड से &lt;br /&gt;इंसानी मादा की कोख का इस्तेमाल कर पैदा हुआ है &lt;br /&gt;और घुमा रहा है जनतंत्र का पहिया &lt;br /&gt;लगातार उल्टा-पुल्टा, आगे के बजाय पीछे &lt;br /&gt;पर भूख की जगह भाषा पर छिड़ी बहस में जुटे लोग &lt;br /&gt;डैने ताने अपने को फुलाये बैठे हैं कि &lt;br /&gt;उनका लोकतंत्र सरपट दौड़ रहा है &lt;br /&gt;गंतव्य की ओर।&lt;br /&gt;डैश पर टांगें फैलाये बैठा &lt;br /&gt;पूरे तंत्र का तमाशागर यह जीव &lt;br /&gt;जनता की बोटियों के खुराक पर &lt;br /&gt;जिन्दा रहता है &lt;br /&gt;लूटता है उनके वोटों को &lt;br /&gt;घुस आता है सरकार की धमनियों में &lt;br /&gt;वायरस बनकर और &lt;br /&gt;डैश को लंबा करने की &lt;br /&gt;हर मिनट &lt;br /&gt;बहत्तर शातिर चालें चलता है ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(सुशील कुमार की कविता)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(साभार &lt;a href="http://www.kritya.in/"&gt;कृत्या&lt;/a&gt;)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2333254526940587404-7932928439368350265?l=mudda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mudda.blogspot.com/feeds/7932928439368350265/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2333254526940587404&amp;postID=7932928439368350265' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/7932928439368350265'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/7932928439368350265'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mudda.blogspot.com/2008/02/blog-post_20.html' title='&lt;strong&gt;जनतंत्र एक डैश है &lt;/strong&gt;'/><author><name>विकास शिशोदिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08157576148519764276</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='18' src='http://1.bp.blogspot.com/_yCbiUlApr1c/TMVfAgIbU7I/AAAAAAAAAVY/7kaK_w148Jg/S220/sing.png'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2333254526940587404.post-7653175665728851943</id><published>2008-02-19T23:38:00.000-08:00</published><updated>2008-02-19T23:40:47.484-08:00</updated><title type='text'>करो या मरो</title><content type='html'>&lt;a href="http://bp3.blogger.com/_yCbiUlApr1c/R7vZX_xXi-I/AAAAAAAAAJ8/Bp3UCSFi4Y4/s1600-h/india%2Bpolitics.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp3.blogger.com/_yCbiUlApr1c/R7vZX_xXi-I/AAAAAAAAAJ8/Bp3UCSFi4Y4/s320/india%2Bpolitics.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5168964003616492514" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिस विषय पर मैं बात करने जा रहा हूं, यह विषय उतना ही गंभीर है जितना भारत-पाक के रिश्तों को लेकर हमारे नेता, कश्मीर मामले पर भारत-पाक राजनीति, विश्व से आतंकवाद को समाप्त करने के लिए पाक-अमेरिका, और शादी को लेकर सैफ-करीना। जो विषय इतना गंभीर हो उसको मैं तो हल्के मे नहीं ले पाया, आप भी उसके बारे में गंभीर रूप से विचार कीजीयेगा। वैसे भी भारत का नागरिक विचार को अचार की तरह इस्तेमाल करता है, बनाता देर तक है, खाता कम-कम है। &lt;br /&gt;विषय को जानने के लिए हमे आज़ादी की लड़ाई के दौर में जाना पड़ेगा, साहब हालत बहुत खराब थी, अंग्रेज मान ही नही रहे थे, हम कहे जा रहे थे चले जाओ, वो थे की अड़ियल मेहमान बने जा रहे थे। वो क्या कहते हैं- वो हमारे घर में कुछ इस तरह आए, जैसे किरायेदार मकानमालिक हो जाए। गांधी जी ने खूब समझाया, जब वो लोग नही माने तो गांधी जी ने गुस्से मे आकर कहा कि अब तो - करो या मरो की स्थिति है। तो साहब गांधी जी ने यह नारा दिया, लोगो ने इस पर अमल किया और लो भारत को आज़ादी भी मिल गई। लेकिन भाईसाब कई बार समय के साथ ऐसी बाते नुकसानदायक हो जाती है। &lt;br /&gt;अब हमारे क्रिकेटर हैं उनके लिए आए दिन हर नई सीरिज़ में करो या मरो की स्थिति बनी रहती है। अच्छा वो लोग भी क्या करे, गांधी जी ने इतना अच्छा नारा दिया है वो बेचारा बने ये सही नही लगता, तो वो हमेशा करो या मरो की स्थिति बना देते हैं। इसे कहते हैं सच्चे गांधी भक्त।&lt;br /&gt;अब हमारे देश के नेता है, इनकी अब इतनी औकात तो रही नही कि यह जीत सके, तो यह क्या करते हैं, यह भारत का पुराना फार्मूला यानि जुगाड़ तकनीकी के तहत भानुमति का कुनबा बना लेता है। लेकिन साहब परेशानी यहां पर भी वही है, आखिर कुछ तो बात हो जिसे लेकर हम कह सकें कि, हां भईया हम गांधी जी की नीतियों का अनुसरण कर रहे हैं। तो क्या होता है पार्टी के अंदर का एक नेता विदेश से कोई डील करता है, तो जूगाड़स्वरूप आई दूसरी पार्टी कहती है - हमारी नहीं सुन रहे हो तो मरो। तो एक पार्टी इस प्रकार संयुक्त रूप से गांधी के वाक्यों को दोहराती है (डील) करो या (नहीं मान रहे) मरो। &lt;br /&gt;आप लोग यह बात तो जानते ही हैं कि हम इक्कीसवीं सदी में जी रहे हैं, इस सदी की सबसे खास बात यह है कि इस सदी में कानून कोई नहीं तोड़ता (क्योंकि टूटे -फूटे को क्या तोड़ा जाए)। इस सदी में अपराध, भ्रष्टाचार और जो इस प्रकार के तमाम बाते गुजरे ज़माने में गलत मानी जाती थी, आज कल कानूनन कर दी गई हैं तो इससे क्या होता है गलत बातों में कमी आई है। अच्छा एक बात और इक्कीसवीं सदी तक पहुंचते-पहुंचते हमने भले ही कितनी भी तरक्की कर ली हो, लेकिन मजाल है कि कोई गांधी जी की कही हूई बातों को भूल जाए, सवाल ही पैदा नहीं होता, आज भी अगर कोई ईमानदारी या सच्चाई जैसी फालतू की बातों का अनुसरण करता है, तो तुरंत यानि तत्काल प्रभाव से उसके सामने दोहराया जाता है- करो या मरो।यह करो या मरो आज के परिप्रेक्ष्य में उस कब्ज़ के मरीज के समान है जिसकी यही स्थिति है कि भैया- करो या मरो।आप लोग क्या सोच रहे हैं, सोचने में समय व्यतीत मत कीजीए- जल्दी से देश के लिए कुछ करिए, अन्यथा.........&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2333254526940587404-7653175665728851943?l=mudda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mudda.blogspot.com/feeds/7653175665728851943/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2333254526940587404&amp;postID=7653175665728851943' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/7653175665728851943'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/7653175665728851943'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mudda.blogspot.com/2008/02/blog-post_19.html' title='करो या मरो'/><author><name>विकास शिशोदिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08157576148519764276</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='18' src='http://1.bp.blogspot.com/_yCbiUlApr1c/TMVfAgIbU7I/AAAAAAAAAVY/7kaK_w148Jg/S220/sing.png'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://bp3.blogger.com/_yCbiUlApr1c/R7vZX_xXi-I/AAAAAAAAAJ8/Bp3UCSFi4Y4/s72-c/india%2Bpolitics.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2333254526940587404.post-5535230528015807134</id><published>2008-02-18T03:47:00.001-08:00</published><updated>2008-02-18T03:47:47.995-08:00</updated><title type='text'>नोएडा का महाघोटाला - भाग-2</title><content type='html'>द ग्रेट इंडिया प्लेस के नाम से मशहूर यह उत्तर भारत का सबसे बड़ा मॉल बताया जाता है जिसके दो फ्लोर पर दुनिया की तमाम बड़ी कंपनियों के शोरुम हैं। तीसरे फ्लोर पर निर्माण कार्य चल रहा है जो लगभग पूरा हो चुका है। द ग्रेट इंडिया प्लेस को पूरी मस्ती के साथ देखने के लिए एक दिन कम पड़ता है। इस मॉल में प्रवेश के साथ ही इसके तामझाम यह बताने के लिए काफी हैं कि इसमें युवाओं के लिए विशेष इंतजाम हैं। जगह जगह बैठे प्रेमी युगलों की जोड़ी का नजारा अपने आप एक सबूत है। सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम हैं और फोटो खीचने की मनाही है। जनसुबिधा की चमक किसी भी पांचसितारा होटल से बेहतर है। द ग्रेट इंडिया प्लेसको देखकर आप भी कहेंगे खेल बड़ा है। &lt;br /&gt; ग्रेट इंडिया प्लेस को यूनिटेक अंतरराष्ट्रीय स्तर का मनोरंजन पार्क बताती है। एक ऐसी जगह जिससे भारत अब तर परिचित नहीं था। यह मनोरंजन सिटी का एक हिस्सा है जहां दुनिया के बेहतरीन रिटेल और इंटरटेनमेंट कांपलेक्स होंगें। 1,500,000 वर्गफीट में बना यह भारत का सबसे बड़ा रिटेल सेंटर है।&lt;br /&gt;  नियमानुसार मॉल बनाने के लिए प्राघिकरण अलग भूखंडों का चयन करके महंगी दरों पर आवंटन करता है। बानगी के तौर पर सेक्टर - 18 में इसी दौरान व्यावसायिक भूखंडों की नीलामी 5 लाख से 6 लाख (5 हजार प्रतिवर्ग मीटर) की दरों से गई थी, जबकि इन भूखंडों का एफ.ए.आर. मॉल को दिए गए एफ.ए.आर. से काफी कम होता है। मनोरंजन पार्क के नाम पर बनाए गए उत्तर भारत के इस विशाल मॉल की भूमि की कीमत का अनुमान लगाएं तो देश के एक बड़े घोटाले का पर्द ाफाश होता है। 21 एकड़ यानी लगभग 85 हजार वर्ग मीटर भूमि पर बने मॉल की भूमि की कीमत  5 लाख प्रतिवर्ग मीटर की दर से 4250 करोड़ बनती है। इसके अलावा शेष बची 120 एकड़ भूमि  का आकलन करके घोटाले के व्यापक आकार का अंदाजा लगाया जा सकता है। &lt;br /&gt;  ऐसे में, आश्चर्यजनक यह है कि भूखंड आवंटित करने व नक्शा स्वीकृत करने वाले अधिकारियों की कुंभकरणी नींद क्यों नहीं खुली कि मात्र 108 करोड़ में 140 एकड़ भूमि कैसे दे दी गई। ऐसा नहीं है कि इस महाघोटाले  को भाजपा व बसपा नीत सरकारों का ही संरक्षण प्राप्त था, बल्कि 25 अगस्त 2003 को मायावती सरकार के पतन के पश्चात सत्ता में आई मुलायम सिंह सरकार का आशीरवाद और संरक्षण भी इस कंपनी को मिलता रहा। पुरानी कहावत है कि चांदी की जूती भी अच्छी लगती है। मुलायम सिंह सरकार के दौरान भी समाजवादी पार्टी के एक विधायक ने यह मामला उठाने का प्रयास किया तो सपा हाईकमान ने उसे चुप रहने का निर्देश दिया, क्योंकि इस घोटाले के सूत्रधार और कंपनी के मालिकों के मधुर संबंध सरकार के दो बड़े नेताओं से हो चुके थे जो नोएडा के भाग्य का फैसला किया करते थे। सरकार में आते ही समाजवादी पार्टी के नेता इस घोटाले की जांच करवाने की घोषणा कर रहे थे, परंतु कंपनी के मालिकों से मुलाकात के बाद उनके सुर बदल गए। महाघोटाले का सिलसिला यहीं पर समाप्त नहीं होता, बल्कि इस कंपनी की हिस्सेदार कंपनी यूनिटेक को नोएडा में सैकड़ों एकड़ जमीन आवासीय व व्यावसायिक गतिविधियों के लिए आवंटित की गई। इसके अलावा प्रदेश में दो महत्वपूर्ण स्थानों पर उन्हें हाईटेक सिटी विकसित करने के लिए भी हजारों एकड़ भूमि आवंटित की गई।   &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(साभार प्रथम प्रवक्ता)  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2333254526940587404-5535230528015807134?l=mudda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mudda.blogspot.com/feeds/5535230528015807134/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2333254526940587404&amp;postID=5535230528015807134' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/5535230528015807134'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/5535230528015807134'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mudda.blogspot.com/2008/02/2.html' title='नोएडा का महाघोटाला - भाग-2'/><author><name>विकास शिशोदिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08157576148519764276</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='18' src='http://1.bp.blogspot.com/_yCbiUlApr1c/TMVfAgIbU7I/AAAAAAAAAVY/7kaK_w148Jg/S220/sing.png'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2333254526940587404.post-7608745204236986998</id><published>2008-02-16T01:12:00.000-08:00</published><updated>2008-02-18T04:13:19.795-08:00</updated><title type='text'>नोएडा का महाघोटाला  भाग-1</title><content type='html'>&lt;a href="http://bp0.blogger.com/_yCbiUlApr1c/R7apdfxXi9I/AAAAAAAAAJw/DvRYX2PxTbM/s1600-h/26052007282.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp0.blogger.com/_yCbiUlApr1c/R7apdfxXi9I/AAAAAAAAAJw/DvRYX2PxTbM/s320/26052007282.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5167503946664086482" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; नोएडा का यह एक एेसा जमीन घोटाला है जिसकी राजनाथ सिंह की सरकार में शुरुआत हुई और बाद की राज्य सरकारों में उसे पूरी तरह से अंजाम दिया गया। जो सिलसिला उस समय शुरु हुआ वह मायावती से होते हुए मुलायम सिंह के कार्यकाल में भी बदस्तूर जारी रहा। यह एक बेशकीमती जमीन को कौड़ियों के दाम लुटाने का मामला है। इसकी ढंग से अगर जांच की जाए तो पांच हजार करोड़ रुपए का घोटाला सामने आएगा। जमीन दी गई मनोरंजन पार्क के लिए और बन गया उस पर बड़ा सा मॉल। नियमों की अनदेखी और नेताओं - अफसरों और कारोबारियों की साठ-गांठ का ही है यह कमाल।&lt;br /&gt; नोएडा सेक्टर-18 के ठीक सामने सेक्टर-38 ए में करीब 140 एकड़ जमीन मनोरंजन पार्क के लिए आरक्षित की गई थी। वर्ष 2001 में समाचार पत्रों के जरिए इस जमीन पर मनोरंजन पार्क विकसित करने के लिए निविदाएं आमंत्रित की गई थीं। 17 जुलाई 2001 को नोएडा के अपर मुख्य कार्यपालक अधिकारी देवदत्त, महाप्रबंधक (वित्त) एस.के.सिंह, महाप्रबंधक संस्थागत विजय अग्रवाल, वास्तुविद ए.के.इंगले की उपस्थिति में इन निविदाओं को खोला गया। कुल छह निविदाओं में दिल्ली में अप्पू घर का संचालन करने वाली मै. इंटरनेशनल एम्यूजमेंट लि. की 108 करोड़ की निविदा पर चिंतन मनन करते रहे और उत्तर प्रदेश के अधिकारियों की शैली में इच्छुक पार्टियों से मोलभाव करते रहे। जिस समय इस बेशकीमती भूमि के आवंटन की प्रक्रिया चल रही थी, उस समय प्रदेश के औघोगिक विकास आयुक्त के पद पर बहुचर्चित अफसर अखंड प्रताप सिंह काबिज थे। आप को याद ही होगा कि उनका भ्रष्टाचार जैसे&lt;br /&gt;विवादों से बड़ा गहरा रिश्ता रहा है। वे बाद में प्रदेश के सर्वधिक विवादित मुख्य सचिव भी रहे और भ्रष्टाचार के आरोप में उन्हे सीबीआई ने पकड़ा।&lt;br /&gt; जिस समय इस घोटाले की नींव पड़ी तब उत्तर प्रदेश सरकार के मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह थे। उनकी सरकार ने उस जमीन को मनोरंजन पार्क बनाने के लिए  मै. इंटरनेशनल एम्यूजमेंट लि. को कुछ शर्तों सहित आवंटित कर दिया गया। इस कंपनी को यह सुविधा दी गई कि उस जमीन के 15 प्रतिशत हिस्से पर वह प्रोजेक्ट के समर्थन के लिए व्यावसायिक गतिविधियां संचालित कर सकती है। इसमे  एक शर्त यह थी कि निर्धारित 21 एकड़ जमीन का 30 प्रतिशत हिस्सा ही प्रोजेक्ट के लिए प्रयोग में लाया जा सकता है। जिसका एफ.ए.आर 1.5 होगा। नोएडा के अपर मुख्य कार्यपालक अधिकारी संजीव नायर ने अन्य शर्त सहित यह पत्र जारी कर दिया था। उन दिनों उत्तर प्रदेश में विधानसभा के चुनाव चल रहे थे और 14 फरवरी, 2002 को प्रथम चरण का मतदान होना था। परंतु आदर्श चुनाव आचार संहिता का पालन न कर अधिकारियों ने इस भूमि का आवंटन कर दिया। यह भी उल्लेखनीय है कि जिस मै. इंटरनेशनल एम्यूजमेंट लि. के नाम यह भूमि आवंटित की गई उसका पता बी.ए.-324 टैगोर गार्डन, नई दिल्ली-27 है। यह पता भारतीय जनता पार्टी के तत्कालीन प्रदेश महासचिव व विधायक ओमप्रकाश बब्बर का है और उनके पुत्र राकेश बब्बर इस कंपनी के निदेशक हैं। क्या इस आवंटन में उन्हे इसलिए प्राथमिकता दी गई कि वे भाजपा के हैं? उन्हें आनन फानन में आवंटन पत्र जारी कर दिया गया। सतही तौर पर भले ही इसमें पार्टी के तार जुड़े हुए दिखते हैं पर किस्सा उससे कहीं आगे का है।&lt;br /&gt; याद करिए कि उस चुनाव में राजनाथ सिंह के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार की शर्मनाक हार हो गई। इससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ा क्योंकि 3 मई, 2002 को उत्तर प्रदेश में तीसरी बार जब मायावती मुख्यमंत्री की कुर्सी पर आसीन हुईं तो इस मनोरंजन पार्क का रथ रुका नहीं। उसकी गतिविधियों में तेजी आई। सबसे बड़ा रहस्य तो यह है कि मायावती सरकार के कार्यकाल में जिस 4 फरवरी, 2003को नोएडा प्राधिकरण ने मै. इंटरनेशनल रिक्रिएशन पार्क प्रा. लि. से समझौता किया उसे इसका अधिकार ही नहीं था क्योंकि जमीन  इंटरनेशनल एम्यूजमेंट लि. को आवंटित की गई थी। सवाल यह है कि एक नई कंपनी से लीज का समझौता कैसे हो गया? यह निविदा की शर्त का खुला उल्लंघन था। क्या नोएडा प्राधिकरण ने तब यह काम किसी उपकार भाव से किया? सवाल यह भी है कि जिसे लीज पर वह जमीन गैरकानूनी तरीके से दी गई उसे मनोरंजन पार्क चलाने का क्या अनुभव था? &lt;br /&gt; नियमानुसार वहां बनना था-मनोरंजन पार्क। नोएडा में सेक्टर - 18 का अपना रुतबा है। उसके ठीक सामने के अवैध कारोबार पर नजर क्यों नहीं गई। ऐसा हो नहीं सकता कि इसे किसी अधिकारी ने न देखा हो या उसे न बताया गया हो। साफ है कि अफसरों की मिलीभगत से मॉल का नक्शा पास कराया गया। जिस अंधेरगर्दी से यह हुआ उसी तरह वहां एफ.ए.आर. के नियमों का मजाक उड़ाते हुए मॉल का निर्माण प्रारंभ हुआ। &lt;br /&gt; इस प्रोजेक्ट को यूनिटेक नामक कंपनी के साथ मिलकर बनाया गया है। यूनिटेक और इंटरनेशनल एम्यूजमेंट लि. की साझेदारी के कई मिसाल हैं। ग्रेट इंडिया प्लेस एक नमूना भर है। दिल्ली के रोहिणी इलाके में जापानी पार्क के साथ ही एडवेंचर आइलैंड और मेट्रो वॉक प्रोजेक्ट विकसित किया गया। इस प्रोजेक्ट की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है।&lt;br /&gt; एडवेंचर आइलैंड मनोरंजन पार्क का हिस्सा है और मेट्रोवॉक रिटेल सेंटर है। जी हां, कुछ उसी तरह ग्रेट इंडिया प्लेस को अंतरराष्ट्रीय स्तर का मनोरंजन पार्क बताकर एक अलग तरह का खेल खेला गया। रोहिणी के दोनों प्रोजेक्ट यूनिटेक और इंटरनेशनल एम्यूजमेंट लि. की 50 : 50 प्रतिशत साझेदारी के तहत तैयार की गई है।              &lt;br /&gt; (साभार प्रथम प्रवक्ता)                                                                                                                             &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;                                        शेष आगे...........................&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2333254526940587404-7608745204236986998?l=mudda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mudda.blogspot.com/feeds/7608745204236986998/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2333254526940587404&amp;postID=7608745204236986998' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/7608745204236986998'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2333254526940587404/posts/default/7608745204236986998'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mudda.blogspot.com/2008/02/blog-post_16.html' title='नोएडा का महाघोटाला  भाग-1'/><author><name>विकास शिशोदिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08157576148519764276</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='18' 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हो या बिहार का छपरा, एक प्राणी है जो सर्वव्याप्त है। मस्तमौला यह प्राणी सड़क से लेकर संसद तक हर जगह उनमुक्त होकर विचरण करता है। किसी माइके लाल में इत्ती हिम्मत भी नही है कि इसको उठाने की कोशिश कर सके। अभी कल ही की बात है, सड़क पे ये लंबा जाम लगा हुआ था, हमारी बदकिस्मती ऐसे मौके पर इतनी कामयाब रहती है कि उसने हमें पीछे रख छोड़ा था, तो साहब नज़र तो कुछ आ नही रहा था, थोड़ा सा आगे वालों से जानकारी जुटाई तो मालूम चला कि एक सांड महोदय हैं उन्हें रोड इतनी पसंद आ गई है कि वो उस पर आराम करना चाह रहे थे। और यह कंबख्त गाड़ी वाले पीं पीं करके उनके आराम में खलल डाल रहे है, बस इस बात पर सांड साहब को गुस्सा आ गया और लोकतांत्रिक शरीर में तानाशाही आत्मा ने प्रवेश कर डाला।&lt;br /&gt;अब साहब बर्दाश्त की भी एक हद होती है, एक तो कोई किसी से कुछ कह नहीं रहा है अपना आराम कर रहा है, औऱ यह गाड़ीवाले हैं कि लगे हैं उंगली करने में। भैया पूरे 3 घंटे में सांड साहब माने। &lt;br /&gt;साहब यह सांड वो प्राणी है जो पहले आराम से बदमाशी किया करता था, कभी कभार इसका उपयोग चुनावी के दौरान किया जाता था, फिर इसको लगा कि भैया यह कोन बड़ी चीज़ है राजनीति तो ससुरी सांडगिरी का ही काम है तो ये भी कूद पड़े मैदान में, और लो जीत भी गये, गाय जनता ने सोचा कि वैसे ही कौन से भले हो रहे हैं कम से कम ये अपनी तरह जमीन से जुड़कर बदमाशी तो किया करता है। अब साहब यह सांड भाई छुट्टे होकर राजनीति के गलियारों में घूमते हैं।&lt;br /&gt;सांड की सांडाई बताने में एक प्राणी का ज़िक्र करना तो भूल ही गया, तो ऐसा है कि भारत देश में सांड जितना खुला है उतना ही हक एक औऱ प्राणी को मिला है, यह है भांड। भांड एक ऐसा प्राणी है, जो राजे महाराजे के ज़माने से अपने कर्तव्य को निभाता आ रहा है, सत्ता की ताल में ताल ठोंकता भांड हमेशा खुश रहने वाला प्राणी है, चाहे गाली पड़े या ताली मिले। भांड का काम हंसते-हंसते सब ज़ब्त कर जाना है। यह जीने का एक ही सिद्धांत मानता है जहां बम वहां हम। यह सत्ता के सांडों को ज्ञान भी देता है औऱ चाशनी सी बातों में घुली हुई सानी देकर खुद को भी पोसता रहता है। भांड ने ही जामवंत के माफिक सांड को उसकी शक्ति का एहसास दिलाया है। &lt;br /&gt;आज के ज़माने में भैया ये ही है जो जमे हुए हैं औऱ लगातार सफलता को चूम रहे हैं। कई बार मुझे लगता है कि सांड बनने की औकात मेरी है नहीं, भांड बनने के तरीके मुझे मालूम नहीं है, यही कारण हैं कि मैं आज तक ऐवेंइ पड़ा हुआ हूं। भैया सांडगिरी हो या भांडगिरी सब टैलेंट की बात है, हर किसी के बस का रोग नहीं है। &lt;br /&gt;क्या कर सकते हैं, ईश्वर कला से हर किसी को थोड़े ना नवाज़ता है. तो भैया हमारे पास तो अफसोस करने के अलावा कोई चारा नहीं है। अगर आप में यह टैलेंट है तो देर मत कीजिए, अपनी इस कला को निखारिये देखिए फिर क्या कमाल होता है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2333254526940587404-4209888693178011107?l=mudda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mudda.blogspot.com/feeds/4209888693178011107/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2333254526940587404&amp;postID=4209888693178011107' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' 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