पंकज रामेन्दू
जिंदगी को बस इसलिए दोबारा रखना चाहूंगा
मैं फिर तुझे उतनी ही शिद्दत से तकना चाहूंगा ।
प्यार तेरा पा सकूं मेरी यही कोशिश नहीं,
बन के खुशब तेरी सांसो में बसना चाहूंगा।
तेरी सूरत मेरी आंखो में हो बस यही हसरत नहीं
मैं ख्वाब ओ ख्यालों में तुझको भी दिखना चाहूंगा ।
जिसकी संगत से हुस्न निखरे औऱ बढ़े रंगत
बन के वो श्रंगार तेरे अंग अंग पे सजना चाहूंगा
हो सकता है लगे तुझे ये बाते बहुत बड़ी बड़ी
इंच भर मुस्कान की खातिर, में बिकना चाहूंगा ।
Thursday, November 18, 2010
Saturday, October 9, 2010
बिहार चुनाव की खामोशी

पुण्य प्रसून बाजपेयी
जहां राजनीति का ककहरा अक्षर ज्ञान से पहले बच्चे सीख लेते हों, वहां चुनाव का मतलब सिर्फ लोकतंत्र को ढोना भर नहीं होता। उसका अर्थ सामाजिक जीवन में अपनी हैसियत का एहसास करना भी होता है। लेकिन इस बार ऐसा कुछ भी नहीं है तो मतलब साफ है राजनीति की हैसियत अब चुनाव से खिसक कर कहीं और जा रही है। चुनाव के ऐलान के बाद से बिहार में जिस तरह की खामोशी चुनाव को लेकर है, उसने पहली बार वाकई यह संकेत दिये हैं कि राजनीतिक तौर पर सत्ता की महत्ता का पुराना मिजाज बदल रहा है। लालू यादव के दौर तक चुनाव का मतलब सत्ता की दबंगई का नशा था। यानी जो चुनाव की प्रक्रिया से जुड़ा उसकी हैसियत कहीं न कहीं सत्ताधारी सरीखी हो गयी। और सत्ता का मतलब चुनाव जीतना भर नहीं था, बल्कि कहीं भी किसी भी पक्ष में खड़े होकर अपनी दबंगई का एहसास कराना भी होता है।
लालू 15 बरस तक बिहार में इसीलिये राज करते रहे क्योंकि उन्होंने सत्ता के इस एहसास को दिमागी दबंगई से जोड़ा। लालू जब सत्ता में आये तो 1989-90 में सबसे पहले यही किस्से निकले की कैसे उंची जाति के चीफ सेक्रेट्ररी से अपनी चप्पल उठवा दी। या फिर उंची जाति के डीजीपी को पिछड़ी जाति के थानेदार के सामने ही माफी मंगवा दी। यानी राजनीतिक तौर पर लालू यादव ने नेताओ को नहीं बल्कि जातियों की मानसिकता में ही दबंगई के जरीये समूचे समाज के भीतर सत्ता की राजनीति के उस मिजाज को जगाया, जिसमें चुनाव में जीत का मतलब सिर्फ सत्ता नहीं बल्कि अपने अपने समाज में अपनो को सत्ता की चाबी सौंपना भी था। सत्ता की कई चाबी का मतलब है लोकतंत्रिक व्यवस्था को छिन्न-भिन्न करने की ताकत। यानी पुलिस प्रशासन से लेकर व्यवस्था बनाये रखने वाले किसी भी संस्थान की हैसियत चाहे मायने रखे लेकिन चुनौती देने और अपने पक्ष में हर निर्णय को कराने की क्षमता दबंगई वाले सत्ताधारी की ही है।
चूंकि जातीय समीकरण के आसरे चुनाव जीतने की मंशा चाहे लालू प्रसाद यादव या नीतीश कुमार में हो, लेकिन लालू के दौर में जातीय समीकरण का मतलब हारी हुई जातियों के भीतर भी दबंगई करता एक नेता हमेशा रहता था। फिर यह सत्ता आर्थिक तौर पर अपने घेरे में यानी अपने समाज में रोजगार पैदा करने का मंत्र भी होता है। इसलिये चुनाव का मतलब बिहार में सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों को प्रभावित करने वाला भी है। लेकिन नीतीश कुमार के दौर में यह परिस्थितियां न सिर्फ बदली बल्कि नीतीश की राजनीति और इस दौर की आर्थिक परिस्थितियो ने दबंगई सत्ता के तौर तरीको को ही बदल दिया। 1990 से 1995 तक सत्ता की जो दबंगई कानून व्यवस्था को खारिज कर रही थी, बीते पांच बरस में नीतीश ने समाज के भीतर जातियों के उस दबंग मिजाज को ही झटका दिया और राजनीतिक बाहुबली इसी दौर में कानून के शिकंजे में आये।
सवाल यह नहीं है कि नीतीश कुमार के शासन में करीब 45 हजार अपराधियों को पकड़ा गया या कहें कानून के तहत कार्रवाई की गई। असल में अपराधियो पर कार्रवाई के दौरान वह राजनीति भी खारिज हुई जिसमें सत्ता की खुमारी सत्ताधारी जातीय दबंगई को हमेशा बचा लेती थी। यानी पहली बार मानसिक तौर पर जातीय सत्ता के पीछे आपराधिक समझ कत्म हुई। यह कहना ठीक नहीं होगा कि बिहार में जातीय समिकरण की राजनीति ही खत्म हो गई। हकीकत तो यह है कि राजद या जेडीयू में जिस तरह टिकटों की मांग को लेकर हंगामा हो रहा है, वह जातीय समीकरण के दुबारा खड़े होने को ही जतला रहा है। यानी अपराध पर नकेल कसने या बाहुबलियों को सलाखों के पीछे अगर बीते पांच साल में नीतीश सरकार ने भेजा है तो भी जातीय समीकरण को वह भी नहीं तोड़ पाये हैं। वहीं नीतीश के दौर में एक बडा परिवर्तन बाजार अर्थव्यवस्था के फैलने का भी है। सिर्फ सड़कें बनना ही नहीं बल्कि उनपर दौडती गाड़ियों की खरीद फरोख्त में बीत पांच साल में करीब तीन सौ फिसदी की वृद्धि लालू यादव के 15 साल के शासन की तुलना में बढ़ी। और रियल इस्टेट में भी बिहार के शहरी लोगों ने जितनी पूंजी चार साल में लगायी, उतनी पूंजी 1990 से 2005 के दौरान भी नहीं लगी।
यह परिवर्तन सिर्फ बिहारियो के अंटी में छुपे पैसे के बाहर आने भर का नहीं है बल्कि पुरानी मानसिकता तोड़ कर उपभोक्ता मानसिकता में ढलने का भी है। इस मानसिकता में बदलाव की वजह ग्रामीण क्षेत्रों या कहें खेती पर टिकी अर्थव्यवस्था को लेकर नीतीश सरकार की उदासी भी है। नीतीश कुमार ने चाहे मनमोहन इक्नामिक्स को बिहार में अभी तक नहीं अपनाया है, लेकिन मनमोहन सिंह की अर्थव्यवस्था में जिस तरह बाजार और पूंजी को महत्ता दी जा रही है, नीतीश कुमार उससे बचे भी नहीं है। इसका असर भी यही हुआ है कि खेती अर्थव्यस्था को लेकर अभी भी बिहार में कोई सुधार कार्यक्रम शुरु नहीं हो पाया है। जमीन उपजाऊ है और बाजार तक पहुंचने वाले रास्ते ठीक हो चले हैं, इसके अलावे कोई इन्फ्रास्ट्रक्चर नही बनाया गया। बल्कि नीतीश कुमार की विश्वास यात्रा पर गौर करें तो 31 जिलों में 12416 योजनाओं का उद्घाटन नीतिश कुमार ने किया। सभी योजनाओ की राशि को अगर मिला दिया जाये तो वह 35 अरब 51 करोड 95 लाख के करीब बैठती है। इसमें सीधे कृषि अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने वाली योजनायें 18 फीसदी ही हैं। जबकि नीतीश कुमार ने 25 दिसंबर 2009 से 25 जून 2010 के दौरान जो भी प्रवास यात्रा की उसमें ज्यादातर जगहों पर उनके टेंट गांवों में ही लगे। यानी जो ग्रामीण समाज सत्ता की दबंगई लालू यादव के दौर में देखकर खुद उस मिजाज में शरिक होने के लिये चुनाव को अपना हथियार मानता और बनाता था...वही मिजाज नीतीश के दौर में दोधारी तलवार हो गया। यानी चुनाव के जरीये सत्ता की महत्ता विकास की ऐसी महीन लकीर को खींचना है, जिसमें खेती या ग्रामीण जीवन कितना मायने रखेगा यह दूर की गोटी हो गई। यानी देश में मनमोहन इक्नामिक्स में बजट तैयार करते वक्त अब वित्त मंत्री को कृषि से जुड़े समाज की जरुरत नहीं पड़ती और बिहार में नीतिश की इक्नामिक्स लालू के दौर की जर्जरता की नब्ज पकड कर विकास को शहरी-ग्रामीण जीवन का हिस्सा बनाकर राजनीति भी साधती है और मनमोहन के विकास की त्रासदी में बिहार का सम्मान भी चाहती है।
यानी चुनाव को लेकर बिहार में बदले बदले से माहौल का एक सच यह भी है कि राजनीति अब रोजगार नहीं रही। रोजगार का मतलब सिर्फ रोजी-रोटी की व्यवस्था भर नहीं है बल्कि राजनीतिक कैडर बनाने की थ्योरी भी है और सत्ता को समानांतर तरीके से चुनौती देना भी है। दरअसल, नीतीश के सुशासन का एक सच यह भी है कि समूची सत्ता ही नीतीश कुमार ने अपने में सिमटा ली है और खुद नीतीश कुमार सत्ताधारी होकर भी दबगंई की लालू सोच से हटकर खुद को पेश कर रहे हैं, जिनके वक्त सत्ता का मतलब जाति या समाज पर धाक होती थी। बिहार में राजनीतिक विकास का चेहरा इस मायने में भी पारपंरिक राजनीति से हटकर है, क्योकि नीतीश कुमार की करोड़ों-अरबो की योजनाएं बिहारियों को सरकार की नीतियों के भरोसे ही जीवन दे रही हैं। जो कि पहले जातीय आधार पर जीवन देती थी। मसलन राज्यभर के शिक्षको के वेतन की व्यवस्था कराने का ऐलान हो या फिर दो लाख से ज्यादा प्रारंभिक शिक्षकों की नियुक्ति या फिर 20 हजार से ज्यादा रिटायर सौनिकों को काम में लगाना। और इसी तरह कमोवेश हर क्षेत्र के लिये बजट की व्यवस्था कर सभी तबके को राहत देने की बात। लेकिन यह पूरी पहल मनरेगा सरीखी ही है। जिसमें लोगो को एकमुश्त वेतन तो मिल रहा है लेकिन इसका असर राज्य के विकास पर क्या पड़ रहा है, यह समझ पाना वाकई मुश्किल है। क्योंकि सारे बजट लक्ष्यविहिन है। एक लिहाज से कहें तो वेतन या रोजगार के साधन खड़ा न कर पाने की एवज में यह धन का बंटवारा है। लेकिन इसका असर भी राजनीति की पारंपरिक धार को कम करता है और राजनीति को किसी कारपोरेट की तर्ज पर देखने से भी नहीं कतराता। कहा यह भी जा सकता है कि बिहार में भी पहली बार चुनाव के वक्त यह धारणा ही प्रबल हो रही है कि जिसके पास पूंजी है, वह सबसे बडी सत्ता का प्रतीक है। और सत्ता के जरीये पूंजी बनाना अब मुश्किल है।
कहा यह भी जा सकता है कि विकास के जिस ढांचे की बिहार में जरुरत है, उसमें मनमोहन सिंह का विकास फिट बैठता नहीं और नीतीश कुमार के पास उसका विकल्प नहीं है। और लालू यादव की पारंपरिक छवि नितीश के अक्स से भी छोटी पड़ रही है। इसका चुनावी असर परिवर्तन के तौर पर यही उभरा है कि जातियों के समीकरण में पांच बरस पहले जो अगड़ी जातियां नीतिश के साथ थीं, अब उनके लिये कोई खास दल मायने नहीं रख रहा। जो कांग्रेस पांच बरस पहले अछूत थी, अब उसे मान्यता मिलने लगी है। और विकास पहली बार एक मुद्दा रहा है। लेकिन यह तीनों परिवर्तन भी बिहार की राजनीतिक नब्ज से दूर हैं, जहां जमीन और खेती का सवाल अब भी सबसे बड़ा है। यानी भूमि सुधार से लेकर खेती को विकास के बाजार मॉडल के विकल्प के तौर पर जो नेता खड़ा करेगा, भविष्य का नेता वहीं होगा। नीतीश कुमार ने तीन साल पहले भू-अर्जन पुनस्थार्पन एंव पुनर्वास नीति के जरीये पहल करने की कोशिश जरुर की लेकिन महज कोशिश ही रही क्योकि बिहार की पारंपरिक राजनीति की आखिरी सांसें अभी भी चल रही हैं। शायद इसीलिये इसबार चुनाव में जेपी की राह से निकले नीतीश-लालू आमने-सामने खड़े हैं। जबकि बिहार की राह जेपी से आगे की है और संयोग से यह रास्ता कांग्रेस के युवराज भी समझ पा रहे हैं, इसलिये वह युवा राजनीति को उस बिहार में खोज रहे हैं, जहां राजनीति का ककहरा बचपन में ही पढ़ा जाता है।
Friday, October 1, 2010
संघर्षों का दौर
. मेरे संघर्षों का दौर अभी बाकी है, ज़रा ठहरो
इस रात की भोर अभी बाकी है, ज़रा ठहरो
तू ले ले और इम्तेहान जिन्दगी, में भी तैयार हूं
मेरी किस्मत में ज़ोर अभी बाकी है, ज़रा ठहरो
जानता हूं इस तपिश भरी ज़मीन पर बूंदे गिरी हैं चंद
बरसना बादलों का घनघोर अभी बाकी है ज़रा ठहरो
यह दुनिया कभी कि गर्त में चली गई होती
यहाँ ईमान कुछ और अभी बाकी है ज़रा ठहरो
स्वाती तुम न घबराना वक्त के बदलावों से
तेरी आस वाला चकोर अभी बाकी है ज़रा ठहरो
इतनी जल्दी हार ना मानना "मानव"
कुछ पल ओर अभी बाकी है, ज़रा ठहरो
पंकज रामेंदु मानव
इस रात की भोर अभी बाकी है, ज़रा ठहरो
तू ले ले और इम्तेहान जिन्दगी, में भी तैयार हूं
मेरी किस्मत में ज़ोर अभी बाकी है, ज़रा ठहरो
जानता हूं इस तपिश भरी ज़मीन पर बूंदे गिरी हैं चंद
बरसना बादलों का घनघोर अभी बाकी है ज़रा ठहरो
यह दुनिया कभी कि गर्त में चली गई होती
यहाँ ईमान कुछ और अभी बाकी है ज़रा ठहरो
स्वाती तुम न घबराना वक्त के बदलावों से
तेरी आस वाला चकोर अभी बाकी है ज़रा ठहरो
इतनी जल्दी हार ना मानना "मानव"
कुछ पल ओर अभी बाकी है, ज़रा ठहरो
पंकज रामेंदु मानव
Monday, August 30, 2010
याद रहे हिंदी की बोलियाँ ही उसकी ताकत हैं
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याद हो तो...आज से करीब साठ साल पहले हमने एक जंग जीती है...आज़ादी की, उससे भी पहले गर याद हो तो..उससे सौ साल पहले एक बड़ी जंगी शिकस्त भी खाई है.ये बात हमें याद हो तो ये भी याद होगा उस शिकस्त की वजह क्या थी ? हार के तमाम कारणों में एक बड़ी वजह विभिन्न राज्यों और सेनाओं के बीच सुचारू रूप से संवाद ना हो पाना भी था.इसकी एक वजह जहान संवाद के लिए जरुरी माध्यम का ना होना था वहीं एक वजह भाषागत दूरियां भी थी.इसके सौ साल बाद जब हमें बाजी पलटने का मौका हाथ लगा तो हमने आज़ादी के आलावें भी बहुत कुछ हासिल किया.जिसमें भारत की एकता के साथ -साथ सुन्दर भारत का एक खुबसूरत ख़्वाब भी पाया और साथ ही पाई एक प्यारी सी भाषा हिंदी.जिसे विभिन्न बोलियों को मिलकर खड़ा किया गया था.जिसके जरिये हम पूरे देश के लोगों से आसानी से बातें कर सकते थे.एक ऐसी भाषा जिसमें भारत की विविधता पूर्ण संस्कृति,धर्म और संस्कृति की भी झलक दिखती है.लेकिन जैसा की होता है हर खुबसूरत ख्वाब कभी ना कभी टूटते ही हैं. वैसे ही भारत के सुन्दर भविष्य का ख़्वाब भी टुटा और साथ में ख़तम होती गई हिंदी की एकता और अखंडता भी. इस अखंडता पर ये संकट वाहरी ही नहीं बल्किं भीतरी भी है.इस संकट से निकले के लिए,अपनी भाषा को बचाने के लिए कोल्कता के संगठन 'अपनी भाषा' के प्रोफेसर अमरनाथ और डॉ. ऋषिकेश राय देश भर के बुद्धिजीवियों से संवाद कर रहे हैं.और इसी सिलसिले को आगे बढ़ाते हुवे वे एक गोष्ठी '' हिंदी उसकी बोलियाँ और संविधान की आठवीं अनुसूची '' दिल्ली में ''गाँधी शांति प्रतिष्ठान'' में 22 अगस्त को आयोजित किये मिलते हैं.जहाँ वे हिंदी पर छाए संकट की लोगों को याद दिलाते हैं...
संगोष्ठी दो सत्रों में आयोजित होती है.प्रथम सत्र का संचालन डॉ. ऋषिकेश राय करते हैं और अध्यक्षता वरिष्ठ कथाकार हिमांशु जोशी करते हैं.विषय प्रस्तावना में प्रोफेसर अमरनाथ अपनी चिंता लोगों के सामने रखते हैं.किस तरह कुछ दिनों पहले हिंदी की एक बोली मैथली को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कर हिंदी के समनांतर दर्जा दे दिया गया.उसके बाद हिंदी पट्टी के लोग अपनी अपनी बोली को संविधान के आठवीं अनुसूची में शामिल करने को लेकर आये दिन आन्दोलन कर रहे हैं.खतरे की तरफ वे इशारा करते हुवे कहते हैं - दरअसल बात सिर्फ इतनी नहीं है की किसी बोली को हिंदी के बराबर दर्जा दिया जा रहा है दरअसल बात ये है की बोली और भाषा के नाम पर कुछ लोग अपनी राजनितिक महत्वकांक्षा साध रहे हैं.आज यदि किसी बोली को भाषा का दर्जा दे दिया जाता है तो कल उस भाषा के आधार पर एक अलग प्रदेश की मांग उठ खड़ी होती है.इसके समर्थक उस बोली के तमाम साहित्यकार भी है क्योंकि आज उन्हें किसी वजह से आकादमिक पुरस्कार नहीं मिल पता तो. जब-तब वे अलग प्रदेश और अलग भाषा की बात उठाने लगते हैं.,जाहिर है प्रदेश बनने के बाद अलग से उस भाषा की एक आकादमी बनेगी और इन लेखकों को सम्मान मिलने में आसानी होगी. आगे कहते हैं खतरा सिर्फ यही नहीं है- हिंदी को राष्ट्रिय भाषा का दर्जा इस वजह से नहीं मिला की इसका साहित्य बहुत समृद्ध और विशाल है, बल्किं इस वजह से मिला की हिंदी क्षेत्र में बोले जानी वाली बोलियों के लोगों के संख्या बल को देखते हुवे ही इसे राष्ट्रिय भाषा होने का अवसर मिला.मगर अब ये अखंडता खतरे में है.क्योंकि मैथली के बाद छत्तीसगढ़ी,बुन्देली, राजस्थानी,भोजपुरी के इलाकों से इन्हें अलग भाषा का दर्जा दिए जाने की मांग उठने लगी है.यदि इन भाषाओं को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कर लिया जाता है तो जाहिर है हिंदी का रास्ट्रीय स्वरूप खतरे में पड़ जायेगा क्योंकि संख्या बल की वजह से ही तो हिंदी रास्ट्रीय भाषा है.ये एक साम्राज्यवादी शाजिस है ताकि भारत की अखंडता और एकता को तोडा जा सके..एक और गृह युद्ध में इसे धकेला जा सके.वे बताते हैं जहाँ जातिय चेतना मजबूत नहीं होती वहां समय समय पर विघटनकारी शक्तियां अपना सर उठती हैं.दुर्भाग्य से हिंदी जाति की जातिय चेतना मजबूत नहीं है.बोलियाँ ही हिंदी की शक्ति हैं. अपनी बोलियों से अलग होकर हिंदी कमजोर होगी ही, बोलियाँ भी अलग थलग हो कर कमजोर हो जाएँगी.बोलियों का विकास हिंदी के साथ जुड़कर रहने और उसमें रचनाकर्म के जरिये ही संभव है.हाँ यदि कोई समस्या है .बोलियों के लेखक और उनकी रचनाओं को यदि कोर्स की किताबों में पर्याप्त जगह नहीं मिलती तो वे इसके लिए अपनी आवाज उठा सकते हैं.लेकिन हिंदी से अलग होकर वे हिंदी को तो तोड़ेंगे ही साथ ही ये बोलियों के लिए भी खतरनाक स्थिति होगी..
पहले वक्ता के रूप में वरिष्ठ समीक्षक कमाल किशोर गोयल एक निबंध पढ़ते हैं .दरअसल अपनी अपनी बोलियों को आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग करने वाले लोग .अपने लिए और अपने लोगों के लिए सत्ता की मांग कर रहे हैं.हिंदी का संसार छिन्न-भिन्न करना हमारी राष्ट्रिय एकता और अखंडता के लिए घातक होगा.हिंदी और उसकी बोलियाँ एक दूसरे की पूरक हैं.प्रभाकर क्षोत्रिय हिंदी को एक नदी के समान बताते हैं जो अपनी राह में आने वाले हर छोटे बड़े तालाबों को अपने अन्दर जब्त कर लेती है.बोलियों की मांग पर वे कहते हैं अभी तो ये शुरुवात है हमने अपने आपको खंडो में बाटना तयं कर लिया है.वहीं प्रभाकर जी के वक्तव्य में से ये चीज भी निकाल कर आती है की किस तरह हम तकनीक से पुर्वाहग्रसित हैं,उनकी ये चिंता है की आज कल हिंदी रोमन में लिखी जा रही है.शायद ये बात उन्हें नहीं मालूम की इसी वजह से कितने सारे लोग अपने आपको हिंदी में व्यक्त कर पा रहे हैं.लिखने दीजिये उन्हें रोमन में एक ना एक दिन वे देवनागरी में भी लिखने ही लगेंगे.हाँ जबरदस्ती आपने लोगों पर देवनागरी में लिखने का दबाव डाला तो शायद ये लोग कभी भी हिंदी में ना लिख पायें.क्योंकि ये वे लोग हैं जो अपना हर काम इंग्लिश में ही करने के आदि हैं लेकिन ये मातृभाषा से जुड़ाव ही है जो उन्हें हिंदी में लिखने को प्रेरित करती है. अनन्त राम त्रिपाठी हमें संविधान निर्माण की बैठक में ले जाते हैं.जहाँ डॉ. भीमराव आंबेडकर लोगों संविधान सभा में सभी से दरख्वास्त कर रहे हैं - मैं आप सबसे निवेदन करता हूँ.कि हिंदी राष्ट्र भाषा होने के साथ साथ प्रान्तों कि भाषा भी हिंदी होनी चाहिए...कहते हैं वे यदि उस वक़्त आंबेडकर का ये निवेदन स्वीकार कर लिया जाता तो आज हमें ये चिंतन मनन करने कि जरुरत नहीं होती.
बोलियों कि समस्याओं पर देवेन्द्र चौबे प्रकाश डालते हैं.आखिर क्यों बोलियों के लोग अपनी बोली को संविधान के आठवीं अन्सुची में शामिल करने कि मांग ना करें जब भोजपुरी के बड़े कवि 'भिखारी ठाकुर '' को रामचंद्र शुक्ल अपनी किताब 'हिंदी साहित्य के इतिहास में जगह नहीं देते तो जाहिर भोजपुरी के लोग अपने कवि और बोली के लिए संविधान कि आठवीं अनुसूची में शामिल करने कि मांग करेंगे ही. .हिंदी अकेड्मियों को लताड़ लगते हैं-जाहिर है अकेडमिक हिंदी के सवालों को हाल करने में नाकाम रही.हिंदी को बचाए रखना है तो बोलियों को हिंदी के ढांचे में पर्याप्त स्पेश दे नहीं तो वे अपने स्पेश के लिए लड़ेंगे. हम सिर्फ अच्छा सुनना चाहते हैं अपनी गलतियों कि तरफ ध्यान नहीं देना चाहते. आयोजन कि एक सबसे बड़ी कमी मुझे ये दिखी कि यहाँ बोलियों कि समस्याओं पर देवेन्द्र चौबे के बाद कोई बोलने वाला नहीं था जबकि उनकी समस्याओं पर भी प्रकाश डालने वाले और वक्ता होने चाहिए थे.इसके बाद मृदुला सिन्हा अपनी चिंता में ये जाहिर करती हैं कि मैथली के अलग होने के बाद विद्यापति को यदि कोर्स से हटाया जाता है तो हिंदी का ये दुर्भाग्य होगा कि इतना अच्छा वर्णन पढने से वे वंचित हो जायेंगे.अध्यक्षीय उद्बोधन से पहले अपनी भाषा कि कि पत्रिका '' भाषा विमर्श'' का लोकार्पण प्रभाकर क्षोत्रिय,चित्र मुगदल और हिमांशु जोशी करते हैं.अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में हिमांशु जोशी इस देश को विडम्बनाओं का देश बताते हैं.एक तरफ हम जहाँ चीजों को स्थापित करते हैं दूसरी तरफ उसे हमीं विखंडित भी करते हैं.रचनाकर्म की आवश्यकता पर वे बल देते हैं साथ ही बताते हैं हिंदी गानों की मिठास भोजपुरी से ही आई है.जब हम गाते हैं तो कभी नहीं लगता की ये हिंदी नहीं बल्किं कोई और बोली ,कोई और भाषा है.भोजपुरी का ही स्वरूप है हिंदी और हिंदी का ही स्वरूप है भोजपुरी ये अलग नहीं हो सकते.ये जो हमें अलग अलग करने की शाजिसें चल रही हैं इनके पीछे पश्चिमी दुनिया का हाथ है.वे साफ शब्दों में बताते हैं - ''हिंदी का होना होने के लिए भोजपुरी, मैथली,अवधी, वर्ज ,राजस्थानी और हरियाणवी का होना भी जरुरी है''..
इसके बाद भोजन आवकाश के बाद दूसरे सत्र की कार्यवाही शुरू होती है.जिसमें मंच का संचालन श्री भगवान सिंह करते हैं और अध्यक्षता डॉ.कैलाश पन्त करते हैं.तमाम वक्ता अपने -अपने वक्तव्य में हिंदी पर छाए संकट पर चिंता जाहिर करते हैं.लेकिन उबाल तब आता है जब वेद प्रताप वैदिक मुद्दे पर बात ना कर मंच का इस्तेमाल अपने अजेंडे का प्रोपेगेंडा फैलाने के लिए करते हैं.किसी के ये कहने पर सर आप सब्जेक्ट से हट कर बोल रहे हैं.पर वे अपने आपे से बाहर हो जाते हैं यहाँ तक की वे मंच की गरिमा और लोकतान्त्रिक मूल्यों की भी तिलांजली देते हुवे मंच से नीचे आकर शायद असहमति वाली आवाज का कलर पकड़ना चाहते हैं.किसी तरह उन्हें मंच के संचालक श्री भगवान सिंह रोकते हैं.आज कल हर सेमिनार का नजारा है ये जहाँ वक्ता अपने से असहमति रखने वाली आवाज को अपने आक्रामक रुख के जरिये दबाना चाहता है.इसके बाद प्रोफेसर चमनलाल आते हैं वे अभी बोलना शुरू ही करते हैं की उनके लिए वक़्त समाप्ति की घोषणा कर दी जाती है.लगता है जैसे आयोजक ये पहले से ही मान बैठे हैं कि फलां वक्ता सही बोलते हैं और फ़ला सही नहीं बोलेंगे.वैदिक जी को जहाँ बोलने का निश्चित समय से आधिक समय दिया जाता है.जबकि वे सब्जेक्ट से हट कर बोलते हैं .बोलते क्या हैं कुछ कुछ प्रवचन से करते हैं.उनके लिए कोई समय सीमा नहीं है .जब प्रोफ़ेसर चमनलाल जिन्हें स्टुडेंट्स सुनना चाहते हैं उन्हें बोलने का पूरा मौका नहीं दिया जाता जबकि वे मुद्दे पर ही बातें कर रहे होते हैं.इस गरमा गर्मी के बाद कई वक्ता अपनी बात रखते हैं जिनमें अजय तिवारी ,चित्र मुगदल,कृस्नदत्त पालीवाल,परमानद पंचाल आदि .मगर दूसरे सत्र की महफ़िल लुटते हैं इंदौर से आये प्रभु जोशी माहौल में आई गर्मीं को उनकी शांत और गंभीर आवाज़ धीरे धीरे ठंडा करती है वे बताते हैं कैसे कैसे साम्राज्यवादी ताकतें हमारी भाषा और एकता पर हमला कर रही हैं.उनकी आवाज़ उनके टीवी से जुड़ाव की भी कहानी कहती है.आखिर में कैलाश पन्त चीजों को समेटे हुवे कहते हैं -दरअसल हिंदी के खिलाफ शाजिस का माहौल तभी पैदा कर दिया गया जब संविधान में ''इंडिया दैट इज भारत '' कहा गया ...वे सवाल करते हैं क्या कभी किसी प्रापर नउन का ट्रांसलेशन होता है?
पूरी संगोष्ठी को देखें तो ये कह सकते हैं ये एक सफल गोष्ठी रही ''अपनी भाषा ''के लोग जिस उद्देश्य से आये थे उसमें वे सफल होते हैं.वे ये याद दिलाने में कामयाब जरुर होते हैं- '' याद रहे हिंदी की बोलियाँ ही उसकी ताकत हैं''..हिंदी और उसकी बोलियों को अलग थलग होने की चिंता से वे दिल्ली के बुद्धिजीवियों को चिन्तित जरुर करते हैं.लेकिन वहीं जरा व्यापक दृष्टीकोण से देखें तो ये संगोष्ठी आगे की लड़ाई कैसे हो? उसका तरीका क्या हो ?इस बारे में कोई दिशा दिखने में असफल दिखती है..
-अंजुले श्याम मौर्य
anjuleshyam@gmail.com
Thursday, July 15, 2010
Wednesday, June 30, 2010
बनियों की गली

सैयद जैगम इमाम (दोस्तों, नवोदित साहित्यकार सैयद जैगम इमाम की 30 नवम्बर 2009 को लोकार्पित इंकलाबी किताब “दोज़ख़” को मशहूर प्रकाशक राजकमल प्रकाशन ने बैस्ट सेलर की श्रेणी में शुमा...र किया है )
गली में बनियों का राज था। ढेर सारी दुकानें, आढतें और न जाने कितने गोदाम। सब के सब इसी गली में थे। बनिए और उनके नौजवान लडके दिन भर दुकान पर बैठे ग्राहकों से हिसाब किताब में मसरुफ रहते। शुरु -शुरु में वो इस गली से गुजरने में डरती थी, न जाने कब किसकी गंदी फब्ती कानों को छलनी कर दे। फिर क्या पता किसी का हाथ उसके बुरके तक भी पहुंच जाए। डरते सहमते जब वो इस गली को पार कर लेती तब उसकी जान में जान आती। मगर डर का यह सिलसिला ज्यादा दिनों तक नहीं चला। उसने गौर किया ग्राहकों से उलझे बनिए उसकी तरफ ज्यादा ध्यान नहीं देते। हां इक्का दुक्का लडके उसकी तरफ जरुर देखते मगर उनकी जिज्ञासा उसके शरीर में न होकर के उस काले बुर्के में थी जिससे वो अपने को छुपाए रखती थी।
वो पढती नहीं थी, छोटी क्लास के बच्चों को पढाती थी। तमाम शहर में मकान तलाशने के बावजूद जब उसके अब्बा को मकान नहीं मिला तो हारकर इस बस्ती का रुख करना पडा। अब्बा ने मशविरा दिया था ''बेटी घर से बाहर न निकलो'' मगर उनकी आवाज में ज्यादा दम नहीं था। घर में कमाने वाला कोई न था फिर वो कुछ रुपयों का इंतजाम कर रही थी तो इसमें बुरा क्या था। दिन गुजर रहे थे उसके स्कूल जाने का सिलसिला जारी था। उसने नोट किया इधर बीच बनियों की गली के ठीक बाद पडने वाले चौराहे पर पास के मदरसे के तीन चार लडके रोज खडे रहते हैं। उसने ज्यादा ध्यान नहीं दिया। दिल में एकबारगी आवाज उठी , भला इनसे क्या डरना। एक दिन अजीबो गरीब बात हुई। चौराहे पर एक लडका उसके ठीक सामने आ गया। हाथ उठाकर बडी अदा से कहा अस्सलाम आलेकुम। वो चौंक गई। उसके लडकों से इस तरह की उम्मीद कतई नहीं थी। उसने कोई जवाब नहीं दिया। कलेजा थर थर कांप रहा था। वापसी में भी वही लडके उसके सामने खडे थे। उसने घबरा कर तेज तेज चलना शुरु कर दिया। लडके उसकी तरफ बढे मगर वो फटाक से बनियों की गली में घुस गई। लंबी -लंबी दाढी, सफाचट मूंछ ओर सिर पर गोल टोपी रखने वाले लडकों के इरादे उसे वहशतनाक लगे। रात को वो सो नहीं सकी। रात भर जहन में यही ख्याल आता रहा कि कल क्या होगा। उसने ख्वाब भी देखा , बडी दाढी वाले एक लडके ने उसका दुपट्टा खींच लिया है।
स्कूल जाने का वक्त हो गया था। वो दरवाजे तक गई मगर फिर लौट आई। आज फिर बदतमीजी का सामना करना पडा तो.....। उसने अब्बा से दरख्वास्त की, उसके साथ स्कूल तक चलें। उसने खुलकर कुछ नहीं कहा। अब्बा ने भी कुछ नहीं पूछा। मगर उन्हें बनियों पर बेतहाशा गुस्सा आया। दांत किचकिचाते हुए उन्होंने अंदाजा लगा लिया कि बनिये के किसी लडके ने उनकी बेटी को छेडा है। बेटी को गली के पार पहुंचाने के बाद वो वापस लौटने लगे। चौराहे पर अभी भी वो लडके खडे थे। उसने अब्बा से स्कूल तक चलने की बात कही। आज लडके कुछ नहीं बोले। वापसी में उसका दिल जोर जोर से धडक रहा था। मगर नहीं चौराहे पर लडके नदारद थे। उसने खुदा का शुक्र अदा किया। घर पहुंची तो अम्मा उसकी परेशानी का सबब पूछ रहीं थीं। अम्मा बार बार बनियों को गाली भी दे रहीं थीं। उन्होंने उसे गली छोडने की सलाह भी दी। मगर वो कुछ नहीं बोली।
आज अब्बा घर नहीं थे। उसे पहले की तरह अकेले स्कूल जाना था। गली से चौराहे पर पहुंचते वक्त उसका कलेजा धाड धाड बज रहा था। चौराहे पर लडके हमेशा की तरह उसके इंतजार में खडे थे। वो हिम्मत बांधकर आगे बढी मगर फिर एक लडका उसके सामने आ गया। उसके बढने के अंदाज ने उसकी रीढ में सिहरन पैदा कर दी। उसके मुंह से चीख निकल गई। वो वापस बनियों की गली की तरफ दौड पडी। गली के बनिये सारा तमाशा देख रहे थे। शरीफ लडकी से छेडछाड उन्हें रास नहीं आई। गली के नौजवान मदरसों के इन लुच्चों की तरफ दौड पडे। जरा सी देर में पूरी गली के बनिये शोहदों की धुनाई कर रहे थे। भीड लडकों को पीट रही थी और वो चुपचाप किनारे से स्कूल निकल गई। वापस में चौराहा खामोश था। लडके नदारद थे। गली से गुजरते वक्त उसे ऐसा लगा कि हर कोई उसे देख रहा है। मगर ये आंखें उसे निहारने के लिए नहीं उठी थीं। ये सहानूभूति और गर्व से उठी नजरें थीं जो उसे बता रहीं थीं कि चिंता मत करो हम अपनी बहू बेटियों के साथ छेडछाड करने वालों का यही हश्र करते हैं।
घर पहुंची तो देखा अब्बा एक मौलवी से गूफ्तगू कर रहे हैं। ये उस मदरसे के प्रिंसिपल थे जहां मार खाने वाले लडके तालीम हासिल कर रहे थे। अब्बा ने उसे हिकारत की नजर से देखा। उसे कुछ समझ नहीं आया। कमरे में गई अम्मा से मसला पूछने। जबान खोली ही थी कि एक थप्पड मुंह पर रसीद हो गया।
उसे समझ नहीं आया कि आखिर माजरा क्या है। अम्मा सिर पटक रहीं थीं, उसने खानदान के मुंह पर कालिख पोत दी। अम्मा बयान कर करके रोए जा रहीं थीं। उनकी बुदबुदाती आवाज में उसे सिर्फ इतना समझ आया, बनिए के लडकों से उसकी यारी थी जिन्होंने उन शरीफ तालिबे इल्मों को पीट दिया। उसका कलेजा मुंह को आ गया, आंखों में आंसू की बूंद छलक आई। अगली सुबह घर में खाना नहीं पका। उसके स्कूल जाना छोड दिया।
नक्सलबाड़ी आंदोलन
-- नक्सलबाड़ी आंदोलन --
संक्षिप्त इतिहास
नक्सलवाद का जन्म पिछली सदी के साठ के दशक में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी आंदोलन की कोख से हुआ। नक्सलबाड़ी गांव के कुछ छोटे किसानों ने स्थानीय सामंतों के शोषण के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह किया और उन्हें सजा दी। नक्सलबाड़ी आंदोलन को बौद्धिक वर्ग का जबरदस्त समर्थन मिला, तो इसके पीछे वक्त का तकाजा और व्यवस्था से मोहभंग के कारण उपजी रिक्तता को भरने की आक्षंका भी थी। चारु मजूमदार और कानू सान्याल जैसे नेताओं के नेतृत्व में इसका विस्तार पूरे पश्चिम बंगाल में हुआ। लेकिन सत्तर के दशक के दमन और राज्य में वामपंथी पार्टी के सत्तारुढ़ होने के बाद भूमि सुधार कार्यक्रम के लागू होने के साथ यह आंदोलन पड़ोसी राज्यों की ओर कूच कर गया। पिछले करीब तीन दशक में नक्सली आंदोलन में आई विकृतियों ने उसे बौद्धिक समर्थन से भले ही महरूम किया हो, पर समाज के दबे-कुचले वर्गों, आदिवासियों में उसने काफी पैठ बना ली है। यही कारण है कि आज देश के दर्जन भर से अधिक राज्यों के लिए नक्सलवाद सिरदर्द बन गया है।
-- प्रमुख नक्सली गुट --
नक्सलवादी आंदोलन से जुड़े तीन मुख्य संगठन हैं
नक्सली आंदोलन से जुड़े तीन संगठन मुख्य रूप से सक्रिय रहे हैं- एमसीसी (माउस्टि कम्युनिस्ट सेंटर)- वर्ष १९८४ में इस गुट को बिहार में ठोस पहचान मिली। बाद में इसने अनेक बर्बर नरसंहारें को अंजाम दिया। इसका प्रभाव बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में रहा है। पीडीब्ल्यू (पीपुल्स वार ग्रुप)- वर्ष १९८० में कोंडपल्ली सीतारमैया ने तेलंगाना में इस उग्रवादी संगठन की नींव रखी। आंध्र प्रदेश में इसका व्यापक प्रभाव है। जनशक्ति- यह गुट भी आंध्र प्रदेश में ही सक्रिय रहा है। लेकिन बाद में ये तीनों संगठन सीपीआई (माओस्ट) नामक संगठन की छतरी के नीचे एकत्रित हो गए।
(साभार अमर उजाला)
संक्षिप्त इतिहास
नक्सलवाद का जन्म पिछली सदी के साठ के दशक में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी आंदोलन की कोख से हुआ। नक्सलबाड़ी गांव के कुछ छोटे किसानों ने स्थानीय सामंतों के शोषण के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह किया और उन्हें सजा दी। नक्सलबाड़ी आंदोलन को बौद्धिक वर्ग का जबरदस्त समर्थन मिला, तो इसके पीछे वक्त का तकाजा और व्यवस्था से मोहभंग के कारण उपजी रिक्तता को भरने की आक्षंका भी थी। चारु मजूमदार और कानू सान्याल जैसे नेताओं के नेतृत्व में इसका विस्तार पूरे पश्चिम बंगाल में हुआ। लेकिन सत्तर के दशक के दमन और राज्य में वामपंथी पार्टी के सत्तारुढ़ होने के बाद भूमि सुधार कार्यक्रम के लागू होने के साथ यह आंदोलन पड़ोसी राज्यों की ओर कूच कर गया। पिछले करीब तीन दशक में नक्सली आंदोलन में आई विकृतियों ने उसे बौद्धिक समर्थन से भले ही महरूम किया हो, पर समाज के दबे-कुचले वर्गों, आदिवासियों में उसने काफी पैठ बना ली है। यही कारण है कि आज देश के दर्जन भर से अधिक राज्यों के लिए नक्सलवाद सिरदर्द बन गया है।
-- प्रमुख नक्सली गुट --
नक्सलवादी आंदोलन से जुड़े तीन मुख्य संगठन हैं
नक्सली आंदोलन से जुड़े तीन संगठन मुख्य रूप से सक्रिय रहे हैं- एमसीसी (माउस्टि कम्युनिस्ट सेंटर)- वर्ष १९८४ में इस गुट को बिहार में ठोस पहचान मिली। बाद में इसने अनेक बर्बर नरसंहारें को अंजाम दिया। इसका प्रभाव बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में रहा है। पीडीब्ल्यू (पीपुल्स वार ग्रुप)- वर्ष १९८० में कोंडपल्ली सीतारमैया ने तेलंगाना में इस उग्रवादी संगठन की नींव रखी। आंध्र प्रदेश में इसका व्यापक प्रभाव है। जनशक्ति- यह गुट भी आंध्र प्रदेश में ही सक्रिय रहा है। लेकिन बाद में ये तीनों संगठन सीपीआई (माओस्ट) नामक संगठन की छतरी के नीचे एकत्रित हो गए।
(साभार अमर उजाला)
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