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Monday, August 30, 2010

याद रहे हिंदी की बोलियाँ ही उसकी ताकत हैं



याद हो तो...आज से करीब साठ साल पहले हमने एक जंग जीती है...आज़ादी की, उससे भी पहले गर याद हो तो..उससे सौ साल पहले एक बड़ी जंगी शिकस्त भी खाई है.ये बात हमें याद हो तो ये भी याद होगा उस शिकस्त की वजह क्या थी ? हार के तमाम कारणों में एक बड़ी वजह विभिन्न राज्यों और सेनाओं के बीच सुचारू रूप से संवाद ना हो पाना भी था.इसकी एक वजह जहान संवाद के लिए जरुरी माध्यम का ना होना था वहीं एक वजह भाषागत दूरियां भी थी.इसके सौ साल बाद जब हमें बाजी पलटने का मौका हाथ लगा तो हमने आज़ादी के आलावें भी बहुत कुछ हासिल किया.जिसमें भारत की एकता के साथ -साथ सुन्दर भारत का एक खुबसूरत ख़्वाब भी पाया और साथ ही पाई एक प्यारी सी भाषा हिंदी.जिसे विभिन्न बोलियों को मिलकर खड़ा किया गया था.जिसके जरिये हम पूरे देश के लोगों से आसानी से बातें कर सकते थे.एक ऐसी भाषा जिसमें भारत की विविधता पूर्ण संस्कृति,धर्म और संस्कृति की भी झलक दिखती है.लेकिन जैसा की होता है हर खुबसूरत ख्वाब कभी ना कभी टूटते ही हैं. वैसे ही भारत के सुन्दर भविष्य का ख़्वाब भी टुटा और साथ में ख़तम होती गई हिंदी की एकता और अखंडता भी. इस अखंडता पर ये संकट वाहरी ही नहीं बल्किं भीतरी भी है.इस संकट से निकले के लिए,अपनी भाषा को बचाने के लिए कोल्कता के संगठन 'अपनी भाषा' के प्रोफेसर अमरनाथ और डॉ. ऋषिकेश राय देश भर के बुद्धिजीवियों से संवाद कर रहे हैं.और इसी सिलसिले को आगे बढ़ाते हुवे वे एक गोष्ठी '' हिंदी उसकी बोलियाँ और संविधान की आठवीं अनुसूची '' दिल्ली में ''गाँधी शांति प्रतिष्ठान'' में 22 अगस्त को आयोजित किये मिलते हैं.जहाँ वे हिंदी पर छाए संकट की लोगों को याद दिलाते हैं...

संगोष्ठी दो सत्रों में आयोजित होती है.प्रथम सत्र का संचालन डॉ. ऋषिकेश राय करते हैं और अध्यक्षता वरिष्ठ कथाकार हिमांशु जोशी करते हैं.विषय प्रस्तावना में प्रोफेसर अमरनाथ अपनी चिंता लोगों के सामने रखते हैं.किस तरह कुछ दिनों पहले हिंदी की एक बोली मैथली को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कर हिंदी के समनांतर दर्जा दे दिया गया.उसके बाद हिंदी पट्टी के लोग अपनी अपनी बोली को संविधान के आठवीं अनुसूची में शामिल करने को लेकर आये दिन आन्दोलन कर रहे हैं.खतरे की तरफ वे इशारा करते हुवे कहते हैं - दरअसल बात सिर्फ इतनी नहीं है की किसी बोली को हिंदी के बराबर दर्जा दिया जा रहा है दरअसल बात ये है की बोली और भाषा के नाम पर कुछ लोग अपनी राजनितिक महत्वकांक्षा साध रहे हैं.आज यदि किसी बोली को भाषा का दर्जा दे दिया जाता है तो कल उस भाषा के आधार पर एक अलग प्रदेश की मांग उठ खड़ी होती है.इसके समर्थक उस बोली के तमाम साहित्यकार भी है क्योंकि आज उन्हें किसी वजह से आकादमिक पुरस्कार नहीं मिल पता तो. जब-तब वे अलग प्रदेश और अलग भाषा की बात उठाने लगते हैं.,जाहिर है प्रदेश बनने के बाद अलग से उस भाषा की एक आकादमी बनेगी और इन लेखकों को सम्मान मिलने में आसानी होगी. आगे कहते हैं खतरा सिर्फ यही नहीं है- हिंदी को राष्ट्रिय भाषा का दर्जा इस वजह से नहीं मिला की इसका साहित्य बहुत समृद्ध और विशाल है, बल्किं इस वजह से मिला की हिंदी क्षेत्र में बोले जानी वाली बोलियों के लोगों के संख्या बल को देखते हुवे ही इसे राष्ट्रिय भाषा होने का अवसर मिला.मगर अब ये अखंडता खतरे में है.क्योंकि मैथली के बाद छत्तीसगढ़ी,बुन्देली, राजस्थानी,भोजपुरी के इलाकों से इन्हें अलग भाषा का दर्जा दिए जाने की मांग उठने लगी है.यदि इन भाषाओं को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कर लिया जाता है तो जाहिर है हिंदी का रास्ट्रीय स्वरूप खतरे में पड़ जायेगा क्योंकि संख्या बल की वजह से ही तो हिंदी रास्ट्रीय भाषा है.ये एक साम्राज्यवादी शाजिस है ताकि भारत की अखंडता और एकता को तोडा जा सके..एक और गृह युद्ध में इसे धकेला जा सके.वे बताते हैं जहाँ जातिय चेतना मजबूत नहीं होती वहां समय समय पर विघटनकारी शक्तियां अपना सर उठती हैं.दुर्भाग्य से हिंदी जाति की जातिय चेतना मजबूत नहीं है.बोलियाँ ही हिंदी की शक्ति हैं. अपनी बोलियों से अलग होकर हिंदी कमजोर होगी ही, बोलियाँ भी अलग थलग हो कर कमजोर हो जाएँगी.बोलियों का विकास हिंदी के साथ जुड़कर रहने और उसमें रचनाकर्म के जरिये ही संभव है.हाँ यदि कोई समस्या है .बोलियों के लेखक और उनकी रचनाओं को यदि कोर्स की किताबों में पर्याप्त जगह नहीं मिलती तो वे इसके लिए अपनी आवाज उठा सकते हैं.लेकिन हिंदी से अलग होकर वे हिंदी को तो तोड़ेंगे ही साथ ही ये बोलियों के लिए भी खतरनाक स्थिति होगी..
पहले वक्ता के रूप में वरिष्ठ समीक्षक कमाल किशोर गोयल एक निबंध पढ़ते हैं .दरअसल अपनी अपनी बोलियों को आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग करने वाले लोग .अपने लिए और अपने लोगों के लिए सत्ता की मांग कर रहे हैं.हिंदी का संसार छिन्न-भिन्न करना हमारी राष्ट्रिय एकता और अखंडता के लिए घातक होगा.हिंदी और उसकी बोलियाँ एक दूसरे की पूरक हैं.प्रभाकर क्षोत्रिय हिंदी को एक नदी के समान बताते हैं जो अपनी राह में आने वाले हर छोटे बड़े तालाबों को अपने अन्दर जब्त कर लेती है.बोलियों की मांग पर वे कहते हैं अभी तो ये शुरुवात है हमने अपने आपको खंडो में बाटना तयं कर लिया है.वहीं प्रभाकर जी के वक्तव्य में से ये चीज भी निकाल कर आती है की किस तरह हम तकनीक से पुर्वाहग्रसित हैं,उनकी ये चिंता है की आज कल हिंदी रोमन में लिखी जा रही है.शायद ये बात उन्हें नहीं मालूम की इसी वजह से कितने सारे लोग अपने आपको हिंदी में व्यक्त कर पा रहे हैं.लिखने दीजिये उन्हें रोमन में एक ना एक दिन वे देवनागरी में भी लिखने ही लगेंगे.हाँ जबरदस्ती आपने लोगों पर देवनागरी में लिखने का दबाव डाला तो शायद ये लोग कभी भी हिंदी में ना लिख पायें.क्योंकि ये वे लोग हैं जो अपना हर काम इंग्लिश में ही करने के आदि हैं लेकिन ये मातृभाषा से जुड़ाव ही है जो उन्हें हिंदी में लिखने को प्रेरित करती है. अनन्त राम त्रिपाठी हमें संविधान निर्माण की बैठक में ले जाते हैं.जहाँ डॉ. भीमराव आंबेडकर लोगों संविधान सभा में सभी से दरख्वास्त कर रहे हैं - मैं आप सबसे निवेदन करता हूँ.कि हिंदी राष्ट्र भाषा होने के साथ साथ प्रान्तों कि भाषा भी हिंदी होनी चाहिए...कहते हैं वे यदि उस वक़्त आंबेडकर का ये निवेदन स्वीकार कर लिया जाता तो आज हमें ये चिंतन मनन करने कि जरुरत नहीं होती.
बोलियों कि समस्याओं पर देवेन्द्र चौबे प्रकाश डालते हैं.आखिर क्यों बोलियों के लोग अपनी बोली को संविधान के आठवीं अन्सुची में शामिल करने कि मांग ना करें जब भोजपुरी के बड़े कवि 'भिखारी ठाकुर '' को रामचंद्र शुक्ल अपनी किताब 'हिंदी साहित्य के इतिहास में जगह नहीं देते तो जाहिर भोजपुरी के लोग अपने कवि और बोली के लिए संविधान कि आठवीं अनुसूची में शामिल करने कि मांग करेंगे ही. .हिंदी अकेड्मियों को लताड़ लगते हैं-जाहिर है अकेडमिक हिंदी के सवालों को हाल करने में नाकाम रही.हिंदी को बचाए रखना है तो बोलियों को हिंदी के ढांचे में पर्याप्त स्पेश दे नहीं तो वे अपने स्पेश के लिए लड़ेंगे. हम सिर्फ अच्छा सुनना चाहते हैं अपनी गलतियों कि तरफ ध्यान नहीं देना चाहते. आयोजन कि एक सबसे बड़ी कमी मुझे ये दिखी कि यहाँ बोलियों कि समस्याओं पर देवेन्द्र चौबे के बाद कोई बोलने वाला नहीं था जबकि उनकी समस्याओं पर भी प्रकाश डालने वाले और वक्ता होने चाहिए थे.इसके बाद मृदुला सिन्हा अपनी चिंता में ये जाहिर करती हैं कि मैथली के अलग होने के बाद विद्यापति को यदि कोर्स से हटाया जाता है तो हिंदी का ये दुर्भाग्य होगा कि इतना अच्छा वर्णन पढने से वे वंचित हो जायेंगे.अध्यक्षीय उद्बोधन से पहले अपनी भाषा कि कि पत्रिका '' भाषा विमर्श'' का लोकार्पण प्रभाकर क्षोत्रिय,चित्र मुगदल और हिमांशु जोशी करते हैं.अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में हिमांशु जोशी इस देश को विडम्बनाओं का देश बताते हैं.एक तरफ हम जहाँ चीजों को स्थापित करते हैं दूसरी तरफ उसे हमीं विखंडित भी करते हैं.रचनाकर्म की आवश्यकता पर वे बल देते हैं साथ ही बताते हैं हिंदी गानों की मिठास भोजपुरी से ही आई है.जब हम गाते हैं तो कभी नहीं लगता की ये हिंदी नहीं बल्किं कोई और बोली ,कोई और भाषा है.भोजपुरी का ही स्वरूप है हिंदी और हिंदी का ही स्वरूप है भोजपुरी ये अलग नहीं हो सकते.ये जो हमें अलग अलग करने की शाजिसें चल रही हैं इनके पीछे पश्चिमी दुनिया का हाथ है.वे साफ शब्दों में बताते हैं - ''हिंदी का होना होने के लिए भोजपुरी, मैथली,अवधी, वर्ज ,राजस्थानी और हरियाणवी का होना भी जरुरी है''..
इसके बाद भोजन आवकाश के बाद दूसरे सत्र की कार्यवाही शुरू होती है.जिसमें मंच का संचालन श्री भगवान सिंह करते हैं और अध्यक्षता डॉ.कैलाश पन्त करते हैं.तमाम वक्ता अपने -अपने वक्तव्य में हिंदी पर छाए संकट पर चिंता जाहिर करते हैं.लेकिन उबाल तब आता है जब वेद प्रताप वैदिक मुद्दे पर बात ना कर मंच का इस्तेमाल अपने अजेंडे का प्रोपेगेंडा फैलाने के लिए करते हैं.किसी के ये कहने पर सर आप सब्जेक्ट से हट कर बोल रहे हैं.पर वे अपने आपे से बाहर हो जाते हैं यहाँ तक की वे मंच की गरिमा और लोकतान्त्रिक मूल्यों की भी तिलांजली देते हुवे मंच से नीचे आकर शायद असहमति वाली आवाज का कलर पकड़ना चाहते हैं.किसी तरह उन्हें मंच के संचालक श्री भगवान सिंह रोकते हैं.आज कल हर सेमिनार का नजारा है ये जहाँ वक्ता अपने से असहमति रखने वाली आवाज को अपने आक्रामक रुख के जरिये दबाना चाहता है.इसके बाद प्रोफेसर चमनलाल आते हैं वे अभी बोलना शुरू ही करते हैं की उनके लिए वक़्त समाप्ति की घोषणा कर दी जाती है.लगता है जैसे आयोजक ये पहले से ही मान बैठे हैं कि फलां वक्ता सही बोलते हैं और फ़ला सही नहीं बोलेंगे.वैदिक जी को जहाँ बोलने का निश्चित समय से आधिक समय दिया जाता है.जबकि वे सब्जेक्ट से हट कर बोलते हैं .बोलते क्या हैं कुछ कुछ प्रवचन से करते हैं.उनके लिए कोई समय सीमा नहीं है .जब प्रोफ़ेसर चमनलाल जिन्हें स्टुडेंट्स सुनना चाहते हैं उन्हें बोलने का पूरा मौका नहीं दिया जाता जबकि वे मुद्दे पर ही बातें कर रहे होते हैं.इस गरमा गर्मी के बाद कई वक्ता अपनी बात रखते हैं जिनमें अजय तिवारी ,चित्र मुगदल,कृस्नदत्त पालीवाल,परमानद पंचाल आदि .मगर दूसरे सत्र की महफ़िल लुटते हैं इंदौर से आये प्रभु जोशी माहौल में आई गर्मीं को उनकी शांत और गंभीर आवाज़ धीरे धीरे ठंडा करती है वे बताते हैं कैसे कैसे साम्राज्यवादी ताकतें हमारी भाषा और एकता पर हमला कर रही हैं.उनकी आवाज़ उनके टीवी से जुड़ाव की भी कहानी कहती है.आखिर में कैलाश पन्त चीजों को समेटे हुवे कहते हैं -दरअसल हिंदी के खिलाफ शाजिस का माहौल तभी पैदा कर दिया गया जब संविधान में ''इंडिया दैट इज भारत '' कहा गया ...वे सवाल करते हैं क्या कभी किसी प्रापर नउन का ट्रांसलेशन होता है?
पूरी संगोष्ठी को देखें तो ये कह सकते हैं ये एक सफल गोष्ठी रही ''अपनी भाषा ''के लोग जिस उद्देश्य से आये थे उसमें वे सफल होते हैं.वे ये याद दिलाने में कामयाब जरुर होते हैं- '' याद रहे हिंदी की बोलियाँ ही उसकी ताकत हैं''..हिंदी और उसकी बोलियों को अलग थलग होने की चिंता से वे दिल्ली के बुद्धिजीवियों को चिन्तित जरुर करते हैं.लेकिन वहीं जरा व्यापक दृष्टीकोण से देखें तो ये संगोष्ठी आगे की लड़ाई कैसे हो? उसका तरीका क्या हो ?इस बारे में कोई दिशा दिखने में असफल दिखती है..
-अंजुले श्याम मौर्य
anjuleshyam@gmail.com

Wednesday, June 30, 2010

बनियों की गली





सैयद जैगम इमाम (दोस्तों, नवोदित साहित्यकार सैयद जैगम इमाम की 30 नवम्बर 2009 को लोकार्पित इंकलाबी किताब “दोज़ख़” को मशहूर प्रकाशक राजकमल प्रकाशन ने बैस्ट सेलर की श्रेणी में शुमा...र किया है )

गली में बनियों का राज था। ढेर सारी दुकानें, आढतें और न जाने कितने गोदाम। सब के सब इसी गली में थे। बनिए और उनके नौजवान लडके दिन भर दुकान पर बैठे ग्राहकों से हिसाब किताब में मसरुफ रहते। शुरु -शुरु में वो इस गली से गुजरने में डरती थी, न जाने कब किसकी गंदी फब्‍ती कानों को छलनी कर दे। फ‍िर क्‍या पता किसी का हाथ उसके बुरके तक भी पहुंच जाए। डरते सहमते जब वो इस गली को पार कर लेती तब उसकी जान में जान आती। मगर डर का यह सिलसिला ज्‍यादा दिनों तक नहीं चला। उसने गौर किया ग्राहकों से उलझे बनिए उसकी तरफ ज्‍यादा ध्‍यान नहीं देते। हां इक्‍का दुक्‍का लडके उसकी तरफ जरुर देखते मगर उनकी जिज्ञासा उसके शरीर में न होकर के उस काले बुर्के में थी जिससे वो अपने को छुपाए रखती थी।
वो पढती नहीं थी, छोटी क्‍लास के बच्‍चों को पढाती थी। तमाम शहर में मकान तलाशने के बावजूद जब उसके अब्‍बा को मकान नहीं मिला तो हारकर इस बस्‍ती का रुख करना पडा। अब्‍बा ने मशविरा दिया था ''बेटी घर से बाहर न निकलो'' मगर उनकी आवाज में ज्‍यादा दम नहीं था। घर में कमाने वाला कोई न था फ‍िर वो कुछ रुपयों का इंतजाम कर रही थी तो इसमें बुरा क्‍या था। दिन गुजर रहे थे उसके स्‍कूल जाने का सिलसिला जारी था। उसने नोट किया इधर बीच बनियों की गली के ठीक बाद पडने वाले चौराहे पर पास के मदरसे के तीन चार लडके रोज खडे रहते हैं। उसने ज्‍यादा ध्‍यान नहीं दिया। दिल में एकबारगी आवाज उठी , भला इनसे क्‍या डरना। एक दिन अजीबो गरीब बात हुई। चौराहे पर एक लडका उसके ठीक सामने आ गया। हाथ उठाकर बडी अदा से कहा अस्‍सलाम आलेकुम। वो चौंक गई। उसके लडकों से इस तरह की उम्‍मीद कतई नहीं थी। उसने कोई जवाब नहीं दिया। कलेजा थर थर कांप रहा था। वापसी में भी वही लडके उसके सामने खडे थे। उसने घबरा कर तेज तेज चलना शुरु कर दिया। लडके उसकी तरफ बढे मगर वो फटाक से बनियों की गली में घुस गई। लंबी -लंबी दाढी, सफाचट मूंछ ओर सिर पर गोल टोपी रखने वाले लडकों के इरादे उसे वहशतनाक लगे। रात को वो सो नहीं सकी। रात भर जहन में यही ख्‍याल आता रहा कि कल क्‍या होगा। उसने ख्‍वाब भी देखा , बडी दाढी वाले एक लडके ने उसका दुपट्टा खींच लिया है।
स्‍कूल जाने का वक्‍त हो गया था। वो दरवाजे तक गई मगर फ‍िर लौट आई। आज फ‍िर बदतमीजी का सामना करना पडा तो.....। उसने अब्‍बा से दरख्‍वास्‍त की, उसके साथ स्‍कूल तक चलें। उसने खुलकर कुछ नहीं कहा। अब्‍बा ने भी कुछ नहीं पूछा। मगर उन्‍हें बनियों पर बेतहाशा गुस्‍सा आया। दांत किचकिचाते हुए उन्‍होंने अंदाजा लगा लिया कि बनिये के किसी लडके ने उनकी बेटी को छेडा है। बेटी को गली के पार पहुंचाने के बाद वो वापस लौटने लगे। चौराहे पर अभी भी वो लडके खडे थे। उसने अब्‍बा से स्‍कूल तक चलने की बात कही। आज लडके कुछ नहीं बोले। वापसी में उसका दिल जोर जोर से धडक रहा था। मगर नहीं चौराहे पर लडके नदारद थे। उसने खुदा का शुक्र अदा किया। घर पहुंची तो अम्‍मा उसकी परेशानी का सबब पूछ रहीं थीं। अम्‍मा बार बार बनियों को गाली भी दे रहीं थीं। उन्‍होंने उसे गली छोडने की सलाह भी दी। मगर वो कुछ नहीं बोली।
आज अब्‍बा घर नहीं थे। उसे पहले की तरह अकेले स्‍कूल जाना था। गली से चौराहे पर पहुंचते वक्‍त उसका कलेजा धाड धाड बज रहा था। चौराहे पर लडके हमेशा की तरह उसके इंतजार में खडे थे। वो हिम्‍मत बांधकर आगे बढी मगर फ‍िर एक लडका उसके सामने आ गया। उसके बढने के अंदाज ने उसकी रीढ में सिहरन पैदा कर दी। उसके मुंह से चीख निकल गई। वो वापस बनियों की गली की तरफ दौड पडी। गली के बनिये सारा तमाशा देख रहे थे। शरीफ लडकी से छेडछाड उन्‍हें रास नहीं आई। गली के नौजवान मदरसों के इन लुच्‍चों की तरफ दौड पडे। जरा सी देर में पूरी गली के बनिये शोहदों की धुनाई कर रहे थे। भीड लडकों को पीट रही थी और वो चुपचाप किनारे से स्‍कूल निकल गई। वापस में चौराहा खामोश था। लडके नदारद थे। गली से गुजरते वक्‍त उसे ऐसा लगा कि हर कोई उसे देख रहा है। मगर ये आंखें उसे निहारने के लिए नहीं उठी थीं। ये सहानूभूति और गर्व से उठी नजरें थीं जो उसे बता रहीं थीं कि चिंता मत करो हम अपनी बहू बेटियों के साथ छेडछाड करने वालों का यही हश्र करते हैं।
घर पहुंची तो देखा अब्‍बा एक मौलवी से गूफ्तगू कर रहे हैं। ये उस मदरसे के प्रिंसिपल थे जहां मार खाने वाले लडके तालीम हासिल कर रहे थे। अब्‍बा ने उसे हिकारत की नजर से देखा। उसे कुछ समझ नहीं आया। कमरे में गई अम्‍मा से मसला पूछने। जबान खोली ही थी कि एक थप्‍पड मुंह पर रसीद हो गया।
उसे समझ नहीं आया कि आखिर माजरा क्‍या है। अम्‍मा सिर पटक रहीं थीं, उसने खानदान के मुंह पर कालिख पोत दी। अम्‍मा बयान कर करके रोए जा रहीं थीं। उनकी बुदबुदाती आवाज में उसे सिर्फ इतना समझ आया, बनिए के लडकों से उसकी यारी थी जिन्‍होंने उन शरीफ तालिबे इल्‍मों को पीट दिया। उसका कलेजा मुंह को आ गया, आंखों में आंसू की बूंद छलक आई। अगली सुबह घर में खाना नहीं पका। उसके स्‍कूल जाना छोड दिया।

नक्सलबाड़ी आंदोलन

-- नक्सलबाड़ी आंदोलन --

संक्षिप्त इतिहास

नक्सलवाद का जन्म पिछली सदी के साठ के दशक में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी आंदोलन की कोख से हुआ। नक्सलबाड़ी गांव के कुछ छोटे किसानों ने स्थानीय सामंतों के शोषण के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह किया और उन्हें सजा दी। नक्सलबाड़ी आंदोलन को बौद्धिक वर्ग का जबरदस्त समर्थन मिला, तो इसके पीछे वक्त का तकाजा और व्यवस्था से मोहभंग के कारण उपजी रिक्तता को भरने की आक्षंका भी थी। चारु मजूमदार और कानू सान्याल जैसे नेताओं के नेतृत्व में इसका विस्तार पूरे पश्चिम बंगाल में हुआ। लेकिन सत्तर के दशक के दमन और राज्य में वामपंथी पार्टी के सत्तारुढ़ होने के बाद भूमि सुधार कार्यक्रम के लागू होने के साथ यह आंदोलन पड़ोसी राज्यों की ओर कूच कर गया। पिछले करीब तीन दशक में नक्सली आंदोलन में आई विकृतियों ने उसे बौद्धिक समर्थन से भले ही महरूम किया हो, पर समाज के दबे-कुचले वर्गों, आदिवासियों में उसने काफी पैठ बना ली है। यही कारण है कि आज देश के दर्जन भर से अधिक राज्यों के लिए नक्सलवाद सिरदर्द बन गया है।

-- प्रमुख नक्सली गुट --

नक्सलवादी आंदोलन से जुड़े तीन मुख्य संगठन हैं

नक्सली आंदोलन से जुड़े तीन संगठन मुख्य रूप से सक्रिय रहे हैं- एमसीसी (माउस्टि कम्युनिस्ट सेंटर)- वर्ष १९८४ में इस गुट को बिहार में ठोस पहचान मिली। बाद में इसने अनेक बर्बर नरसंहारें को अंजाम दिया। इसका प्रभाव बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में रहा है। पीडीब्ल्यू (पीपुल्स वार ग्रुप)- वर्ष १९८० में कोंडपल्ली सीतारमैया ने तेलंगाना में इस उग्रवादी संगठन की नींव रखी। आंध्र प्रदेश में इसका व्यापक प्रभाव है। जनशक्ति- यह गुट भी आंध्र प्रदेश में ही सक्रिय रहा है। लेकिन बाद में ये तीनों संगठन सीपीआई (माओस्ट) नामक संगठन की छतरी के नीचे एकत्रित हो गए।

(साभार अमर उजाला)

Friday, June 25, 2010

फ्लाईओवर।



यह लेख उस छात्र की कॉपी से लिया गया है, जिसे निबंध लेखन प्रतियोगिता में पहला पुरस्कार मिला है। निबध का विषय था - फ्लाईओवर।

फ्लाईओवर का जीवन में बहुत महत्व है, खास तौर पर इंजीनियरों और ठेकेदारों के जीवन में तो घणा ही महत्व है। एक फ्लाईओवर से न जाने कितनी कोठियां निकल आती हैं। पश्चिम जगत के इंजीनियर भले ही इसे न समझें कि भारत में यह कमाल होता है कि पुल से कोठियां निकल आती हैं और फ्लाईओवर से फार्महाउस।

खैर, फ्लाईओवर से हमें जीवन के कई पाठ मिलते हैं, जैसे बंदा कई बार घुमावदार फ्लाईओवर पर चले, तो पता चलता है कि जहां से शुरुआत की थी, वहीं पर पहुंच गए हैं। उदाहरण के लिए ऑल इंडिया इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज के पास के फ्लाईओवर में बंदा कई बार जहां से शुरू करे, वहीं पहुंच जाता है। वैसे, यह लाइफ का सत्य है, कई बार बरसों चलते -चलते यह पता चलता है कि कहीं पहुंचे ही नहीं।

फ्लाईओवर जब नए-नए बनते हैं, तो एकाध महीने ट्रैफिक स्मूद रहता है, फिर वही हाल हो लेता है। जैसे आश्रम में अब फ्लाईओवर पर जाम लगता है, यानी अब फ्लाईओवर पर फ्लाईओवर की जरूरत है। फिर उस फ्लाईओवर के फ्लाईओवर के फ्लाईओवर पर भी फ्लाईओवर चाहिए होगा। हो सकता है कि कुछ समय बाद फ्लाईओवर अथॉरिटी ऑफ इंडिया ही बन जाए। इसमें कुछ और अफसरों की पोस्टिंग का जुगाड़ हो जाएगा। तब हम कह सकेंगे कि फ्लाईओवरों का अफसरों के जीवन में भी घणा महत्व है।

दिल्ली में इन दिनों फ्लाईओवरों की धूम है। इधर से फ्लाईओवर, उधर से फ्लाईओवर। फ्लाईओवर बनने के चक्कर में विकट जाम हो रहे हैं। दिल्ली गाजियाबाद अप्सरा बॉर्डर के जाम में फंसकर धैर्य और संयम जैसे गुणों का विकास हो जाता है, ऑटोमैटिक। व्यग्र और उग्र लोगों का एक ट्रीटमेंट यह है कि उन्हें अप्सरा बॉर्डर के जाम में छोड़ दिया जाए।

फ्लाईओवर बनने से पहले जाम फ्लाईओवर के नीचे लगते हैं, फिर फ्लाईओवर बनने के बाद जाम ऊपर लगने शुरू हो जाते हैं। इससे हमें भौतिकी के उस नियम का पता चलता है कि कहीं कुछ नहीं बदलता, फ्लाईओवर का उद्देश्य इतना भर रहता है कि वह जाम को नीचे से ऊपर की ओर ले आता है, ताकि नीचे वाले जाम के लिए रास्ता प्रशस्त किया जा सके।

फ्लाईओवरों का भविष्य उज्जवल है। कुछ समय बाद यह सीन होगा कि जैसे डबल डेकर बस होती है, वैसे डबल डेकर फ्लाईओवर भी होंगे। डबल ही क्यों, ट्रिपल, फाइव डेकर फ्लाईओवर भी हो सकते हैं। दिल्ली वाले तब अपना एड्रेस यूं बताएंगे - आश्रम के पांचवें लेवल के फ्लाईओवर के ठीक सामने जो फ्लैट पड़ता है, वो मेरा है। कभी जाम में फंस जाएं, तो कॉल कर देना, डोरी में टांग कर चाय लटका दूंगा। संवाद कुछ इस तरह के होंगे - अबे कहां रहता है आजकल रोज अपने फ्लैट से पांचवें लेवल का जाम देखता हूं, तेरी कार नहीं दिखती। सामने वाला बताएगा - आजकल मैं चौथे लेवल के फ्लाईओवर में फंसता हूं। अबे पांचवें लेवल के जाम में फंसा कर, वहां हवा अच्छी लगती है। अबे, ले मैं तेरे ऊपर ही था, पांचवें वाले लेवल पर और तू चौथे लेवल पर, कॉल कर देता, तो झांककर बात कर लेता। आने वाले टाइम में दिल्ली वाले अपने मेहमानों को फाइव डेकर जाम दिखाने लाएंगे।

Thursday, June 17, 2010

देश में प्रमुख आतंकी घटनाएं


प्रमुख ब्लास्ट-- पुणे में आतंकी हमला, ९ की मौत –
-- मुंबई हमला – ( सशस्त्र आतंकियों ने आठ जगहों पर गोलीबारी की )
-- दिल्ली ब्लास्ट – ( ३० मिनट के भीतर पांच विस्फोट)

-- अहमदाबाद ब्लास्ट -- ( ७० मिनट में १६ ब्लास्ट से थर्राया शहर)
-- जयपुर ब्लास्ट – (७० से ज्यादा की मौत, २०० घायल, देश भर में सुरक्षा अलर्ट)
-- मुंबई बम ब्लास्ट (१२ मार्च १९९३) – (२५० लोगों की मौत, ७०० घायल)
-- कोयंबटूर बम ब्लास्ट (१४ फरवरी १९९८) – (५८ लोगों की मौत, २०० घायल)
-- बैंगलौर इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस पर हमला (२००५) – (एक व्यक्ति की मौत, चार घायल)
-- दिल्ली बम ब्लास्ट (२९ अक्टूबर २००५) – (५९ की मौत, २०० घायल)

-- घाटकोपर बम ब्लास्ट (२ दिसंबर २००२) – (२ लोगों की मौत, ५० घायल)




ट्रेन हादसे

-- बैंगलोर एक्सप्रेस ट्रेन हादसा (२१ दिसंबर २००२) – (२० लोगों की मौत, ८० घायल)
-- जौनपुर ट्रेन हादसा (२८ जुलाई २००५) – (१३ लोगों की मौत, ५० घायल)
-- समझौता एक्सप्रेस बम विस्फोट हादसा (१९ फरवरी २००७) – (६८ लोगों की मौत, ५० घायल)
-- मुंबई ट्रेन हादसा (११ जुलाई २००६) – (२०९ लोगों की मौत, ७१४ घायल)
-- ब्रह्म्पुत्र ट्रेन हादसा (३० दिसंबर १९९६) – (३३ लोगों की मौत)

मंदिरों पर हमला

-- राम जन्म भूमि पर हमला (५ जुलाई २००५) – (५ आतंकियों समेत १ नागरिक की मौत)
-- वाराणसी केसंकट मोचन मंदिर पर हमला ( ७ मार्च २००६ ) – (२८ लोगों की मौत, १०१ घायल)
-- अक्षरधाम मंदिर पर हमला (२५ सितंबर २००२) – (२९ लोगों की मौत, ७९ घायल)
-- रघुनाथ मंदिर पर हमला (३० मार्च २००२) – (७ लोगों की मौत, २० घायल)



मसजिदों पर हमला

-- मालेगांव ब्लास्ट (८ सितंबर २००६) –(३७ लोगों की मौत, १२५ घायल)
-- हैदराबाद मक्का मसजिद ब्लास्ट (१८ मई २००७) – (१६ लोगों की मौत, १०० घायल)


अन्य हमले

-- सीआरपीएफ सेंटर पर हमला (१ जनवरी २००८) – (सात जवानों समेत आठ की मौत)

-- अब्दुल गनी की मीटिंग में हमला – (मई २००२ में आतंकका शिकार बने लोन)




(साभार अमर उजाला)

Wednesday, June 16, 2010

देश में प्रमुख आतंकी संगठन

इंडियन मुजाहिद्दीन का परिचय
कई संगठनों का मिलाजुला रूप इंडियन मुजाहिद्दीन देश में जड़ें जमाए कई संगठनों का मिलाजुला रूप है। इन संगठनों में स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट्स ऑफ इंडिया (सिमी), पाकिस्तान स्थित आतंकवादी संगठन लश्कर-ए-तैयबा और बांग्लादेश स्थित हरकत उल जिहाद-ए-इस्लामी (हूजी) से जुड़े आतंकी शामिल हैं।

लश्कर-ए-तैयबा का परिचय
दक्षिण एशिया का सबसे बड़ा आतंकवादी संगठन
लश्कर-ए-तैयबा दक्षिण एशिया का अति सक्रिय व बहुत बड़ा आतंकवादी संगठन है। इस संगठन की स्थापना मोहम्मइ सईद ने अफगानिस्तान के कुनर प्रांत में की थी। वर्तमान में लश्कर-ए-तैयबा लाहौर और पाकिस्तान में स्थित है और पाक अधिकृत कश्मीर में इसके बहुत सारे मिलिटेंट कैंप हैं। लश्कर-ए-तैयबा ने भारत के खिलाफ बहुत सारी आतंकी वारदातों को अंजाम दिया है। इस संगठन का लक्ष्य कश्मीर से भारत का आधिपत्य समाप्त करना है। लश्कर के कुछ सदस्यों पर मुशर्रफ की नीतियों के खिलाफ, विशेषकर करांची में हमले करने के आरोप भी लगे हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्रिटेन, रूस, ऑस्ट्रेलिया, भारत और पाकिस्तान ने इस संगठन को प्रतिबंधित किया हुआ है। कुछ खुफिया एजेंसियों के अनुसार पाकिस्तान द्वारा लगाए गए प्रतिबंध से बचने के लिए लश्कर-ए-तैयबा ने २००२ में अपना नाम बदलकर जमात-अल-दवात रख लिया है।

इसलामिक हुजी का परिचय
१९८० में हुई थी स्थापना
आतंकी संगठन हरकत-उल-जिहाद-ए-इसलामी की स्थापना १९८० में की गई। दो पाकिस्तानी संग्ठन जमात-उल-उलेमा-ए-इसलामी (जुल) और तबलीग-ए-जमात(तीज) को मिलाकर हुजी का गठन हुआ।

हिजबुल मुजाहिद्दीन का परिचय
खूखांर आतंकी संगठन है हिजबुल
आतंकवादी संगठन हिजबुल मुजाहिद्दीन की स्थापना १९८९ में पाकिस्तान में हुई थी। वर्तमान में यह पाकिस्तान व पाक अधिकृत कश्मीर से आतंवादी गतिविधियों को संचालित करता है और भारत प्रशासित कश्मीर में अति सक्रिय है। संगठन अपने आप को स्वतंत्रता सेनानी मानता है जबकि भारव व दूसरे मुल्कों की नजरों में यह एक खूंखार आतंकवादी संगठन है। हिजबुल मुजाहिद्दीन का मुख्यालय पाक अधिकृत कश्मीर की राजधानी मुजफ्फराबाद में है। ऐसा माना जाता है कि पाकिस्तानी खूफिया एजेंसी आईएसआई के उकसाने पर आतंकवादी संगठन अल-बदर से अलग होकर कुछ आतंकवादियों ने पृथक हिजबुल मुजाहिद्दीन संगठन की नींव रखी थी। वर्तमान समय में इस संगठन का मुखिया सईद सलाउद्दीन है। ३० नवंबर २००५ को यूरोपीय यूनियन की आतंकवादी संगठनों की सूची में हिजबुल मुजाहिद्दीन को भी शामिल किया गया। संयुक्त राष्ट्र ने भी आतंकवादी संगठन के रूप में इसकी घोषणा कर चुका है। यूरोपीय यूनियन के सदस्यों ने इस संगठन को आर्थिक मदद और दूसरे अन्य सामान मुहैया कराने पर पाबंदी लगाई हुई है। वर्तमान में हिजबुल मुजाहिद्दीन कश्मीर से संचालित सबसे बड़ा आतंकवादी संगठन है। इसके साथ ही दोनों ओर के कश्मीर से इसे जबरदस्त समर्थन प्राप्त है। यही कारण है कि हिजबुल मुजाहिद्दीन कश्मीर का सबसे सक्रिय आतंकवादी संगठन बन गया है। संगठन का नाम- हिजबुल मुजाहिद्दीन संक्षिप्त नाम- एचएम स्थापना वर्ष- १९८९ मुख्यालय- मुजफ्फराबाद सदस्य संख्या- १५०० मुखिया- सईद सलाउद्दीन इलियास पीर साहिब प्रभावी क्षेत्र- पुंछ, रजौरी और डोडा जिले। दूसरे नेता- मास्टर अहसान धर, गुलाम रसूल शाह इलियास इमरान राही, अब्दुल हमीद बट्ट इलियास बॉम्बर खान, मुस्तफा खान। संगठन स्वरूप- जिहादी

लश्कर-ए-कहर का परिचय
आतंक की दुनिया में सबसे नया नाम
लश्कर-ए-कहर से दुनिया उस समय रू-ब-रू हुई जब इस आतंकवादी संगठन ने ११ जुलाई २००६ में मुंबई की लोकल ट्रेन में हुए सात बम विस्फोटों की जिम्मेदारी ली। हालांकि यह संगठन बहुत ही छोटा है और आतंकवादी संगठनों में सबसे नया नाम है। लेकिन इस संगठन के तार अल-कायदा और लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े हुए हैं। भारतीय खूफिया एजेंसी का मानना है कि लश्कर-ए-कहर एक फर्जी संगठन है और इसका कोई अस्तित्व है।

जैश ए मोहम्मद का परिचय
२००० में हुई थी स्थापना
जम्मू-कश्मीर में सक्रिय तमात आतंकवादी संगठनों में सबसे नया आतंकवादी संगठन जैश-ए-मोहम्मद सबसे नया है। इसकी स्थापना फरवरी २००० में की गई। जैश-ए-मोहम्मद का मुखिया मसूद अजहर है जिसे दिसंबर १९९९ में इंडियन एयरलाइंस के अपहरण के बाद भारत सरकार ने दो दूसरे चरमपंथियों के साथ रिहा कर दिया। इस संगठन में हरकत-उल-मुजाहिद्दीन और हरकत-उल-अंसार के कई चरमपंथी शामिल हैं। खुद मौलाना मसूद अजहर हरकत-उल-अंसार का महासचिव रह चुका है और उसके हरकत-उल-मुजाहिद्दीन से भी संपर्क रहे हैं। उसे १९९४ में श्रीनगर में गिरफ्तार किया गया था। लेकिन १९९९ में अफगानिस्तान के कंधार में उसकी रिहाई के बाद वो पाकिस्तान में नजर आया। तभी से उसने मृतप्रायः हरकत-उल-अंसार में जान फूंकने की कोशिश की। हालांकि पाकिस्तान में रहकर मौलाना मसूद अजहर के अपने संगठन में जैश-ए-मोहम्मद के गतिविधियां चलाने से अंतरराष्ट्रीय समुदाय में पाकिस्तान को शर्मिंदगी उठानी पड़ी है क्योंकि विमान अपहरण की घटना से मौलाना अजहर पहले से ही काफी सुर्खियों में आ गया था।

इंडियन मुजाहिद्दीन का परिचय
कई संगठनों का मिलाजुला रूप
इंडियन मुजाहिद्दीन देश में जड़ें जमाए कई संगठनों का मिलाजुला रूप है। इन संगठनों में स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट्स ऑफ इंडिया (सिमी), पाकिस्तान स्थित आतंकवादी संगठन लश्कर-ए-तैयबा और बांग्लादेश स्थित हरकत उल जिहाद-ए-इस्लामी (हूजी) से जुड़े आतंकी शामिल हैं।

अहले हदीज का परिचय
पाक में लश्कर की स्थापना करने वाला संगठन
अहले हदीज चरमपंथी इस्लामी संगठन है। यह इस्लाम के बहावी मत को मानता है। ऐसा माना जाता है कि अहले हदीज ने ही दहशत और खौफ का पर्याय बन चुके आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा की पाकिस्तान में स्थापना की थी। गौरतलब है कि लश्कर भारत में हुई कई बड़ी आतंकी वारदातों की जिम्मेदारी ले चुका है। अहले हदीज के कई कार्यकर्ता ‘सिमी’ के कैडर माने जाते हैं। वहीं, अहले हदीज से जुड़े लोगों ने भी कई बड़ी घटनाओं को अंजाम दिया

‘सिमी’ का परिचय
१९७७ में ‘सिमी’ की स्थापना
सिमी (स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया)भारत में प्रतिबंधित संगठन है। केंद्र सरकार ने इसे आतंकवादी संगठन मानते हुए वर्ष २००१ से प्रतिबंधित कर रखा है। सिमी की स्थापना अलीगढ़ मुसलिम विश्वविद्यालय के कुछ छात्रों ने १९७७ में की थी। इसका घोषित उद्देश्य भारत को इस्लामिक राष्ट्र में बदलना है। इस काम के लिए यह संगठन हिंसा या जोर-जबरदस्ती को गलत नहीं मानता।

(साभार अमर उजाला)