उत्तर प्रदेश की राजनीति में इन दिनों विचारधारा नहीं, व्यंजनधारा बह रही है। और इस धारा के प्रमुख साधक हैं—समोसा रसिक अखिलेश जी।
बिना चटनी के मलाई समोसा खाने वाले नेता जी ने अघोषित रूप से चुनावी यात्रा शुरू कर दी है। फर्क बस इतना है कि पहले रथ चलता था, अब प्लेट चल रही है। PDA का नारा अब प्लेट–डिश–अचार में बदल चुका है।
कानपुर पहुँचना भी यूँ ही नहीं था। जेड प्लस सुरक्षा के घेरे में समोसा खाना कोई मामूली काम नहीं—यह लोकतंत्र की सबसे जोखिम भरी जिम्मेदारी है। आखिर समोसे की परतों में ही तो रणनीति की परतें छिपी होती हैं!
उन्होंने खुद स्वीकार किया—
"हम पॉलिटिक्स करने वाले लोग हैं, तो समोसे के बहाने ही पॉलिटिक्स करेंगे।"
कम से कम ईमानदारी तो है—अब भाषण नहीं, नाश्ते से राजनीति होगी।
कानपुर में सामान्य वर्ग के मतदाता अहम हैं, लघु उद्योगों की भरमार है, हर गली में समोसे की खुशबू है। ऐसे में संदेश साफ है—
“जो समोसा तलेगा, वही भविष्य गढ़ेगा।”
समोसा अब सिर्फ आलू और मसाले का मेल नहीं रहा, यह सामाजिक समीकरणों का मिश्रण बन गया है। इटावा, कन्नौज, फर्रुखाबाद से बढ़ती राजनीतिक आंच अब कानपुर की कढ़ाई में तली जा रही है।
सत्तारूढ़ दल ने ‘लाल इमली’ का मुद्दा उछाला, पर जवाब में सपा ने ‘गरम इमली की चटनी’ परोस दी।
और चटनी हो या न हो, मलाई जरूर होनी चाहिए—यही नया घोषणापत्र है।
अब खबर है कि आगे मठा के आलू, गुलगुला, रेवड़ी और गुलाब जामुन भी चुनावी एजेंडे में शामिल होंगे।
मतदाता तय नहीं कर पा रहे—वोट डालें या डाइट प्लान बनाएं।
होली के बाद तापमान बढ़ेगा, तो राजनीतिक कढ़ाई भी और चढ़ेगी।
देखना यह है कि अंत में जनता को समोसा मिलेगा या सिर्फ खाली कागज़ की प्लेट।
फिलहाल लोकतंत्र की थाली सजी है—
और राजनीति, समोसे की तरह, बाहर से कुरकुरी और अंदर से गरम है।
